आलोक तोमर
दो बार मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके दिग्विजय सिंह भारतीय राजनीति के सबसे हंसमुख नेताओं में से एक माने जाते हैं। उन्हीं के कार्यकाल में मध्य प्रदेश का विभाजन हो कर छत्तीसगढ़ एक नए राज्य के तौर पर विकसित हुआ था इसलिए छत्तीसगढ़ कहे जाने वाले इलाके के मुख्यमंत्री रहने का अवसर भी दिग्विजय सिंह को मिला है।
यह कहानी फिर कभी कि छत्तीसगढ़ बना तो अर्जुन सिंह की मेहरबानी से अजीत जोगी छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री बने। अर्जुन सिंह दिग्विजय सिंह के भी हितचिंतक रहे हैं और अजीत जोगी ने अर्जुन सिंह के साथ राजनैतिक और प्रशासनिक दोनों तरीकों से जो बर्ताव किया उसकी कहानी भी कभी और कही जाएगी।
फिलहाल दिग्विजय सिंह दूसरे कारणों से खबरों में है। दंतेवाड़ा में सीआरपीएफ के 76 जवानाें की माओवादियों ने बेरहमी से हत्या कर दी और दिग्विजय सिंह को इसका दिल से अफसोस हैं। इतना ही नहीं, दिग्विजय सिंह ने तो केंद्रीय गृह मंत्री और दिग्विजय सिंह के शब्दों में भी अपने पुराने मित्र पी चिदंबरम के खिलाफ भी मोर्चा खोल दिया हैं।
दिग्विजय सिंह ने अपने लेख की शुरूआत महानगरों में बैठे तथाकथित विचारकों से ही की है और सवाल किया है कि दंतेवाड़ा में जो हुआ उस पर घंटो बहस करने और लंबी लंबी टिप्पणियां लिखने वाले ये लोग दंतेवाड़ा तो क्या, दंडकारण्य इलाके में भी नहीं गए होंगे। तथाकथित बुध्दिजीवियों के खिलाफ माहौल बनाने के बाद दिग्विजय सिंह ने पी चिदंबरम को कटघरे में खड़ा किया है और कहा है कि चिदंबरम भी बहुत प्रतिभाशाली बुध्दिजीवी है। दिग्विजय सिंह लिखते हैं कि चिदंबरम के बौध्दिक अहंकार का मैं भी कई बार शिकार हुआ हूं लेकिन हमारी दोस्ती बरकरार है। दिग्विजय सिंह ने चिदंबरम को घमंडी और अड़ियल तक करार दे डाला है।
दिग्विजय सिंह की मूल चिंता यह है कि चिदंबरम माओवाद को सिर्फ कानून और व्यवस्था का मामला मान कर चल रहे हैं और इतने बड़े खतरे को सिर्फ राज्य सरकारों की चिंता का विषय बता रहे हैं। दिग्विजय ने याद दिलाया है कि दंतेवाड़ा में जिस सीआरपीएफ टीम पर हमला हुआ वह चिदंबरम के अनुसार ही स्थानीय पुलिस बलों की मदद करने गई थी। दिग्विजय का सवाल है कि अगर ऐसा था तो छत्तीसगढ़ पुलिस का सिर्फ एक हवलदार ही टीम में मौजूद क्यों था?
