लोहियावादी होने के पाखंड
Images

अलोक तोमर
राम मनोहर लोहिया की जन्मतिथि पिछले महीने निकली है और पुण्य तिथि अक्तूबर में हैं। मगर लोहिया व्यक्ति नहीं, घटना थे और अनवरत पूरे समाज को प्रभावित और प्रेरित करने वाली घटनाओं पर लिखने के लिए कोई तिथि या मुहुर्त तय नहीं किया जा सकता। वैसे भी यह पूरा साल लोहिया का शताब्दी वर्ष है।
अपन उस पीढ़ी के हैं जो चार पांच साल की जब राम मनोहर लोहिया संसार छोड़ गए थे। उनका लिखा हुआ पढ़ा है और ज्ञानी और अज्ञानी दोनों तरह के लोगों से नारों की तरह उनका नाम सुना है। जिस दिन अंबेडकर नगर में अंबेडकर के जन्मदिवस पर राहुल गांधी और मायावती के बीच तलवारें खिची हुई थी, उस दिन ध्यान आ रहा था कि अंबेडकर नगर बनने से पहले यह अकबरपुर था और यहीं के एक छोटे से गांव में लोहिया का जन्म हुआ था।
मायावती ने अकबरपुर को अंबेडकर नगर बना दिया मगर अपने आपको महान लोहियावादी कहने वाले मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश पर राज करते वक्त उसे लोहिया नगर नहीं बना पाए। किसी न किसी दिन इटावा जरूर मुलायम नगर बन जाएगा। लोहिया जन्मे तो एक मारवाड़ी परिवार में थे लेकिन उनके संस्कार तथाकथित वामपंथियों से भी ज्यादा क्रांतिकारी थे। लोहिया ने ही सबसे पहले पहचाना था कि यूरोप में जिसे वर्ग संघर्ष कहा जाता है, भारत में वह असल में जाति संघर्ष है। इसीलिए उन्होंने जाति तोड़ो आंदोलन की शुरूआत की। आजकल के जो लोहियावादी है वे तो जाति के आधार पर ही अपनी पूरी राजनीति करते हैं, अपने पदाधिकारी बनाते हैं और चुनावों में अपने उम्मीदवार तय करते हैं। लोहिया को लोहियावादियों ने ही छल लिया।
कम लोग जानते हैं कि लोहिया के अंदर ब्रिटिश साम्राज्य के प्रति इतना विरोध था कि बनारस हिंदू विश्वविद्यालय और कोलकाता विश्वविद्यालय में टॉप करने के बाद जब उन्हें छात्रवृत्तियां मिली तो नेहरू और गांधी की तरह इंग्लैंड की बजाय जर्मनी जाना बेहतर समझा। जर्मन भाषा पर उनका गजब का अधिकार था। हिंदी भी ऐसी लिखते थे कि बड़े बड़े शास्त्री शर्मा जाए। जवाहर लाल नेहरू जैसे अंग्रेजी जानने वाले की अंग्रेजी भी ठीक कर दिया करते थे। फिर भी उनका एक बड़ा आंदोलन यह था कि हिंदी को विधिवत भारत की राष्ट्रभाषा बनाया जाए।
जब यूरोप में थे और पढ़ रहे थे- उन्होंने गांधी के नमक सत्याग्रह पर पीएचडी की थी- तो जेनेवा में लीग ऑफ नेशन्स का जमावड़ा हुआ। भारत की ओर से बीकानेर के महाराजा को देश का प्रतिनिधित्व करने के लिए भेजा गया था और लोहिया ने वही दर्शक दीर्घा से हाथ से लिख कर पर्चे फेके और दुनिया भर के अखबारों को पत्र लिख कर इस हरकत का विरोध किया। लोहिया ने यूरोपिय भारतीयों का एक संघ बनाया था जिसके वे खुद महासचिव थे।
भारत लौट कर लोहिया कांग्रेस में शामिल हुए मगर समाजवाद का सिद्वांत उन्हें इतना प्रिय था कि उन्हाेंने कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना की। यह पार्टी बाद की सोशलिस्ट पार्टी और आज की समाजवादी पार्टी की पूर्वज है मगर वंशजों में हमेशा पूर्वजों के संस्कार नहीं खोजे जाने चाहिए। आखिर महात्मा गांधी के एक बेटे की मौत बेतहाशा शराब पीने की वजह से हुई थी। पार्टी की पत्रिका निकलती थी और वह काफी लोकप्रिय थी।
