आतंकवादी ऐसे बनाती है पुलिस
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आलोक तोमर
मुझे इस बात के लिए माफ किया जाए कि मैं कई बार अपने खिलाफ चल रहे मामले की चर्चा कर चुका हूं। मामला अब भी अदालत में हैं और वहां जो फैसला होगा सो होगा, मैं अपने पाठकों की अदालत में अपने दोषी या निर्दोष होने की यह अपील कर रहा हूं। 2005 के फरवरी महीने में दिल्ली के डिफेंस कॉलोनी थाने में मेरे खिलाफ एक मामला दर्ज हुआ था। एफआईआर कहती है कि हेड कांस्टेबल मोहम्मद लोनी और हेड कांस्टेबल सलीम डिफेंस कॉलोनी क्षेत्र का दौरा कर रहे थे। वहां एक सिंह न्यूज एजेंसी पर उनकी नजर सीनियर इंडिया नामक पत्रिका पर पड़ी जिसके मुख पृष्ठ पर बापू की वासना शीर्षक से एक लेख छपा था। सलीम और लोनी को एफआईआर के अनुसार बहुत उत्सुकता हुई और उन्होंने पत्रिका पढ़ना शुरू कर दिया। अंदर सातवें पन्ने पर नीचे एक तीन पैराग्राफ का लेख था जिसका र्शीर्षक था अपने अपने भगवान जिसमें एक छोटी सी फोटो भी छपी थी जिसमें पगड़ी पर पटाका बना हुआ था।

एफआईआर के अनुसार फोटो बहुत छोटा था लेकिन फिर भी इन गुणी हवलदारों ने पढ़ लिया कि पगड़ी के माथे पर कुरान की पहली आयत ला इलाह इल्लिलाह, या रसूल अल्लाह अरबी भाषा में लिखा है। दिल्ली पुलिस में अरबी भाषा के इतने विद्वान को सिर्फ हवलदार बना कर रखा गया है। यह हैरत की बात है। एफआईआर कहती है कि कार्टून छापना मुस्लिम समुदाय का अपमान करना है और लेख की भाषा भी मुस्लिम संप्रदाय के खिलाफ है। इसलिए यह धारा 295 के तहत किया गया गंभीर अपराध था। इसकी सूचना सब इंस्पेक्टर के पी सिंह को दी गई और के पी सिंह ने थाने से एक बजे रवानगी डाल कर 22 फरवरी 2006 को खुद डिफेंस कॉलोनी में यह पत्रिका देखी और अपने वरिष्ठ अधिकारियों को इसकी जानकारी दी। वरिष्ठ अधिकारी यानी दिल्ली पुलिस के पुलिस आयुक्त डॉक्टर कृष्ण कांत पॉल तैयार बैठे थे। उन्होंने तुरंत दिल्ली के उप राज्यपाल के नाम एक संदेश बनाया जिसमें पत्रिकाएं जब्त करने और संपादक यानी मुझे गिरफ्तार करने की अधिसूचना जारी करने का अनुरोध था। अधिसूचना फौरन जारी कर दी गई और इसे श्री पॉल ने गृह मंत्रालय से भी जारी करवा दिया।

मेरे जिस लेख पर मुस्लिम भावनाएं भड़कने वाली थी उसके तीन पैरे भी लगे हाथ पढ़ लीजिए। मैने लिखा था- हाल ही में पैगंबर हजरत मोहम्मद जो इस्लाम के संस्थापक हैं, के डेनमार्क में कार्टून प्रकाशित होने पर बहुत हंगामा और बहुत जुलूस निकले। इस अखबार ने इसके पहले जीसस क्राइस्ड के कार्टून छापने से इंकार कर दिया था क्योंकि उसकी राय में यह आपत्तिजनक हैं।

इसके बाद अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज बुश का बयान आया जिसमें कहा गया कि वे डेनमार्क के साथ है और यूरोप तथा अमेरिका मे रहने वाले सभी इस्लाम धर्म के अनुयायियों को स्थानीय जीवन शैली और रिवाज मानने पड़ेंगे। सिर्फ इस बयान से जाहिर हो जाता है कि अमेरिका के असली इरादे क्या है? अमेरिका अपने स्वंयभू बुद्विजीवियों की मदद से संस्कृतियों के टकराव का सिद्वांत प्रचारित करने में लगा हुआ है और इस तरह के बयानाें के बाद किसी को हैरत नहीं होनी चाहिए कि और भी जगह चिंगारिया भड़के। तथ्य यह है कि धर्म का मूल प्रश्न तेल और जमीन के मामले से हट कर अब धर्म के मूल आधार का माखौल उड़ाने पर आ कर टिक गया है और स्वाभाविक है इस्लामी शक्तियां इसे पसंद नहीं करेगी। यह ठीक है कि किसी भी धर्म की महानता इस बात में निहित है कि वह मजाक को कितना सहन कर सकता है मगर यदि कोई धर्म या उसके अनुयायी इसे मंजूर नहीं करते तो उन्हें अपने रास्ते छोड़ देना चाहिए।