दूसरा सवाल यह है कि अगर जिम्मेदारी राज्य के मुख्यमंत्री तक आ कर खत्म हो जाती है तो चिदंबरम को इस हमले के बारे में जवाब क्यों देने पड़ रहे हैं? यह काम तो छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह को करना चाहिए था। दिग्विजय सिंह का कहना है कि माओवादी भटके हुए उन लोगों का ताकतवर समूह है जिनका विश्वास तंत्र में से खत्म हो गया है। वे व्यापारियों, उद्योगपतियों और खदान मालिकों से सरेआम चंदा वसूल करते हैं और माओवादियों के जो बुध्दिजीवी समर्थक हैं उनक कहना है कि माओवादियों के खिलाफ अभियान सरकार की ओर से चलाया ही इसलिए जा रहा है ताकि मल्टीनेशनल और बड़ी कंपनियों को काम करने के लिए उपयुक्त माहौल मिले।
दिग्विजय सिंह की जानकारी के अनुसार सरकारी कर्मचारियों को भी अपने वेतन में से माओवादियों को चंदा देना पड़ता है। माओवादियों का समर्थन करने वाले ज्यादातर विचारक वे हैं जो अपने आपको सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ और धर्म निरपेक्ष करार देते है। दिग्विजय सिंह का सवाल है कि अगर यह सही है तो जिन इलाकों में माओवादियों का अच्छा खासा वर्चस्व है उनमें भाजपा के उम्मीदवारों को ज्यादा वोट कैसे मिले? दिग्विजय सिंह तो यहां तक कहते हैं कि जगदलपुर के वर्तमान भाजपा सांसद को चुनाव में माओवादियों ने एक सौदे के तहत समर्थन दिया था और जब सौदे की शर्तों का पालन नहीं किया गया तो सांसद के घर हमला बोला गया जिनमें उनका एक बेटा मारा गया।
मगर दिग्विजय सिंह की चिंता सिर्फ यही तक नहीं हैं। वे लिखते हैं कि मैं चिदंबरम को 1985 से जानता हूं जब हम दोनों लोकसभा में चुने गए थे। वे प्रतिबध्द हैं, प्रतिभाशाली हैं मगर अड़ियल और अहंकारी भी है। मैंने खुद माओवाद से निपटने में स्थानीय निवासियों का ध्यान नहीं रखे जाने के मामले में चिदंबरम से बात की और कहा कि आखिरकार यही लोग काम आएंगे और इनको ताकत देनी चाहिए। जब मैंने चिदंबरम से यह कहा तो उनका जवाब था कि यह मेरी जिम्मेदारी नहीं है। दिग्विजय सिंह ने जवाब में तर्क दिया है कि माओवाद से निपटने की जिम्मेदारी भारत सरकार की है, भारत के मंत्रिमंडल की हैं जिसके चिदंबरम एक महत्वपूर्ण सदस्य है। दिग्विजय सिंह का सवाल है कि अगर जिम्मेदारी मुख्यमंत्री तक आ कर ही खत्म हो जाती है तो फिर चिदंबरम ने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफे की पेशकश क्यों की थी?
चिदंबरम ने याद दिलाया कि इन सब इलाकों में मनरेगा और तमाम केंद्रीय नीतियां लागू है तो आदिवासी पंचायतों को अधिक शक्ति देने वाला कानून पेसा लागू क्यों नहीं किया जा सकता? दिग्विजय सिंह के इस बयान से हंगामा होना था, सो हुआ और कांग्रेस के प्रवक्ता को कहना पड़ा कि पार्टी में मतभेद होते हैं मगर इन्हें सार्वजनिक तौर पर उजागर नहीं किया जाना चाहिए।
दिग्विजय सिंह के बयान का चिदंबरम ने कोई जवाब नहीं दिया। संसद में उनके कभी बोलने की उम्मीद की जा रही थी। हर बात में राजनीति देखने वाले यह भी सवाल कर रहे हैं कि दिग्विजय सिंह का चिदंबरम के बारे में इतना कठिन लेख संसद का सत्र शुरू होने के सिर्फ एक दिन पहले ही क्यों छपा? हो सकता है कि यह एक संयोग हो लेकिन राजनीति को समझने वाले इसे संयोग मानने से साफ इंकार कर रहे है। दिग्विजय सिंह माओवाद प्रभावित इलाकों को अच्छी तरह जानते हैं और माओवादियों की राजनीति को भी। इसलिए उनके बयान को हवा में नहीं टाला जा सकता। या तो चिदंबरम या अब हर बात में बोल पड़ने वाले मनमोहन सिंह को दिग्विजय सिंह के सवालों का जवाब देना ही पड़ेगा।