आलोक तोमर
केंद्रीय जांच ब्यूरो के मुखिया और दूसरे बड़े अधिकारी जोर शोर से दावे करते हैं कि भारतीय दंड विधान के तहत जहां पुलिस तीस से पैतीस प्रतिशत मामलों में सजा दिलवा पाती है वहां सीबीआई की दर पैसठ प्रतिशत के आस पास है। पैतीस प्रतिशत भी सीबीआई के अनुसार इसलिए गड़बड़ी में पड़ जाते हैं क्योंकि स्थानीय पुलिस शुरूआती जांच में ही कई बड़ी भूलें कर चुकी होती है।
जब सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने सरेआम और निर्णायक रूप से यह कहा कि सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय सीबीआई को सीधे जांच के आदेश दे सकते हैं तो सीबीआई का यह आंकड़ा याद आया। सीबीआई की वेबसाइट पर आंकड़े 2003 से आगे के उपलब्ध नहीं है मगर 2003 में भी जो दिखता है वह चौका देने वाला है।
उस साल में सीबीआई के पास साढ़े तीन हजार से ज्यादा मामले विचारार्थ पड़े थे जिनमें से चौदह तो तीस साल पुराने थे। दस, पंद्रह और बीस साल पुराने विचाराधीन और जांच चलने वाले मामले तो सैकड़ों में थे। वैसे भी सीबीआई का रिकॉर्ड बहुत जगमगाता हुआ है नहीं। खास तौर पर जिन मामलों में राजनीति और राजनेता तथा सत्ता के सूत्रधार आ जाते हैं वहां तो मामला आगे खिसकता ही नहीं।
बोफर्स घोटाला, हवाला घोटाला, झारखंड मुक्ति मोर्चा रिश्वत कांड, चारा घोटाला, शेयर घोटालें, सत्यम का महा घोटाला, चौरासी के दंगे का मामला, आारुषि तलवार हत्याकांड- गिनती बहुत लंबी है जहां सीबीआई ने अपनी सर्वोच्चता की छवि को खुद खंडित किया है। जहां तक पैसठ फीसदी मामलों में सीबीआई के अभियुक्तों को सजा मिलने की बात हैं तो यह सजा निचली अदालत से मिली होती है और अगर उच्च और सवोच्च न्यायालयों में अपील के मामले गिन लिए जाए तो यह आंकड़ा घट कर तीस फीसदी के आस पास पहुंच जाएगा। आंकड़ेबाजी खाली सीबीआई के अधिकारियों को ही नहीं आती। हम में से जो चाहे, आंकड़ों की मन चाहे व्याख्या कर सकता हैं।
सीबीआई की स्थापना स्पेशल पुलिस एस्टेब्लिशमेंट एक्ट 1946 के तहत बड़े अपराध सुलझाने के लिए हुई थी। जैसा कि नाम से जाहिर है सीबीआई ज्यादा अधिकार संपन्न पुलिस बल है। लेकिन आप अगर गौर करें तो देश भर की पुलिस केंद्रीय गृह मंत्रालय या राज्यों के गृह विभाग के पास होती है मगर सीबीआई को भारत सरकार ने अधिकारियों के तबादलें करने, उनकी पदोन्नति और पेंशन के मामलों का निपटारा करने और जन शिकायतें सुनने वाले मंत्रालय यानी पर्सोनल मंत्रालय के अधीन रखा गया है। पर्सोनल मंत्रालय परंपरा के हिसाब से प्रधानमंत्री के पास रहता है और एक राज्य मंत्री इसका दैनिक काम धाम देखता है।
जाहिर है कि सीबीआई प्रधानमंत्री यानी कि उस समय की सरकार के अधीन काम करती है। ऐसे में कैसे उम्मीद की जा सकती है कि सीबीआई सरकार के घपलों के बारे में निष्पक्ष जांच कर पाएगी। वैसे भी कानून में संशोधन कर के 2003 में सीबीआई को बड़े अधिकारियों और जन प्रतिनिधियों से ले कर सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थानों के अधिकारियों के खिलाफ जांच और आतंकवाद, विदेशी मुद्रा कानून का उल्लंघन और हवाला जैसे मामलों में भी जांच का अधिकार मिल गया है। लेकिन हम लगातार सीबीआई के निदेशकों को बदलता देखते हैं मगर सीबीआई की रफ्तार वैसी की वैसी बनी रहती है।
बोफर्स मामले में तो बाकायदा सीबीआई के कानूनी सलाहकार, निदेशक और भारत सरकार के महाअधिवक्ता के बीच हुआ पत्र व्यवहार मौजूद है जिसमें तमाम संदेहों के बावजूद सीबीआई को निर्देश दिया गया था कि क्वात्रोची के खिलाफ मामला वापस ले लिया जाए। पीवी नरसिंह राव और चंद्रा स्वामी जिन मामलों में सह अभियुक्त थे उनकी जांच तब तक तेज नहीं हुई जब तक एनडीए सरकार नहीं आई और लाल कृष्ण आडवाणी ने बतौर गृह मंत्री सीबीआई को अपने अधीन नहीं कर दिया।
अदालत ने कह दिया है कि राज्य सरकारें जरूरी नहीं हैं कि सीबीआई जांच की सिफारिश करें तभी सीबीआई जांच हाथ में लें। अगर किसी सक्षम अदालत को लगता है कि इस मामले में जांच ठीक से नहीं की गई है या जांच में दायरा बढ़ाने की जरूरत हैं तो सीधे अदालत सीबीआई को जांच के आदेश दे सकती है। आम तौर पर राज्य सरकारें जब अपने मामले अपनी ताकत से नहीं सुलझा पाती तब तक सीबीआई को मामला नहीं सौंपा जाता। एक के बाद एक मामलों में यही होता रहा है।
एक कहानी मणि कुमार सुब्बा नाम के एक फर्जी भारतीय नागरिक की है जिसने दबा कर पैसा कमाया और उस पैेसे के दम पर ही राजनीति शुरू की। दो बार विधानसभा और तीन बार लोकसभा का सदस्य रहा और हर बार नामांकन भरते समय उसके जन्म की तारीख और जन्म की जगह तक बदलती रही। मामला जब अदालत में गया और देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंचा तो वहां भी सीबीआई को जांच करने के आदेश गृह मंत्रालय के जरिए दिए गए।
सीबीआई ने जांच पूरी की और साबित कर दिया कि मणि कुमार सुब्बा ने कदम कदम पर झूठ बोला है तो सर्वोच्च न्यायालय ही इस रिपोर्ट पर डेढ़ साल तक बैठा रहा और आखिरकार सीबीआई के निष्कर्ष सुब्बा को सौंप दिए कि आप गृह मंत्रालय के जरिए इसका जवाब दीजिए। कोई आम आदमी होता तो उसे ऐसे ही उठा कर बंद कर दिया गया होता।
जाहिर है कि सीबीआई अपने आप में काम तो शायद ठीक से करना चाहती है और अब पूरे देश में काम करने के अधिकार भी उसे मिल गए हैं मगर खुद सीबीआई के निदेशक कहते हैं कि सीबीआई के पास साधनों और संसाधनों की इतनी विकट कमी है कि एक सीमा से ज्यादा मामलें वह हाथ में ले ही नहीं सकती। जाहिर है कि सीबीआई एक कवच है जो जब जिस काम के लिए इस्तेमाल किया जाना होता है, किया जाता है। अदालत ने मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए अपने आपको जो अधिकार देने की एक बार फिर से पुष्टि की है उसकी शायद जरूरत नहीं थी। जरूरत सीबीआई को स्वायतत्ता देने की थी।