यह वह लेख था जिसे इस्लामी भावनाए आहत करने वाला बताया जा रहा था। रातों रात मुझे गिरफ्तार किया गया, रात को तीन बजे तक पूछताछ की गई। पूछा गया कि डेनमार्क वाला यह कार्टून कितने में और कहां से खरीदा था? पूछने वाले एक पढ़े लिखे आईपीएस अधिकारी थे जिन्हें पता था कि इंटरनेट पर चार बटन दबाने से सारे कार्टून सामने आ जाते हैं और इन पर कोई कॉपीराइट नहीं है। मगर साहब तो बड़े साहब यानी के के पॉल का हुक्म बजा रहे थे और पॉल इसलिए दुखी थे क्योंकि हमने उनके वकील बेटे को दिल्ली पुलिस द्वारा वांछित तमाम अभियुक्तों को अदालत में बचाते और औकात से कई गुनी ज्यादा फीस वसूलते पकड़ लिया था।

तिहाड़ जेल में बारह दिन बंद रहने के बाद जमानत मिली और जमानत के आदेश में एक एक पैरा पर टिप्पणी की गई थी कि इससे कोई मुस्लिम भावना आहत नहीं होती। मगर पॉल तब भी दिल्ली पुलिस के आयुक्त थे और उनके आदेश पर जमानत रद्द करने की अपील की गई जो अब भी चल रही है। दिलचस्प बात यह है कि एफआईआर लिखवाने के लिए भी के के पॉल दो मुस्लिम हवलदारों को ले कर आए। अदालत में कहा गया कि इस लेख पर दंगा हो सकता है इसलिए अभियुक्त यानी मुझे सीधे तिहाड़ जेल भेज दिया जाए। यह सब गृह मंत्री शिवराज पाटिल की जानकारी में हो रहा था और यह बात खुद पाटिल ने बहुत बाद में अपने घर मेरे सामने स्वीकार की। संसद में सवाल किया गया मगर कोई जवाब नहीं मिला। कई पेशियां हो चुकी हैं। एक सीधे सपाट मामले में चौदह जांच अधिकारी बदले जा चुके हैं। जो चार्ज शीट दाखिल की गई है उसे अदालत ने बहस के लायक नहीं समझा। सबसे गंभीर धारा 295 उच्च न्यायालय ने पाया कि इस मामले में लागू ही नहीं होती। मगर मामला चल रहा है।

मकबूल फिदा हुसैन के खिलाफ बहुत सारे मामले इन्हीं धाराओं में चले और खारिज होते रहे। हुसैन का बहुत नाम हैं और उनका एक दस्तखत लाखों में बिकता है। मगर निचली से ले कर उच्च न्यायालय तक अब तक लाखों रुपए मैं अदालती ताम झाम में खर्च कर चुका हूं। अब तो उच्च न्यायालय ने उस मामले को जिसमें मेरी गिरफ्तारी इतनी अनिवार्य मानी गई थी, साधारण सूची में डाल दिया है जिसमें तारीख दस साल बाद भी पड़ सकती है। आप ही बताए कि भारत की न्याय प्रक्रिया में मेरा विश्वास क्यों कायम रह जाना चाहिए? अभी तक तो कायम हैं लेकिन न्याय के नाम पर सत्ता और प्रतिष्ठान जिस तरह की दादागीरी करते हैं उसी से आहत और हताश हो कर लोग अपराधी बन जाते हैं।

दिलचस्प बात यह भी है कि मुझ पर इस्लाम के खिलाफ मामला भड़काने का आरोप लगा था। फिर भी तिहाड़ जेल में मुझे उस हाई सिक्योरिटी हिस्से में रखा गया जहां जैश ए मोहम्मद और लश्कर ए तैयबा के खूंखार आतंकवादी भी मौजूद थे। ईमानदारी से कहे तो आतंकवाद के आरोप में बंद ये लोग पुलिस से ज्यादा इंसानियत बरतते नजर आए और उन्होंने बहुत गौर से मेरी बात सुनी और अपने साथ बिठा कर खाना खिलाया। फिर भी भारत सरकार का मैं अभियुक्त हूं। उस सरकार का जो उस संविधान से चलती हैं जहां अभिव्यक्ति की आजादी और न्याय नागरिक का मूल अधिकार है।

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Posted By: Aapka shubchintak
Location: India
Aapki peeda aur bhartiya sanvidhan ke prati vichar dono sahi hai. Sanvidhan apni jagah shayad ikdam sahi hai par sanvidhan ke tathakathit karta dharta iski dhajjiyaa uda rahe hai wo bhi apne kukarmo ko chhupaane ke liye
3/23/2010
Posted By: Aapka shubchintak
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Aapki peeda aur bhartiya sanvidhan ke prati vichar dono sahi hai. Sanvidhan apni jagah shayad ikdam sahi hai par sanvidhan ke tathakathit karta dharta iski dhajjiyaa uda rahe hai wo bhi apne kukarmo ko chhupaane ke liye
3/23/2010
Posted By: www.sakshatkar.com
Location: Delhi
Hame likhne par majbur na kare ,gar aashu bhi aaye to dur na kare . Jakham milte gaye hum silte gaye . Bebasi me bhi kalam ghiste gaye . vah kalamkaar ko aatankvadi bana dete hai. Hum bhi muskrakar aashu baha dete hai. Sushil Gangwar www.sakshatkar.com
5/16/2010
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