क्योंकि कैदी वोट बैंक नहीं होते?
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आलोक तोमर

पिछले दो महीने में दो खबरे आई। दोनों एक जैसी थी। दोनों निराश करने वाली थी। दोनों हताश करने वाली थी। दोनों दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में न्याय की उपस्थिति पर सवाल उठाती थी। एक मामले में सिर्फ तीन सौ रुपए चोरी का अभियोग झेल रहे एक आदमी को तैतीस साल बाद रिहा किया गया और शर्मनाक बात यह है कि इस आदमी पर मुकदमा कभी शुरू भी नहीं हुआ था। मुकदमा चलता और दोषी पाया जाता तो ज्यादा से ज्यादा दो तीन महीने की सजा होती। तीस साल की उम्र में जेल गया था और 63 साल की उम्र में बाहर आया। जिन बच्चों को आंगन में खेलते छोड़ आया था वे भी अब बूढ़े होने लगे थे।

दूसरे मामले में एक आदमी को अपनी संपत्ति और खेती बचाने के लिए गांव वालों से झगड़ा करने के आरोप में पकड़ा गया था। तब वह सिर्फ बीस साल का था। गांव की पंचायत ने अदालत से शिकायत करने वालों को ले जा कर अपील की कि यह मामला वे आपस में ही सुलझाना चाहते हैं और अदालत से शिकायत वापस लेना चाहते हैं। इस अपील पर भी तारीखे पड़ती रही और बीस साल का यह लड़का साठ साल की उम्र में एक जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद रिहा हुआ। इन दोनों मामलों में अवैध कैद के बदले कोई मुआवजा नहीं दिया गया बल्कि सरकारी वकील की फीस के खर्चे के तौर पर पहले मामले में पच्चीस और दूसरे में बाइस हजार रुपए और वसूल कर लिए गए।

ऐसे में अदालत जाने के पहले कोई सौ बार सोचेगा। न्याय के मंदिरों में जो महंत और पुजारी बैठे हैं, उनकी प्राथमिकताएं अलग है। बहुत सारी मजबूरियां भी उनके सामने हैं। एक औसत के अनुसार अपने देश में आठ लाख पचास हजार वकील हैं। छोटी और बड़ी अदालतों को मिला कर तेरह हजार न्यायाधीश और न्यायमूर्ति हैं। 1971 की जनगणना और अदालताेंं में वर्षों से लटके हुए मामलों का हिसाब किया जाए तो भारत जैसे देश में कम से कम पचहत्तर हजार जज होने चाहिए। लेकिन न्याय हमारे लोकतंत्र की प्राथमिकता नहीं है।

दूसरों की कहानियां सुनाने के पहले आपको अपनी छोटी सी कहानी सुना देता हूं। आपको याद होगा कि 2005 की फरवरी में डेनमार्क के पैगंबर कार्टूनों के प्रकाशन और इन कार्टूनाें के खिलाफ लेख लिखने के बावजूद मुझे सांप्रदायिक हिंसा भड़काने के आरोप में तिहाड़ जेल में बंद कर दिया गया था। तेरह दिन की बहस के बाद पंद्रहवे दिन जमानत पर छोड़ा गया। यह इसलिए हो सका कि देश के ही नहीं, पूरी दुनिया के पत्रकारों ने दबाव बनाया था, संसद में सवाल उठे थे, अटल बिहारी वाजपेयी तत्कालीन गृह मंत्री शिवराज पाटिल से सवाल करने उनके घर पहुंच गए थे और कमलेश्वर और प्रभाष जोशी जैसे दिग्गजों ने अदालत में जा कर कहा था कि आलोक तोमर सांप्रदायिक नहीं हैं।

इसके बावजूद पुलिस ने अदालत में अपील की कि जमानत खारिज होनी चाहिए। मैंने अपील की कि यह मामला ही फर्जी हैं और इसलिए चलाया गया है क्योंकि मैंने दिल्ली के तत्कालीन पुलिस आयुक्त के के पॉल की एक कमजोर नब्ज पकड़ ली थी और उनके पास जवाब नहीं था इसलिए इस कमजोरी को प्रकाशित कर दिया था। पांच साल हो गए हैं। दिल्ली पुलिस एक भी आरोप को प्रमाणित नहीं कर सकी है। जिस धारा में मुझे उम्र कैद हो सकती थी, वह अदालत ने खारिज कर दी। मगर मामला अब भी दिल्ली उच्च न्यायालय में चल रहा है और मुझे नहीं मालूम कि अगली तारीख कब पड़ेगी। यह तब है जब बतौर पत्रकार लाखों लोग मुझे जानते हैं और केंद्रीय मंत्रिमंडल के कम से कम सात आठ मंत्रियों के साथ अपना उठना बैठना है।

ऐसे में न्याय की उम्मीद कौन करे और कैसे करे? जनसंख्या के अनुपात के हिसाब से भारत के दस लाख लोगों को न्याय देने के लिए सिर्फ दस जन है। आस्ट्रेलिया में यह संख्या इकतालीस, इंग्लैंड में पचास, कनाडा में पचहत्तर और अमेरिका में एक सौ सात हैं। हम लोग पता नहीं सपनों की किस दुनिया में रहते हैं।

कई त्वरित यानी फास्ट ट्रैक अदालतें भी बनाई गई हैं जिनका खर्चा कैदियों को देना पड़ता है। वैसे एक कैदी पर सरकार पचपन रुपए खर्च करती है जिसमें खाना, दवाईयां, कपड़े, अदालत आना जाना और तथाकथित सुरक्षा का खर्चा शामिल हैं। तकनीकी रूप से एक विचाराधीन कैदी पर बीस हजार रुपए सलाना खर्च किए जाते हैं। देश में औसतन एक लाख बीस हजार विचाराधीन कैदी हैं जिन पर सरकार दो सौ चालीस करोड़ रुपए प्रतिवर्ष खर्च करती है। इतने पैसे में कम से कम चौबीस सौ जज नियुक्त किए जा सकते हैं। लेकिन कैदी वोट बैंक नहीं होते इसलिए सरकार को उनकी परवाह नहीं है।

त्वरित अदालतों में प्रावधान किया गया है कि रिटायर हो चुके सत्र और अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश इनमें नियुक्त किए जाएंगे और इनका चुनाव उच्च न्यायालय करेगा। सरकार का विचार है कि हर अदालत कम से कम पच्चीस मामले हर महीने निपटाएगी। मगर अदालतों में जिस तरह के भ्रष्टाचार और मनमानी के मामले बार बार सामने आ रहे हैं, दो न्यायमूर्ति महाअभियोग की कतार में खड़े हैं उनमें उम्मीद कम ही नजर आती है। आखिर इन त्वरित अदालतों के फैसलों को भी उच्च न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है और वहां फिर वहीं होगा जो मेरे और मेरे जैसे हजारों लोगों के साथ हो रहा है। तारीख पर तारीख पड़ती रहती है और न्याय के दर्शन नहीं होते।
 

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