दो मौंतो की अनकही कहानी
Images

आलोक तोमर 
इस देश में रोज सैकड़ों गुमनाम मौते होती है। कई की तो शिनाख्त भी नहीं हो पाती और उनका अंतिम संस्कार पुलिस वाली शैली में मिट्टी का तेल डाल कर कर दिया जाता है। मगर यहां हम जिन दो मौतों की बात कर रहे हैं उनमें दिवंगत होने वालों के नाम बहुत बड़े हैं। एक को तो कांग्रेस का न होने के बावजूद पंडित जवाहर लाल नेहरू ने भारत सरकार का शिक्षा मंत्री बनाया था।

दो रहस्यमय मौते हैं। एक तो साफ साफ हत्या है और दूसरे के बारे में आज तक कोई जांच नहीं की गई। पंडित श्यामा प्रसाद मुखर्जी बंगाल के एक बड़े परिवार से आए थे और उनके पिता आशुतोष मुखर्जी बंगाल के मुख्य न्यायाधीश भी थे। आजादी की लड़ाई में उनके योगदान और उनकी प्रतिभा को देखते हुए नेहरू जी ने सरदार पटेल को कोलकाता भेज कर श्री मुखर्जी से सरकार में शामिल होने का निवेदन किया था। मगर जब कश्मीर में धारा 370 के विस्तार के तौर पर भारत के लोगों को भी परमिट ले कर जाना पड़ता था। नेहरू जी यह विधान बदलने को राजी नहीं थे और श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने उनकी सरकार छोड़ दी, नारा दिया - एक देश में दो विधान नहीं चलेंगे। फिर इस परमिट प्रथा का विरोध करने के लिए 11 मई 1953 को वे बगैर परमिट के कश्मीर में घुसने की घोषणा कर के गए और पठानकोट के आगे जहा कश्मीर की सीमा शुरू होती है वहां उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। उनके साथ गए लोगों में पत्रकार की हैसियत से अटल बिहारी वाजपेयी भी थे जो तब वीर अर्जुन के संपादक हुआ करते थे।

मुखर्जी को किसी जेल में नहीं रखा गया बल्कि एक सुनसान और एक टूटे फूटे घर में रहे। वहां उन्हें इलाज के नाम पर दो दवाईयां दी गई। एक पेनिसिलीन और दूसरी स्ट्रैप्टोमाइसिन। श्री मुखर्जी कहते रह गए कि पेनिसिलीन से उन्हें एलर्जी है मगर इंजेक्शन लगा दिया गया। जहां तक स्ट्रेप्टोमाइसिन का सवाल है तो वह टीबी की दवाई है और डॉक्टर मुखर्जी टीबी के शिकार नहीं थे। अस्पताल भी उन्हें कैद किए जाने के डेढ़ महीने बाद ले जाया गया और पुलिस की हिरासत में ही उनकी मौत हो गई। बहुत सारे लोगों में जिनमें डॉक्टर मुखर्जी की मां जो माया देवी भी थी, नेहरू जी से अपील करते रहे कि इस अचानक हुई मौत की जांच की जाए लेकिन नेहरू जी ने जब सुभाष चंद्र बोस की जांच नहीं की थी तो इस मामले में क्यों सुनते?
दूसरी कहानी जनसंघ के ही अध्यक्ष निर्वाचित हुए पंडित दीन दयाल उपाध्याय की हत्या की है। दीन दयाल उपाध्याय से ज्यादा सरल नेता भारत की राजनीति में कम देखे गए हैं। 10 और 11 फरवरी की बीच रात को मुगल सराय के पास रेलगाड़ी में उनका निधन हुआ और रेल के बाहर पड़ी हुई उनकी लाश मिली। इस मामले में भरत लाल डोंग और राम अवध नाम के दो लोगों पर फटाफट मुकदमा चला और डेढ़ साल के भीतर दोनाेंं को बरी कर दिया गया। एक और अभियुक्त भरत लाल को चोरी के इल्जाम में चार साल की सजा मिली।

