शिक्षा के अधिकार का अप्रैल फूल
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सुप्रिया रॉय
आज पहली अप्रैल है यानी दुनिया भर में लोगों को मूर्ख बनाने का दिन। यह सिर्फ संयोग हैं कि आठ साल तक फाइलों और बंद कमरों में हो रही बहसों में उलझे रहे शिक्षा अधिकार कानून को आज से ही लागू किया गया है। अब तक आप देश के प्रधानमंत्री का महीन आवाज में दिया गया भाषण भी सुन चुके होंगे।

आगे बढ़े इससे पहले दो खबरे। दोनों गाजियाबाद से हैं जहां से संसद भवन कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर है। यहां के एक स्कूल में अचानक प्राथमिक कक्षाओं की फीस बढ़ा दी गई और जो बच्चे अपना इम्तहान का परिण्ााम लेने पहुंचे थे उन्हें रात को ढाई बजे तक रोक कर रखा गया। माता पिता ने जिलाधीश से शिकायत की तो बच्चे छोड़े गए और रिजल्ट दिया गया। यह बड़ा स्कूल है और इसकी मान्यता रद्द करने के लिए केंद्र सरकार को पत्र भेज दिया गया है।

गाजियाबाद और दिल्ली में ही गुंडागर्दी और लूटपाट करने वाले एक गिरोह पकड़ा गया है जिसके पांचो सदस्य ग्रेजुएट हैं। एक एमबीए पास हैं। एक ने तो पूरी पढ़ाई परम प्रतिष्ठित पुणे के सिंबायोसिस कॉलेज से की है। पुलिस को दिए गए बयान में इन लोगों ने कहा है कि कहीं नौकरी नहीं मिली तो वे लूटपाट के धंधे पर उतर आए। सवाल उठता है कि अनिवार्य शिक्षा का कानून तो बन गया मगर अनिवार्य रोजगार कहां से लाएंगे। इस झमेले का किसी के पास कोई जवाब नहीं है।

सन 2002 में एनडीए सरकार ने शिक्षा के अधिकार को मौलिक अधिकार मानते हुए संविधान में शामिल करने का प्रस्ताव पास किया था। इस अधिकार के तहत छह से चौदह साल तक के बच्चों को पाठशालाओं तक पहुंचाने की जिम्मेदारी सरकार की होगी। ये जो आठ साल लगे हैं इसमें उस समय जो बच्चा छह साल का था वो आज चौदह का हो गया है और जो चौदह का था वह बाईस साल का हो गया है। सरकारी क्रियाकलाप में एक पूरी पीढ़ी इस अधिकार से वंचित हो गई।

फिर हमारे मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल फरमाते हैं कि हमारे देश में योग्य शिक्षकों की कमी है। शिक्षा का अधिकार तो आज से लागू हो गया मगर रातों रात योग्य शिक्षक कहां से आएंगे? मिल भी जाएंगे तो उनका वेतन कहां से निकलेगा? रातों रात नए स्कूल कहां से बन जाएंगे? सरकार ने कहा है कि गैर सरकारी स्कूलों को पच्चीस प्रतिशत स्थान कमजोर वर्ग के बच्चों को देने होंगे। ये कोई नई बात नहीं है। जितने भी मायावी दिखने वाले अभिजात स्कूल हैं, उन्हें लगभग मुफ्त में जमीन दी गई हैं और इस शर्त पर ही दी गई हैं कि वे कमजोर वर्ग के बच्चों को तय संख्या में सीटें देंगे। कोई भी स्कूल इस शर्त का पालन नहीं करता। अस्पतालों के मामलों में भी यही झमेला है।

अभी जिस विधेयक के आधार पर कानून बना हैं वह पिछले मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह ने पेश किया था। मनमोहन सिंह और मोंटेक सिंह अहलूवालिया लगातार निवेश का रोना रोते रहे। कहते रहे कि पैसा कहां से आएगा? अब वही योजना आयोग राज्यों को इस काम के लिए एक मुश्त पच्चीस हजार करोड़ रुपए देने के लिए तैयार हो गया है और अगले पांच साल में एक लाख इकहत्तर हजार करोड़ रुपए खर्च करने की भी मंजूरी मिल गई है। इनमें से कितने असल में खर्च होंगे और कितने साहबों की जेब में चले जाएंगे यह सोचने की बात हैं और उस पर हमारा और आपका कोई वश नहीं है।

लगभग आठ साल पहले ही शिक्षा के क्षेत्र में खर्च करने के लिए एक विशेष अधिभार हर नागरिक पर लगाया गया था और इस अधिभार की वसूली से अब तक लगभग 99 हजार करोड़ रुपए जमा हो चुके हैं। कपिल सिब्बल शिक्षा के निजीकरण की बात कर रहे हैं मगर आदर्श स्थिति तो यही होती कि केंद्रीय विद्यालयों और नवोदय स्कूलों के जाल को देशव्यापी बनाया जाता ताकि शिक्षा के स्तर पर भी काबू रखा जा सकता।
यहां एक और सवाल है कि जो बच्चे अतिनिर्धन परिवारों से आते हैं और बचपन से ही मजदूरी कर के परिवार का सहारा बनते हैं उनकी संख्या हजारों में नहीं, पूरी तीन करोड़ है। इन्हें अनिवार्य शिक्षा के दायरे में कैसे लाया जाएगा और कानून के खिलाफ ही सही, मेहनत मजदूरी कर के वे जो कमाते है उसकी भरपाई कहां से होगी। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के गणित के हिसाब से ही छह से चौदह साल के लगभग अस्सी लाख बच्चे स्कूलों से बाहर हैं और मजदूरी कर रहे हैं। इनमें से पांच लाख बच्चे तो भारत की राजधानी दिल्ली में हैं।

इस कानून के तहत बाल अधिकारों का संरक्षण सरकार की जिम्मेदारी होगी। इसके लिए आयोग ही काम करेगा। मगर देश के पैतीस राज्यों और संघ शासित प्रदेशों में से सिर्फ पांच- दिल्ली, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक सिक्किम और गोवा में ये आयोग स्थापित हुए हैं। सर्व शिक्षा अभियान के तहत गैर सरकारी संगठनों को जो मोटी रकम मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने बांटी थी वह एक तरह से राजनैतिक परोपकार का धंधा बन गई। छह लाख बच्चे भी पूरे देश में सैकाड़ों करोड़ पाने वाली ये संस्थाएं नहीं ला पाई। फिर भी दिल्ली बाल अधिकार संरक्षण आयोग के अध्यक्ष आमोद कंठ कहते हैं कि एनजीओ को जोड़े बगैर काम नहीं बनने वाला। आखिर बाल अधिकार के नाम पर देश का एक सबसे बड़ा एनजीओ तो श्री कंठ ही चलाते हैं।
 

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