एक है अरुंधती राय और एक हैं दिनेश जुगरान
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आलोक तोमर
छत्तीसगढ़ में माओवादी हिंसा कोई आज से नहीं शुरू हुई है। संगठित रूप से और इतने हमलावर तेवर में हिंसा पिछले दो तीन वर्षों से शुरू हुई है मगर पीपुल्स वॉर ग्रुप और माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर- एमसीसी झारखंड और छत्तीसगढ़ दोनों में अपने तेवर दिखाती रही थी। तब छत्तीसगढ़ मध्य प्रदेश में ही था और माओवाद से जूझने के सबक देश के गृह मंत्री चिदंबरम को सिखाने वाले दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री हुआ करते थे।
एक पुलिस अधिकारी हैं दिनेश जुगरान। बाद में पुलिस महानिदेशक बन कर रिटायर होने के बाद इस समय वे मध्य प्रदेश में सूचना आयुक्त हैं और देश के सबसे सफल पुलिस अधिकारियों में उनकी गिनती होती है। वे अच्छी कविताएं भी लिखते हैं। इससे याद आया कई बड़े सफल पुलिस अधिकारी अच्छी कविताएं लिखते हैं और उनमें छत्तीसगढ़ के वर्तमान पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन भी हैं। इसकी वजह शायद यह है कि पुलिस के काम का लगभग अमानवीय तौर तरीका भीतर से इतना दबाव आत्मा पर बना देता है कि कविता ही आत्मा की आत्मशुद्वि का तरीका बनती है।
एक जमाने में दिनेश जुगरान भिलाई इलाके में आईजी हुआ करते थे। उस जमाने में शंकर गुहा नियोगी से ले कर तमाम वामपंथी समाज को बदलने की कोशिश अपने तरीके से कर रहे थे। यह तरीका हिंसा का था। समाज और मजदूरों के नायक होने का दावा करने वाले ये भाई लोग हिंसा को ही अपना अस्त्र बनाते थे जैसे आज बड़े पैमाने पर माओवादी कर रहे हैं। वामपंथी संगठन और रणनीति का एक आम तरीका है कि समाज में पैठ बनाने के लिए लोकगीतों से ले कर नाटकों तक का सहारा लिया जाए। माओवादियों के इसी तरीके का मुकाबला करने के लिए आईजी दिनेश जुगरान खादी का कुर्ता, पाजामा पहन कर गांव गांव जा कर नुक्कड़ नाटक करते थे और खास तौर पर आदिवासियाें को समझाते थे कि हिंसा में कुछ नहीं रखा और लोकतंत्र की शक्ति को पहचान कर ही आप अपने अधिकार छीन सकते हैं और पा सकते हैं।
दिनेश जुगरान जैसा प्रयोग किसी पुलिस अधिकारी ने फिर नहीं किया। लेकिन जब दिग्विजय सिंह देश के गृह मंत्री पी चिदंबरम को बताते हैं कि स्थानीय समाज को अपने साथ जोड़े बगैर माओवाद के खिलाफ अभियान सफल नहीं हो सकता। माओवादी तो केंद्रीय योजनाओं जैसे मनरेगा और इंदिरा गांधी आवास योजना आदि का पैसा भी सरपंचों से छीन कर आदिवासियों के बीच पंचायत लगाते हैं, उन्हें दवाईयां बांटते हैं, कभी कभी राशन भी पहुंचाते हैं और उनकी सहानुभूति अर्जित करते हैं। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह को यह बात काफी पहले समझ में आ गई थी और इसीलिए उन्होंने सामाजिक आंदोलन के तौर पर कांग्रेस के नेता महेंद्र कर्मा द्वारा चलाए जा रहे अभियान सल्वा जुडूम को राजकीय संरक्षण दिया था।