दीन दयाल उपाध्याय की मौत के बारे में सरकार ने न्यायमूर्ति यशवंत चंद्रचूर्ण की अध्यक्षता में जो आयोग बैठाया था उसकी रिपोर्ट और निष्कर्ष काफी उलझे हुए थे। दिलचस्प बात यह है कि यह आयोग 23 अक्टूबर 1969 को बैठाया गया जब इसके दोनों मुख्य अभियुक्त बरी हो चुके थे। खुद इस रिपोर्ट में बहुत सारे रहस्य अनसुलझे छोड़े गए हैं। एक मेजर सुरेंद्र मोहन शर्मा को सियालदह एक्सप्रेस की उसी कोच में यात्रा करनी थी जिसमें दीन दयाल उपाध्याय की हत्या की गई। मगर वे नहीं आए और रेलवे के रिकॉर्ड में कहीं उनका नाम एस एल शर्मा लिखा हुआ है तो ही एस एन एन शर्मा लिखा हुआ है। रेल के एक कंडक्टर ने यह भी लिखा है कि उसने एक अनजान व्यक्ति को दीन दयाल उपाध्याय के बगल के कम्पार्टमेंट में खडा देखा था। इसके अलावा विधान परिषद के सदस्य गौरी शंकर राय साथ जाने वाले थे लेकिन रास्ते में ही उतर गए थे। इस रहस्य का आज तक पता नहीं चला कि डिब्बे के बाथरूम अचानक लॉक कैसे हो गए थे और इस अज्ञात व्यक्ति ने अपने आपको श्री उपाध्याय का बेटा बता कर भी कैसे पार पा लिया था?
दीन दयाल उपाध्याय को इस आयोग की रिपोर्ट के अनुसार चलती रेल से धक्का दिया गया था और एक खंभे से टकरा कर उनकी मौत हुई। चोर श्री उपाध्याय के सामान में से एक फाइल ले गए जो चोरों की किसी काम की नहीं होगी मगर उनकी जेब में जो 21 रुपए पड़े थे और हाथ में जो घड़ी थी वह चोर नहीं ले गए। और तो और जब श्री उपाध्याय का शव मिला तो उनके हाथ में पांच रुपए का एक नोट भी था और शव शॉल से ढका हुआ था। अगर यह चोरी थी वे जरूर चोर रहे होंगे।

जहां तक मेजर शर्मा की बात है तो उनकी कुछ ही दिन पहले शादी हुई थी और वे अपनी रेजीमेंट में वापस जा रहे थे। वे दूसरे डिब्बे में चढ़े और अपना सीट सुबेदार सिध्द सिंह को दे दी। यह पता लगाया जाना जरूरी है कि मेजर शर्मा कहीं रॉ के लिए तो काम नहीं कर रहे थे? अंधेरे में रात को 2 बज के 20 मिनट पर श्री उपाध्याय का शव मिला। 3 बज कर 20 मिनट पर उसे अस्पताल पहुंचा दिया गया मगर अस्पताल के रिकॉर्ड में अज्ञात कारण्ाों से यह शव 5 बज कर 50 मिनट पर लाया बताया गया हैं।

श्री उपाध्याय को आखिरी बार जौनपुर स्टेशन पर जीवित देखा गया था। और उनकी शिनाख्त साढ़े दस बजे जनसंघ के कार्यकर्ता विश्वनाथ प्रसाद अग्रवाल ने की। आयोग फिर भी मानता है कि श्री मुखर्जी की हत्या सिर्फ चोरों ने की है और इसमें कोई राजनैतिक साजिश नहीं है। चोर भी ऐसे की सिर्फ एक फाइल ले गए और घड़ी तथा पैसे ऐसे ही छोड़ गए। इन दोनाें मौतों जिनमेंं से एक सरेआम हत्या है, की पूरी और समझ में आने लायक पड़ताल करने का काम भारत सरकार का है लेकिन भारत सरकार के पास इतना वक्त नहीं है। यह शायद सवाल नीयत का है।