आलोक तोमर
पहले तो जनरल परवेज अहमद कयानी के बारे में यह जान लीजिए कि वे भारत के एक क्षत्रिय खानदान से ताल्लुक रखते हैं। एक समय इस खानदान ने रावलपिंडी पर राज भी किया था। मोहम्मद गजनी को भारत से निकालने में इसी खानदान का बड़ा योगदान है। कश्मीर की डोगरा सेना में कयानी के पूर्वज शामिल थे और दरअसल उनके एक चाचा को पाकिस्तानी हमलावरों से लड़ते हुए शहीद हुए थे।
इसके पहले कि आप यह मान ले कि मैं परवेज कयानी का भक्त हो गया हूं, आपको इस आदमी के असली इरादे और पूरी हकीकत बता देना जरूरी है। आप जरा कलम उठाइए और आगे जो लिखा है उसके नीचे लकीर खींच कर अपने पास रख लीजिए। परवेज कयानी अमेरिका की मदद से पाकिस्तान की सरकार को गिराने की पूरी तैयारी कर चुके हैं और अपने गुरु परवेज मुशर्रफ पाकिस्तान के शासक बनने का सपना देख रहे हैं।
पाकिस्तान में यह कोई नई बात नहीं हैं क्योंकि अयूब खान से ले कर मुशर्रफ तक बहुत सारे सेना के जनरल लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए शासकों को हटा कर सत्ता संभाल चुके है। पाकिस्तान जो एक इस्लामी गणतंत्र हैं, अपने अस्तित्व के ज्यादातर वर्षों में सैनिक शासन में रहा है या वहां चलने वाली सरकारे सेना की सलाह से ही चलती रही है। यह सलाह कोई मित्रवत नहीं होती, एक तरह का आदेश होती है। अब अगर कोई देश अपने चारों तरफ जबरदस्ती दुश्मन खड़े कर लेगा तो उसे सेना की मर्जी पर चलना ही पड़ेगा। परवेज कयानी अगर आप भूल गए हो तो, आईएसआई के मुखिया रहे हैं और मुशर्रफ ने ही राजनेता बनने के लिए उन्हें अपना उत्तराधिकारी बनाया था। पाकिस्तान का अतीत देखिए।
सबसे पहले वहां फील्ड मार्शल मोहम्मद अयूब खान ने निर्वाचित सरकार को गिरा कर सरकार बनाई थी। अयूब खान अपने फौजी तरीकों की वजह से इतने अलोकप्रिय हुए कि वकालत कर रहे और राजनैतिक महात्वकांक्षाएं रखने वाले जुल्फिकार अली भुट्टो ने उनकी सरकार गिरा दी और फिर चुनाव हुए और भुट्टो शासक बने। मगर भुट्टो के सामने भी वे ही मजबूरियां थीं जो दूसरे पाकिस्तानी शासकों के सामने आती रही है और आती रहेगी। भुट्टो ने भी कहा था कि हम एक हजार साल लड़ेंगे लेकिन कश्मीर पर कब्जा कर के रहेंगे। शौकीन मिजाज और रसिया भुट्टो खुद बंदूक ले कर मैदान में उतरने वाले नहीं थे। उन्होंने सेनाध्यक्ष जनरल जिया उल हक पर पूरा ऐतबार किया और एक तरह से पूरी सीमाएं और पूरा देश सेना के हवाले कर दिया।
जिया उल हक ने इस अधिकार का पूरा इस्तेमाल किया। उन्हाेंने भुट्टो पार्टी की बैठकों की जगहे और मुद्दे तक तय करने शुरू कर दिए। वो जमाना था जब असली शासक भुट्टो अदृश्य थे और उनकी ओर से फैसलों के फतवे जिया उल हक जारी करते थे। आखिरकार वो मौका आया जब जिया उल हक ने जुल्फिकार अली भुट्टो को एक ऐसे आदमी के कत्ल के इल्जाम में गिरफ्तार कर के जेल में डाल दिया और बगैर किसी कानूनी कार्रवाई के इकतरफा सुनवाई की गई और भुट्टो को फांसी पर लटका दिया गया। ये वही जिया उल हक थे जो कह चुके थे कि वे भुट्टो को अपना खुदा मानते है।
