चंबल जिसे आप नहीं जानते
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आलोक तोमर
इंदौर के पास महू सैनिक छावनी जहां डॉक्टर भीमराव अंबेडकर का जन्म हुआ था, एक गांव है मानपुरा। वहां से बूंद बूंद कर के एक नदी निकलती हैं जो राजस्थान होते हुए वापस मध्य प्रदेश में घुसती है और फिर मुरैना और भिंड जिले से होते हुए उत्तर प्रदेश के जालौन जिले में भरेह के पास तीन और नदियों के साथ यमुना में मिल जाती है। कुल मिला कर पांच नदियों के इस संगम को पचनदा कहते हैं। दुनिया में बहुत कम जगहे ऐसी होगी जहां पांच नदिया एक साथ मिलती हैं।

चंबल घाटी का नाम लेकिन दूसरे संदर्भों में जाना जाता है। इसे डाकुओं की धरती कहा जाता हैं। अब यहां डाकू प्रथा कोई सदी पुरानी हो गई है और सबसे पहले ज्ञात और खूंखार डाकू डोंगर सिंह और उसका भाई बटरी सिंह था। इस गिरोह का बड़ा आतंक था। वैसे शोले फिल्म की मेहरबानी से चंबल घाटी और डाकू गब्बर सिंह पर्यायवाची हो गए हैं मगर असल में गब्बर सिंह एक बहुत अदना सा डाकू था और कम से कम चंबल इलाके में उसे इसलिए जाना जाता है कि उसने दुर्गा मां के मंदिर पर 108 लोगों की नाक काट कर चढ़ाने की कसम खाई थी। 30-35 लोगों की नाक उसने काट भी ली थी और इनमें से एक दो परम बूढ़े आज भी चंबल के गांवों में घूमते मिल जाते हैं।

लेकिन असली चंबल वह नहीं हैं जैसी उसकी छवि बनाई गई है। चंबल में बीहड़ हैं और पता नहीं कब से सरकार अरबों रुपए खर्च कर के बीहड़ों को समतल बनाने की कोशिश कर रही है और असफल हो रही है। सरकारी काम इसी तरीके से होते है। फाइलें बनती हैं, पैसा आता हैं, बुलडोजर खरीदे जाते हैं और फिर उनमें रखे रखे जंग लग जाती है। एक किसी विशेषज्ञ को सुपर आइडिया आया था कि पूरी चंबल घाटी में हवाई जहाज से बीज छिड़क दो और घाटी हरी भरी हो जाएगी और फसले तैयार होंगी। जहाज से फेंके गए यह बीज पक्षियों को काफी अच्छे लगे और बीहड़ जैसे थे, वैसे ही बने रहे।

अगर कोई मध्य प्रदेश के संवेदनशील मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को यह समझाने में सफल हो कि चंबल के बीहड़ो का उपचार कैसे किया जा सकता है तो उसका बड़ा उपकार होगा। पूरे भारत की तरह चंबल घाटी में भी बहुत सारे भूमिहीन हैं और ज्यादातर बीहड़ सरकारी जमीन माने जाते हैं। भारतीय संस्कार के अनुसार किसान जमीन के लिए कुछ भी करेगा। अगर बीहड़ों के एक या दो एकड़ के पट्टे इन भूमिहीनों को दे दिए जाएं और चंबल घाटी विकास निगम बना कर सरकार अपने संसाधनों से उनकी मदद करे तो बीहड़ देखते देखते गायब हो सकते हैं।

बीहड़ गए तो चंबल घाटी पंजाब से भी ज्यादा समृध्द हो सकती है। बीहड़ों के बावजूद यहां इतनी सरसो पैदा होती हैं कि तेल निकालने वाली मुरैना की एक कंपनी तो स्टाक एक्सचेंज में रजिस्टर्ड हैं और हाल ही में आयकर विभाग ने छापे मार कर उससे करोड़ों रुपए बरामद किए थे। मुरैना तो आगरा मुंबई हाइवे पर हैं फिर भी बामौर औद्योगिक क्षेत्र पनप नहीं पा रहा। भिंड जिले में मालनपुर औद्योगिक क्षेत्र है और अब तो वहां रेल भी जाती है और रेलवे ने बड़ा गोदाम भी बनाया है मगर सरकारी फाइलों के अडंग़े के कारण कई मल्टीनेशनल कंपनियां आई मगर सफल नहीं हो पा रही। बामौर और मालनपुर को आसानी से स्पेशल इकॉनोमिक जोन बनाया जा सकता है। सरकार की भी आमदनी बढ़ेगी और इलाके का भी विकास होगा।

