आलोक तोमर
आंध्र प्रदेश की वारंगल जेल में बंद माओवादियों के एक बड़े नेता से मध्य प्रदेश के भूतपूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह गुप चुप तरीकों से क्यों मिलना चाहते थे? जाहिर है कि वे चिदंबरम के खिलाफ मोर्चा खोल चुके हैं और माओवादियों से बातचीत के सूत्रधार बनना चाहते हैं।
माओवादी कमांडर तुषार कांत भट्टाचार्य ने पुलिस को बताया है कि हैदराबाद के कांग्रेस नेता ने दिग्विजय सिंह की ओर से जेल में आ कर उनसे बात की थी। तुषार कांत माओवादियों के सुप्रीम कमांडर गणपति के साथ एक मामले में सह अभियुक्त है। भट्टाचार्य ने यह भी कहा कि दिग्विजय सिंह के संदेश में यह भी कहा गया था कि मनमोहन सिंह और चिदंबरम तो सिर्फ सरकारी अफसर है मगर दिग्विजय सिंह जनता के नेता हैं। यह बैठक हैदराबाद के एक अस्पताल में होनी थी और सब कुछ तय हो चुका था मगर तभी मुख्यमंत्री वाई एस राजशेखर रेड्डी के हैलीकॉप्टर की दुर्घटना हो गई और बैठक नहीं हो सकी।
भट्टाचार्य का कहना है कि नवंबर 2009 में जब उन्हें जमानत मिली थी तो दिग्विजय सिंह ने उन्हें अपना मोबाइल नंबर, ई मेल पता और जिन लोगों से संपर्क किया जा सकता है, उनकी जानकारी भेज दी। दिग्विजय सिंह ने इस तरह के किसी भी प्रयास से इनकार किया है मगर तथ्य कुछ और कहते हैं। भारत सरकार ने माओवादियों के साथ हथियार छोड़ने की शर्त पर बातचीत की पेशकश की थी मगर दंतेवाड़ा नरसंहार के बाद इस पेशकश का कोई अर्थ नहीं रह गया। सब जानते हैं कि दिग्विजय सिंह और पी चिदंबरम एक दूसरे को कोई खास पसंद नहीं करते और दिग्विजय सिंह तो घोषित तौर पर चिदंबरम को अड़ियल और घमंडी कह चुके हैं और बाद में दोस्त के नाते सॉरी भी बोल चुके हैं।
उधर दिग्विजय सिंह के मध्य प्रदेश में ही अब माओवादियों की हरकतों में तेजी आने लगी है। छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र के इसी दीवाली के दिन सौ से ज्यादा माओवादी मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र सीमा पर भोपाल से 430 किलोमीटर दूर बालाघाट जिले में घुसे थे और पुलिस अब तक उनको तलाश कर रही है। बालाघाट के पुलिस अधिकारियों के अनुसार ये लोग छत्तीसगढ़ में राजनांदगांव और महाराष्ट्र में गोंदिया से घुसे थे। इसी जिले के लांझी जंगल में माओवादियों के हथियारों का एक बड़ा जखीरा पकड़ा गया था और इसकी सूचना दो स्थानीय माओवादियों ने ही दी थी। इनके नाम कैलाश बैगा और बुधारी सिंह है। दोनों राजनांदगांव जिले के रहने वाले हैं।
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी चिदंबरम से सवाल किया है कि बालाघाट जिले में माओवादी उपस्थिति की इतनी साफ सुथरा मिलने के बाद भी वहां से सीआरपीएफ के दस्ते क्यों हटा लिए गए? श्री चौहान ने चिदंबरम से पूछा है कि माओवादियों के लाल गलियारे के एकदम पड़ोस में होने के बावजूद बालाघाट जिले की सुरक्षा सिर्फ स्थानीय पुलिस के हवाले क्यों छोड़ दी गई है और राज्य सरकार को सिर्फ एक पत्र लिख कर क्यों बताया गया है कि सीआरपीएफ बालाघाट से हटाई जा रही हैं?
बालाघाट में बारूदी सुरंगे पाई गई हैं और मजदूरों के वेश में रह रहे सात कुख्यात माओवादी बालाघाट और पड़ोसी शहडोल जिले से गिरफ्तार किए गए। इनमें से एक महिला माओवादी भी है जिसका नाम कमला बताया गया है और जिसके सिर पर तीस हजार रुपए का इनाम हैं। बालाघाट जिले के कोढ़ापार जंगल से पकड़ी गई कमला कई पुलिस मुठभेड़ों में हिस्सा ले चुकी है और कई सरकारी अधिकारियों की हत्या कर चुकी है। कमला के पहले बीस हजार का इनाम रखने वाली उसकी बहन निर्मला को पकड़ा गया था। निर्मला ने एक माओवादी श्याम लाल से गढ़चिरौली में शादी की थी।
शिवराज सिंह चौहान इतने समर्थ हैं कि वे अपनी पुलिस के जरिए ही बालाघाट में माओवादियों का मुकाबला कर सकते हैं और कर रहे हैं। लेकिन माओवादियों से निपटने के चिदंबरम के तौर तरीकों पर दिग्विजय सिंह और रमन सिंह दोनों ही नाराज हैं और राजनीति को भूल कर अगर वे एक साथ आ जाते हैं तो बालाघाट और शहडोल को बचाया जा सकता हैं।
दिग्विजय सिंह की चिंता चिदंबरम की शैली को ले कर नाजायज नहीं है क्योंकि यह सही है कि चिदंबरम और मनमोहन सिंह दोनों ही सरकारी बाबुओं की तरह काम कर रहे हैं। दोनों को माओवादी हिंसा असल में एक सैध्दांतिक संघर्ष नजर आ रही है और बड़ी भारी समस्या यह है कि माओवादी चाहे जिस सिध्दांत पर भरोसा करते हो, असल में उनका इरादा और तरीका मौत ही है। वे मौत बेचते हैं और सरकार के साथ मौत का ही सौदा करना चाहते हैं। उनसे बंदूक के अलावा और किसी भाषा मेंं बात नहीं की जा सकती।
दंतेवाड़ा नरसंहार के बाद सीआरपीएफ के जो बड़े दस्ते वहां पहुंचाए गए थे उनके लिए राशन पानी पहुंचाने के सारे रास्ते भी माओवादियों ने सुरंगे बिछा कर बंद कर दिए हैं और सरकारी अधिकारी रायपुर में बैठ कर बैठके करने के अलावा और कुछ नहीं कर पा रहे। दंतेवाड़ा, बोकारो, घाटशिला और मलकानगिरि तो माओवादियों की हरकतों की वजह से खबरों में बहुत आते रहते हैं मगर बालाघाट और शहडोल में भी आतंकवादी खतरा मडरा रहा है और चिदंबरम को उसका शायद कोई खयाल नहीं है। ऑपरेशन ग्रीन हंट चला रहे विजय रमन तो मध्य प्रदेश में ही लगभग पूरी जिंदगी आईपीएस अधिकारी रहे हैं और उनसे उम्मीद की जानी चाहिए कि वे चिदंबरम को इन दोनों जिलों की असलियत बताएंगे।