जिया उल हक खुद एक विमान दुर्घटना में बहुत रहस्यमय तरीके से मारे गए। आज तक इस रहस्य पर से पर्दा नहीं उठा है। फिर बेनजीर राजनीति में आई और दो बार वजीर ए आजम बनी। उन्हें नवाज शरीफ ने हटाया और लोकतांत्रिक तरीके से ही हटाया। यह बात अलग है कि सेना का समर्थन नवाज शरीफ के साथ था और मुशर्रफ उस समय आईएसआई के मुखिया हुआ करते थे। आभार व्यक्त करने के अपने तरीके में नवाज शरीफ ने मुशर्रफ को सेना का अध्यक्ष बना दिया। मुशर्रफ भी दिल्ली में पैदा हुए हैं, उनके पिता जी इलाहाबाद में पैदा हुए थे और भारतीय वित्त मंत्रालय में खजांची थे। जिस साठ लाख रुपए पाकिस्तान को देने के लिए नाराज हो कर नाथु राम गोडसे ने महात्मा गांधी का कत्ल किया, वह रकम मुशर्रफ के अब्बा जान अपने साथ ले कर गए थे।
मुशर्रफ का नवाज शरीफ को हटाना बहुत नाटकीय था। मुशर्रफ तो एक सरकारी जहाज में कोलंबों में एक बैठक करने गए थे। इधर नवाज शरीफ को मुशर्रफ के बारे में बताया गया था कि वे सत्ता हथियाना चाहते है। नवाज शरीफ ने मुशर्रफ को हटाने का फैसला कर लिया था। मुशर्रफ के सेना में दोस्त बहुत थे, उन्हें जहाज में ही खबर मिल गई और वे बजाय लाहौर के इस्लामाबाद में उतरे और एक बूंद खून गिराए बगैर नवाज शरीफ को कैद कर लिया और खुद शासक बन गए।
तब तक वे कारगिल का कांड कर चुके थे और चूंकि सत्ता उनके हाथ में थी इसलिए उन्हाेंने दुनिया भर को यह बताया कि कारगिल में हमला करने का आदेश नवाज शरीफ ने दिया था। गनीमत है कि नवाज शरीफ को गोली से नहीं उड़ाया गया। वे देश से बाहर रहे और अब पाकिस्तान लौट कर अपनी जड़े फिर से जमाने में लगे हैं।
जहां तक कयानी की बात है तो उनकी ताकत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मुंबई में 26/11 का आतंकवादी हमला होने के बाद युसूफ रजा गिलानी ने प्रधानमंत्री की हैसियत से विदेश सचिव शुजाउद्दीन पाशा को भारत भेजने का ऐलान कर दिया था मगर कयानी ने यह यात्रा रोक दी। अभी हाल में जब भारत और पाकिस्तान के विदेश सचिवों की निरर्थक बातचीत होनी थी, कयानी ने पाकिस्तानी संसद की रक्षा समिति में बाकायदा बयान दिया कि पाकिस्तानी सेना के निशाने पर भारत और सिर्फ भारत है और इसलिए है कि भारत के पास सैनिक और परमाणु क्षमता है और रातों रात उसके इरादे बदल सकते है।
बातचीत के माहौल में यह बयान बहुत आत्मघाती और मूर्खतापूर्ण था लेकिन गिलानी या किसी के मुंह से इसके विरोध में एक शब्द नहीं बोल पाए। इससे भी कयानी की ताकत का अंदाजा लगता है। आज की तारीख में कयानी वॉशिंगटन बहुत जाते हैं और वहां पेंटागन के बड़े से बड़े अधिकारी उनसे मुलाकात के लिए जिस कदर उत्सुक रहते हैं उससे जाहिर है कि अमेरिका की भी सारी उम्मीदे कयानी पर ही टिकी है। कयानी बहुत कम बोलते हैं, बहुत कम अखबारों को इंटरव्यू देते हैं और सरकारी बैठको में हिस्सा लेने के बाद बाहर खड़े पत्रकारों से भी बात नहीं करते और सेना के प्रवक्ता के जरिए पूरे पाकिस्तानी की राजनीति और राजनय को डगमगा देने वाले बयान दिया करते हैं। अगर वे सरकार में आ गए और इन पक्तियों को भी कृपया लकीर खींच कर रख लीजिए कि परवेज कयानी पाकिस्तान के ऐसे शासक होंगे जो भारत पर एक और युद्व थोपने की हिमाकत करेंगे। यह बात अलग है कि पाकिस्तान भारत से न कभी जीता है और न कभी जीत पाएगा। 1971 में भारत-पाक युद्व के दौरान जनरल याह्या खान की दोस्ती के कारण भारत के समुद्र में परमाणु पनडुब्बियां भेजने वाले अमेरिका के राष्ट्रपति निक्सन ने क्या किया था इसके दस्तावेज भी हमारे पास हैं। इंतजार कीजिए।