चंबल घाटी में डाकुओं को बागी कहते हैं। इसका एक पुराना और बहुत मार्मिक इतिहास है। जातिवादी होने का खतरा उठाने के बावजूद इतिहास तो इतिहास की तरह ही बताना पड़ेगा। भारत पर जिस आखिरी हिंदू राजपरिवार ने राज किया था वह तोमर परिवार था जिसकी स्थापना अनंगपाल और सूरजपाल दो भाईयों ने की थी। विदेश से आए हमलावरों ने जिनमें लोदी भी थे और पठान भी, लड़ाई में उन्हें हरा कर राजपाट छीन लिया और राजपरिवार की गर्दने काट कर महल के बाहर लटका दी। राजपरिवार के बचे हुए लोग प्रतिशोध की कसम खा कर राजस्थान के राजपरिवारों से होते हुए और शरण का प्रस्ताव मंजूर नहीं होने के कारण चंबल घाटी में आ बसे और अपने आपको बागी घोषित कर दिया।

हथियार खरीदने और दूसरी जरूरताें के लिए वे आज के आगरा मुंबई और तब के शेरशाह सूरी राजमार्ग पर निकलने वाले काफिले लूटा करते थे। यही डाकू परंपरा की शुरूआत थी। बाद में संगठित हो कर तोमरों ने ग्वालियर पर राज भी किया और एक राजा मानसिंह तोमर ने एक गुर्जर लड़की से शादी कर के उसका नाम मृगनयनी रखा और उसके लिए एक शानदार किला बनवाया। यह किला आज मध्य प्रदेश के सबसे चर्चित पर्यटक स्थलों में से एक हैं। राजा मानसिंह शास्त्रीय संगीत के विद्वान थे और कहा जाता है कि ध्रुपद संगीत का अविष्कार भी उन्हाेंने ही किया था।

भिंड और मुरैना जिले पुरातत्व और इतिहास की संपदाओं से भरे पड़े हैं। मुरैना में कुतवार नाम का एक गांव हैं जहां नागवंश के राजा कुति भोज की राजधानी थी और कहा जाता है कि महाभारत की कुंती का जन्म भी यही हुआ था। यह तीन हजार साल पुरानी बात हैं और कुतवार में आज भी हवेलियां और विराट सजे हुए तालाब मौजूद हैं। मशहूर इतिहासकार विसेंट स्मिथ के अनुसार ईसा से दो सदी पहले नागराजा मथुरा से नर्मदा के किनारे तक राज करते थे। जाने माने पुरातत्वविद अलेक्जेंडर कनिंग्म पांच साल ग्वालियर में रहे और 1860 से ले कर 1885 तक भारत के पुरातत्व विभाग के मुखिया भी रहे। कनिंग्म ने कुतवार और सिंघोनिया के दौरे किए और पुष्टि की कि ये तथा मितावली और पढ़ावली में खजुराहो की तरह जो मंदिर बने हैं वे खजुराहो जितने ही पुराने है। मितावली में तो वह गोल इमारत भी हैं जिसके आधार पर संसद भवन बनाया गया है।

चंबल सिर्फ एक नदी का नाम नहीं हैं। चंबल एक बहता हुआ इतिहास है। चंबल का पानी परदर्शी हैं और पूर्णिमा की रात को आइने की तरह चमकता है। सांस्कृतिक तौर पर इतने समृध्द चंबल इलाके को पर्यटक स्थल के तौर पर विकसित किया जा सकता है और जो लोग ताजमहल देखने आते हैं वे चंबल देखने भी आ सकते हैं। बीहड़ो का उपाय आपको बता दिया और रही बात डाकुओं की तो अगर यहां बड़े कुख्यात डाकू पैदा हुए हैं तो राम प्रसाद बिस्मिल भी यही पैदा हुए थे।