आलोक तोमर
मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़ के अलग हो जाने के बाद उन राज्यों में से नहीं माना जाता जहां आदिवासी बड़ी संख्या में रहते हैं। फिर भी झाबुआ शहडोल से ले कर मुरैना और रतलाम जिलो तक आदिवासी बिखरे हुए है।
आदिवासियों के विकास का झुनझुना लगभग हर केंद्र और राज्य सरकार जोर शोर से बजाती हैं। आदिवासियों को देश का आदि वासी होने के कारण पूर्वज होने का जो सम्मान मिलना चाहिए वह उन्हें हमारा तंत्र नहीं देता। गनीमत है कि मुख्यमंत्री के नाते मध्य प्रदेश के अभिभावक बने शिवराज सिंह चौहान ने संस्कार और संस्कृति के साथ विकास को जोड़ा है। शिवराज सिंह आदिवासियों को कोट पैंट नहीं पहनाना चाहते और उनके हाथ से तीर कमान ले कर उनके हाथ में एके 47 नहीं थमाना चाहते।
जो आदिवासियों के बारे में जरा भी जानते हैं वे यह भी जानते हैं कि आदिवासियों का समाज असल में मातृ सतात्मक समाज है जहां मेहनत मजूरी के ज्यादातर काम महिलाए करती है और पुरुष घरेलू कामों में उनका हाथ बटाते है। 1997 में जब छत्तीसगढ़ नहीं बना था तो संयुक्त राष्ट्र ने 1997 में एक विराट सर्वेक्षण पूरे मध्य प्रदेश का किया था।
इस सर्वेक्षण में पाया गया था कि आदिवासी महिलाओं को दो वर्गों में बांटा जा सकता है। एक वर्ग वह है जो घर में काम करता है और दूसरा वह जो जंगलों और खेतों में काम करता है। महिलाएं आम तौर पर लकड़ियां नहीं काटती लेकिन उन्हें ढोने का काम करती है और जहां सरकारी मजदूरी मिलती है वे पुरुषों से आगे होती हैं। आदिवासी महिलाएं क्या कर रही होती है यह इस बात पर निर्भर करता है कि मौसम कौन सा है। औसत अनुपात के अनुसार हर आदिवासी महिला घर में या बाहर सोलह से अठारह घंटे काम करती है और यही उनकी जीवन शैली हैं।
आदिवासियों में जो संयुक्त परिवार है उनमें महिलाए पूरा दिन खेतों और जंगलों में बिताती है और घर आ कर आम तौर पर पति द्वारा तैयार किया हुआ भोजन खाती है। आदिवासी महिलाओं का खेती का कामकाज जुलाई से नंवबर तक पांच महीनों में होता है। खेती बारिश पर निर्भर है और धान यानी चावल आदिवासियों की मुख्य फसल है। इसके अलावा झरनों और तालाबाेंं में मछलियों से ले कर सिंघाड़े तक पैदा किए जाते हैं और यह काम भी आम तौर पर महिलाओं का होता हैं।
अक्टूबर से नवंबर तक यही महिलाएं फसलों को सुखाने, कूटने और धान से भूसा अगल करने का काम करती है। खेती की जगहे यानी खेत घरो से बहुत दूर होते हैं और महिलाएं बगैर कुछ खाए पिए भोर होते ही खेतों में काम करने चली जाती है। आम तौर पर समूह में जाती है और मई से जून तक जंगल के उत्पाद जैसे तेंंदुपत्ता, झाड़ू बनाने के तिनके, टोकरियां और चटाईयां बनाने के लिए जूट और रस्सिया बनाने के लिए मूंज घर लाती है। गाेंद और शहद जंगलों से लाना भी उनकी जिम्मेदारी है और यह आमदनी थोड़ी बहुत ही सही, नकद आदमनी में शामिल होती है।
इन महिलाओं के पास मिनरल वॉटर की बोतले नहीं होती इसलिए दिन रात प्यासे ही काम करती है या तालाबों का ऐसा पानी पीती है जिन्हें अगर नागरी समाज देखे तो चकित रह जाए। पारिवारिक जिम्मेदारियां शहरों से ज्यादा इतमिलान से बांटी जाती है और आम तौर पर बहुएं घर में रहती है और खाने और सफाई का काम करती है। जो संयुक्त परिवार नहीं होते वहां जो भी पहले घर आ जाए वह खाने का इंतजाम करता है।