1936 में जवाहर लाल नेहरू ने लोहिया को अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी में आमंत्रित कर के भारत की विदेश नीति तय करने के काम पर लगाया। फिर जब दूसरा विश्व युद्व आया तो लोहिया को अंग्रेजाें को भारत से भगाने का इससे बढ़िया कोई अवसर नहीं जान पड़ा। उन्हाेंने सेना सहित सारे ब्रिटिश संस्थानों के बहिष्कार का ऐलान किया। उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया लेकिन पूरे देश के युवा इतने गुस्से में आ गए थे कि डर के मारे उन्हें छोड़ना पड़ा। छूटते ही लोहिया ने गांधी जी के अखबार हरिजन में सत्याग्रह पर एक लेख लिखा और उन्हें फिर पकड़ लिया गया और दो साल की सजा दे कर लाहौर जेल में भेज दिया गया जहां उन्हें काफी यातनाएं दी गई।
भारत छोड़ो आंदोलन में भी लोहिया गांधी, पटेल, नेहरू और मौलाना आजाद के साथ शामिल थे और लोहिया तो उषा मेहता द्वारा चलाए जा रहे गुप्त कांग्रेस रेडियो से लगातार इंकलाबी बयान दे रहे थे। पुलिस उनके पीछे थी और लोहिया कोलकाता में आंदोलन बढ़ाने चले गए। लोहिया ने अपना नाम बदला और नेपाल चले गए जहां नेपाली क्रांतिकारियों, खास तौर पर कोइराला परिवार से उनकी घनिष्ठता हुई जो अंत तक कायम रही। फिर पकड़े गए फिर लाहौर भेज दिए गए और फिर यातनाएं झेली। मगर गांधी जी के दबाव में लोहिया और जयप्रकाश नारायण को छोड़ा गया और लोहिया छुट्टी मनाने गोवा गए मगर वहां पुर्तगाल सरकार का शासन उखाड़ने की तैयारियों में जुट गए। फिर जब देश आजाद हो रहा था तो पूरे देश में जश्न मन रहे थे मगर लोहिया गांधी जी के साथ दंगे के इलाकों में शांति स्थापित करने में लगे हुए थे।
नरेगा और मनरेगा तो अब आए हैं मगर लोहिया ने 1947 में ही कह दिया था कि भारत का विकास और रोजगार की समस्या से निपटने का एक ही उपाय है कि समाज के गरीब वर्गों को इसमें शामिल किया जाए। उदाहरण के तौर पर उन्होंने स्थानीय लोगों के साथ मिल कर पनियारी नदी पर एक बांध बनाया जो आज भी लोहिया सागर बांध के नाम से मौजूद है। दलिताें और पिछड़ों को निर्वाचित सदनों में आरक्षण दिलवाने की शुरूआत लोहिया ने ही की थी और वे महिलाओं को अलग से आरक्षण देना चाहते थे। पता नहीं, आज के लोहियावादी इस महिला आरक्षण का विरोध क्यों कर रहे हैं? लोहिया ने सांसदों तक जनता की शिकायते पहुंचने के लिए जनवाणी दिवस तय किया था जिसका खूब प्रचार हुआ। हैरत की बात यह है कि लोहिया पहली बार संसद में 1963 में फर्रूखाबाद से चुन कर पहुंचे और सवाल उठाया कि जब देश के ज्यादातर लोग तीन आना रोज में गुजर कर रहे हैं तो जवाहर लाल नेहरू पर पच्चीस हजार रुपए रोज क्यों खर्च होते हैं? नेहरू जी का योजना आयोग अपने आंकड़ों के हिसाब से कह रहा था कि जनता की औसत आमदनी तीन आना नहीं, पंद्रह आना है मगर संसद में सरकारी आंकड़ों से ही लोहिया ने साबित कर दिया कि सरकार गलत है। सबसे पहले लोहिया ने ही पहचाना था कि माक्र्सवाद और पूंजीवाद अपने स्वभाव में एक हैं। वे तो माक्र्सवाद को एशिया के खिलाफ यूरोप का आखिरी हथियार कहते थे। समाजवादी वे भी थे और किसी भी करात या वर्धन से ज्यादा थे।
लोहिया अपनी जिंदगी में मस्त मौला थे। अपवादों और विवादों की उन्होंने कभी परवाह नहीं की। दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर रमा मित्रा आजीवन उनके सामने रही और उन्हें इस बात पर कभी कोई लज्जा महसूस नहीं हुई। नेहरू के बाद इंदिरा गांधी के प्रबल आलोचक होने के बावजू या शायद उसी के कारण फिरोज गांधी उनके सबसे करीबी दोस्तों में से थे और एक जमाने में भारतीय संसद की सबसे सुंदर सदस्याें में से एक तारकेश्वरी सिन्हा को ले कर उन दोनों के बीच मजाक चला करता था। लोहिया के नाम पर राजनीति करने वाले शायद लोहिया का नैतिक आधार भूल गए हैं और इसीलिए उनकी राजनीति कुल कुटुंबों की राजनीति बन कर रह गई है।