हमारे चिदंबरम साहब को सल्वा जुडूम पर भी ऐतराज था। एक बार तो संसद में उन्होंने इसे गैर कानूनी पुलिस तक कह डाला था। लेकिन दिग्विजय सिंह ने ऐसा कुछ नहीं कहा था कि चिदंबरम और उनके साथी कपड़े फाड़ने लगे। अगर समाज को अपने साथ शामिल नहीं किया गया तो जाहिर है कि माओवादियों को स्थानीय समर्थन मिलता रहेगा। आदिवासी भले और भोले लोग हैं। उन्हें नहीं मालूम होता कि मदद का स्रोत क्या हैं, वे तो लाने वाले चेहरे को पहचानते हैं और उसी की पूजा करते हैं।
माओवाद प्रभावित जो इलाके हैं वहां सबसे बड़ी गड़बड़ यह हुई है कि आम जनता से ज्यादा सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों में भय ब्याप गया हैे। इसीलिए सरकार के दर्शन दंडकारण्य के ज्यादातर इलाको में नहीं होते। और तो और जगदलपुर के बहुत पास चित्रकोट के जल प्रपात पर पांच सितारा होटलों को भी मात देने वाला जो डाक बंगला बनाया गया है और जिसे प्लाजमा टीवी और शानदार एयरकंडीशनरों से सजाया गया है उसमें भी खुद सरकारी अधिकारी तक जा कर ठहरने से बचते हैं और जगदलपुर के डाक बंगले यानी सर्किट हाउस से संतोष कर लेते हैं।
चित्रकोट को छोड़िए, कांकेर तो रायपुर से बहुत दूर नहीं हैं और वहां घने जंगलों के बीच सड़क के ठीक किनारे एक पहाड़ी पर एक सर्किट हाउस है जो बहुत बड़ा है, जिसके कमरे राष्ट्रपति भवन के कमरों की तरह विराट हैं लेकिन इस डाक बंगले का केयर टेकर बताता है कि यहां भी लोग ज्यादा ठहरने नहीं आते। एक जमाने में कांकेर के कलेक्टर रहे हमारे मित्र चितरंजन खेतान ने सपरिवार एक रात बिताने के लिए सपरिवार हमें वहां भेजा था लेकिन इसी केयर टेकर ने कहा कि जब कोई आता ही नहीं हैं तो हमने यहां चाय पिलाने तक का प्रबंध नहीं किया है। अगर सरकार ऐसे डरेगी तो बेचारे आदिवासियों पर मौत के डर से माओवादियाें का साथ देने का आरोप क्यों लगाया जाता है और इस आरोप को सच्चा भी क्यों मान लिया जाता है?
हमारे एक और मित्र हैं आनंद प्रधान। वे भारतीय जन संचार शिक्षण संस्थान में पत्रकारिता पढ़ाते हैं। हाल में ही उन्होंने अपनी फेसबुक पर एक सवाल किया कि गिनती कर के बताया जाए कि मीडिया में कितने आदिवासी संपादक हैं और अगर मीडिया में आदिवासी पत्रकार बड़ी संख्या में होते तो भी क्या दंतेवाड़ा की घटना का इस कदर विरोध हो रहा होता?
अगर आपके मन वचन कर्म में माओवाद हैं और आपको लगता है कि व्यवस्था सिर्फ गोली चलाने से बदली जा सकती है तो भाई साहब आप दिल्ली में बैठ कर डिश टीवी पर दंतेवाड़ा की फिल्म क्याेंं देख रहे हैं? जाइए और दंडकारण्य के जंगलों में माओवादियों का सामना कीजिए या उनका साथ दीजिए। अचानक अरुंधती राय भी मैदान में कूद पड़ी है। अरुंधती भाग्यशाली महिला हैं, अपेक्षाकृत कम उम्र में बुकर जैसा बड़ा सम्मान पा चुकी हैं। किताब की रॉयल्टी इतनी आ गई है कि जिंदगी भर काम करने की जरूरत नहीं हैं और इसीलिए वे एक्टिविस्ट की भूमिका में आ गई है।
जैसी एक्टिविस्ट अरुंधती राय हैं वैसे लोगों को सिर्फ निठ्ल्ला योध्दा या काठ की बंदूक ले कर निकल पड़ने वाले सेनापति ही कहा जा सकता है। उनके खिलाफ माओवादियों से संपर्क रखने के इल्जाम में छत्तीसगढ़ पुलिस ने अपने विशेष अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया है और अब डरी हुई अरुंधती कह रही है कि वे हत्यारों के नहीं, आदिवासियों के साथ हैं। माओवाद के ऐसे समर्थक इन हत्यारों को और जल्दी मरवाएंगे।