बच्चों को घर का काम सिखाया जाता है मगर बेटियों को स्कूल नहीं भेजा जाता। यहीं बेटियां आगे चल कर अनपढ़ माता बनती है और चूंकि उन्हें शिक्षा का महत्व नहीं मालूम इसलिए अगली पीढ़िया भी अशिक्षित ही रह जाती है। महिलाएं घर की दीवारे भी बनाती है और छत डालने का काम आम तौर पर पुरुषों का होता है।
मुझे लगता है कि शिवराज सिंह चौहान को अमेरिका से प्रेरणा लेनी चाहिए। आपको याद होगा कि कोलंबस भारत की खोज में अमेरिका में उतर गया था और वहां के आदिवासियों को भारतीय समझ कर उन्हें रेड इंडियन नाम दे दिया था। यह थोपा हुआ नाम अब तक चलता आ रहा हैं। अमेरिका के समाज में रेड इंडियनों और अश्वेतों की कोई खास जगह नहीं हैं और बराक हुसैन ओबामा भले ही अमेरिका के अश्वेत राष्ट्रपति बने हो पर उनका मूल अमेरिका के आदिवासियों में नहीं है।
जो समाज और तंत्र आदिवासियों की रक्षा नहीं करता वह अपने इतिहास और संस्कार के प्रति न्याय नहीं करता। जहां तक मध्य प्रदेश के आदिवासियों का सवाल है तो उनमें से गिने चुने समाज की मुख्य धारा में आप आए हैं। कुछ विधायक, मंत्री और आरक्षित इलाकों में पंच, सरपंच भी बन गए हैं। फिर भी समाज की वर्ण व्यवस्था हावी है और आदिवासियों को चिडियाघर का जानवर मानने का अभियान भी जारी है। आदिवासियों में द्रविण्ा और इंडो एशियन, इंडो इरानियन और इंडो यूरोपियन वर्ग भी है जिन्हें अलग से शिनाख्त नहीं मिली है।
मध्य प्रदेश के पड़ोस में गुजरात में कई गांवो में ऐसे आदिवासी बसते हैं जिनका मूल दक्षिण अफ्रीका में हैं। देखने में वे एकदम अफ्रीकी लगते हैं लेकिन पीढ़ियों से गुजरात में रहने के कारण गुजराती ही बोलते हैं और अफ्रीकी भाषा स्वाहिली उनके लिए उतनी ही परायी है जितनी हमारे और आपके लिए। मध्य प्रदेश में ग्वालियर के पास रेशनपुरा और बदनापुरा नाम के दो गांव हैं जहां वेश्यावृत्ति समाजिक रिवाज का हिस्सा है। यहां की बहुत सुंदर लड़कियां दिल्ली, मुंबई और कोलकाता के लाल बत्ती इलाकों में भी पाई जाती है। यह मध्य प्रदेश के लिए गौरव की बात नहीं है।
मध्य प्रदेश की आदिवासी महिलाए साबित कर चुकी है कि उन्हें दया या परोपकार की जरूरत नहीं है। इतना काफी है कि उन्हें भारत के एक आम मगर अलग संस्कारों वाले नागरिकों के तौर पर स्वीकार किया जाए। संघ परिवार के आदिवासी और बनवासी कल्याण संघों के लिए यह बड़ी चुनौती थी और इसे उन्होंने काफी हद तक पार किया है। आदिवासी आम तौर पर अपनी दुनिया में रहने वाले लोग हैं लेकिन जिस तरह से समाज बदल रहा है और प्रगति की धाराएं बह रही है उन्हें देखते हुए आदिवासियों को विकास की मुख्य धारा में शामिल करना अनिवार्य है और देश में जितना बड़ा आदिवासी वर्ग है वह अगर विकास में जुड़ गया तो किसी भी देश और राज्य का सकल घरेलू उत्पादन काफी तेजी से आगे बढ़ेगा। मगर सवाल यह है कि पहल कौन करेगा? क्या शिवराज सिंह से उम्मीद की जा सकती है?