और एक होता है पढ़ा लिखा माओवाद!
Images

आलोक तोमर
बंशीधर सिंह चंपारण जिले के रहने वाले है। यह वही जिला है जहां महात्मा गांधी ने दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटने के बाद अंग्रेजों के खिलाफ पहला आंदोलन किया था। चौसठ वर्ष के बंशीधर सिंह ने अपना नाम चिंतन रखा है और इस उम्र में एमए और पीएचडी करने के बाद समाज शास्त्र में डीलिट करने के लिए दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में छात्र बने हुए हैं। चिंतन उर्फ बंशीधर सिंह का एक और चेहरा है। वे माओवादियों के विचारक भी हैं। हाल ही में लखनऊ के पास चिंतन भाई साहब को पकड़ा गया तो उनके पास से एक बहुत मौलिक योजना और साजिश के दस्तावेज मिले। योजना बहुत सरल और चौकाने वाली है।
इस योजना के अनुसार माओवादियों का विचार है कि उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की चंबल घाटी में डाकू कम होते जा रहे हैं  और पुलिस का उन पर खासा दबाव है इसलिए इन इलाकों में माओवादी गिरोह तैयार किए जा सकते हैं। जय मां दुर्गे करने वाले डाकुओं की जगह लाल सलाम करने वाले कॉमरेड। डाकुओं का तो फिर भी कोई दीन ईमान होता है मगर ये कॉमरेड तो अपनी साथी कॉमरेड को अपने बिस्तर पर सुलाने से भी नहीं चूकते। लूट पाट भी करते है और गर्दनें भी काटते हैं।
चिंतन अभी हाल में गिरफ्तार किए गए एक और माओवादी विचारक और दून स्कूल में पढ़े खोबाद घांडी का साथी है और घांडी कई बार जेएनयू में उसके हॉस्टल में ही आ कर ठहरता था। बंशीधर उर्फ चिंतन एक जमाने में माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर- एमसीसी में शामिल हुए थे और फिर पीपुल्स वॉर ग्रुप के सदस्य बने जो आखिरकार माक्र्सवादी लेनिनवादी पार्टी के रास्ते माओवाद तक आ गए। यानी हिंसा की एक सुख चुकी धारा से दूसरी धारा में उन्होंने बाइज्जत प्रवेश कर लिया।
चंबल घाटी में भूगोल और संस्कृति के हिसाब से हिंसा को लगातार मंजूरी दी जाती रही है और डाकुओं को भी बागी ही कहा जाता है। ऐसे में अगर बंशीधर भैया वहां माओवादी बगावत चलाने के लिए एक सुनिश्चित योजना बना रहे हैं तो इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए। आखिर माओवादियों को इससे मतलब नहीं हैं कि वे किस पर हमला कर रहे हैं। उन्हें अपने अस्तित्व को खबरों में रखने के लिए जरूरी है कि कुछ न कुछ ऐसा करते रहे कि अखबारों के पन्नों और टीवी चैनलों पर उनका नाम और तस्वीरें दिखती रहे।
लेकिन चंबल घाटी में जो हो रहा है और जो हो सकता है उसका अंदाजा माओवादियों को नहीं है। आखिर बाकायदा एक रिवाज के तौर पर पनपे डाकू भी वहां ज्यादा नहीं चल पाए। डाकू जबकि स्थानीय होते हैं और उन्हें पर्याप्त सामाजिक समर्थन भी मिलता है। दूसरे चंबल घाटी के घर घर में बंदूकें हैं सो जैसे माओवादी आदिवासियों को उनके तीर कमान छीन कर कॉमरेड का दर्जा दे देते है वह चंबल घाटी में नहीं होने वाला।
वैसे चिंतन साहब छपरा जिले में बलराज उर्फ बच्चा प्रसाद के साथ मिल कर वहां आंदोलन खड़ा करना चाहते हैं और सिवान में एक जमाने में जेपी आंदोलन में शामिल रहे बच्चा प्रसाद पटना विश्वविद्यालय के विज्ञान के छात्र रहे हैं, साठ साल के होने वाले है लेकिन इन दिनों माओवादी है। उत्तर प्रदेश में कानपुर, इलाहबाद और गोरखपुर तक में माओवादियों की गिरफ्तारी हुई है और इनमें चिंतन की कैद इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वह बुंदेलखंड को भी माओवाद का केंद्र बनाना चाहता है।
चिंतन के पास जो योजना दस्तावेज बरामद हुए उनमें कहा गया है कि इस इलाके में हथियार बहुत हैं और सिर्फ इन लोगों को माओवादी विचारधारा से जोड़ने की जरूरत है। यह हथियार बहुत काम आएंगे। कुछ दिन पहले इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र रहे और छात्र संघ में रह चुके लगभग 50 वर्षीय रतन बहादूर ने भी योजना बनाई थी कि बुंदेलखंड के मारे गए डाकुओं के परिवारों के साथ मिल कर काम किया जाए और उनके हथियारों और संपर्कों का लाभ उठाया जाए।
उत्तराखंड में माओवादी टिहरी बांध के खिलाफ एक जुट हुए लोगों के आंदोलन को कब्जे में करना चाहते हैं। चिंतन खुद कई बार उत्तराखंड हो आया है और वहां बांध बनने से बेघर हुए लोगों को हथियार उठाने की प्रेरणा देता रहा है। उत्तराखंड के पुलिस अधिकारियों के अनुसार माओवादी पिथौरागढ़, चमौली और गढ़वाल इलाके में पहले से आंदोलन कर रहे लोगों को जमा कर रहे हैं और उन्हें समझा रहे है कि बिना सशस्त्र संघर्ष के उन्हें कुछ हासिल नहीं होने वाला। पिछले तीन महीनों में सिर्फ चमोली जिले से चार माओवादी नेता पकडे ज़ा चुके हैं और ये चारों चिंतन के नेतृत्व में काम कर रहे थे और चिंतन सीडी के जरिए उन्हें नक्शे और निर्देश भेजा करता था।
उत्तर प्रदेश पुलिस ने एक और सनसनीखेज तथ्य यह बताया है कि चिंतन कई साल जेल में रह चुका है और अब भी जमानत पर है। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के अधिकारियों को इस बारे में कुछ पता नहीं है। लेकिन इस हड़बड़ी में पुलिस गड़बड़ी भी कर रही है। पर्याप्त प्रतिष्ठित मानवाधिकार संगठन पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबरटीज- पीयूसीएल में काम करने वाली सीमा आजाद और उनके पति विश्व विजय को माओवादी होने के आरोप में पकड़ लिया गया है और यह सब लोग जानते हैं कि सीमा आजाद मानवाधिकारों के लिए काम करती है और अखबारों में भी लिखती है।
चिंतन, खोबाद घांडी और प्रसाद जैसे लोगों के पकड़े जाने से पता लग रहा है कि माओवादी आंदोलन का सारा सूत्र अब बुजुर्ग हो चले उन लोगों के हाथ में हैं जो पढ़े लिखे हैं और इतिहास को अपनी तरह से मोड़ कर उसकी तथाकथित क्रांतिकारी व्याख्या कर के माओवाद को आगे बढ़ाते हैं।
माओवाद पर मेरी जो धारणा है उस पर कई पेशेवर बुद्विजीवी दुनिया भर के अखबारों और वेबसाइटों में ऐतराज जता चुके हैं, मुझे प्रतिक्रांतिकारी और सैध्दांतिक रूप से अनपढ़ करार दे चुके हैं। उनसे निवेदन है कि वे खुद इतिहास पढ़ ले तो पता लग जाएगा कि माओ के देश में माओवाद नहीं हैं और नक्सल आंदोलन के आखिरी बड़े नेता कनु सान्याल सरेआम कहते हैं कि माओवादी चोर, डाकू और हत्यारे हैं।

   Bookmark and Share    Subscribe
Posted By: hn
Location: delhi
hi
2/16/2010
Posted By: Amar
Location: San Jose, Calif.
maoist
2/15/2010
Posted By: GK
Location: delhi
This is a very good articls
2/16/2010
Post Your Comment
Comment:
Email ID:
Posted By :
Location:
     
    Show Hindi   Hide Hindi
Copyright @ 2010, Datelineindia.com   Powered by eMag Technologies Pvt.Ltd.