मायावती और नीरा राडिया में फर्क क्या है?
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आलोक तोमर
लोकतंत्र में और खास तौर पर भारतीय लोकतंत्र में जब सत्ता के दलालों और ब्लैकमेल की राजनीति करने वालों का नाम लिखा जाएगा तो बीएमडब्ल्यू यानी बहन मायावती पर कम से कम चार पांच अध्याय तो जरूर होंगे। यह बात अलग है कि आम तौर पर कई बार टूटने के बाद भी फिर भी विश्वास कर लेने वाले हमारे समाज में मायावती देश के एक सबसे बड़े राज्य की मुख्यमंत्री हैं और अगर वे जुगाड़ की अपनी राजनीति से देश की प्रधानमंत्री भी बन जाए तो मुझे झटका जरूर लगेगा मगर आश्चर्य नहीं होगा।

मायावती एक बहुत गरीब दलित परिवार से निकल कर दलिताें की महारानी बन गई है और महारानियों की तरह ही हीरे और मुकुटों का शौक रखती है, असल में अपने राजनैतिक अभिभावक कांशीराम के फॉर्मूले को बहुत आगे तक ले आई हैं। वे वर्तमान में विश्वास करती है। आज जो काम का है वह उनकी गोद में बैठ सकता है और काम निकल जाने पर उसे दरबार में घुसने की जगह ही नहीं मिलती। द्वारपाल भी बहुत जल्दी बदले जाते रहते हैं।

कुख्यात अंसारी बंधुओं से ले कर सतीश मिश्रा तक इस बात की कसम खाएंगे कि बहन जी को जब जब और जब तक उनकी जरूरत थी तब तक उनका इस्तेमाल किया गया और सिर्फ इस्तेमाल ही नहीं, उनकी राजनीति को एक हद तक तबाह भी कर दिया गया। हमारे मित्र सुधीर गोयल बताते हैं कि मायावती सरकार में कैबिनेट मंत्री के तौर पर उन्हें शपथ दिलवाई गई और शपथ के कुछ ही घंटो बाद इस्तीफा ले लिया गया। इसके बाद अखबार में छपी एक खबर के आधार पर सुधीर गोयल की विधान परिषद की सदस्यता के नवीनीकरण से भी इनकार कर दिया गया और सुधीर गोयल उन लोगों में से हैं जिन्होंने मायावती के मशहूर वैश्य-ब्राह्मण समीकरण को एक नया आयाम दिया था। ब्राह्मणों को दलितों की पार्टी की ओर सतीश मिश्र ले कर आए थे और वैश्यों को सुधीर गोयल।  सुधीर गोयल एक जमाने में मायावती के गुरु कांशीराम के भी राजनैतिक सलाहकार हुआ करते थे और इन दिनों घर पर बैठे हेैं। एक जमाने में देवीलाल के साथ लोकदल में रहे सुधीर शरद यादव और केसी त्यागी के साथी रहे हैं और इन दोनों ने वर्तमान राजनैतिक हालाताें से तालमेल बिठाया और आज भी राजनीति में अस्तित्व में बने हुए हैं।

कम लोग जानते हैं कि दिल्ली के पड़ोस में गाजियाबाद में जन्मी मायावती को दिल्ली का होटल ओबेरॉय बहुत प्यारा हैं और वे वहां के ब्यूटी सैलून में अक्सर अपना चेहरा चमकाने और कटिंग करवाने जाती हैं। मायावती के पास मूर्तियों और पार्को के लिए असीमित पैसा हैं लेकिन शिक्षा के अधिकार को लागू करने के लिए वे केंद्र सरकार का खजाना चाहती हैं। सब जानते हैं कि दलित वोटों पर कब्जे के लिए उत्तर प्रदेश में राहुल गांधी और मायावती के बीच प्रतियोगिता चल रही है और मायावती सीबीआई द्वारा उनके खिलाफ दर्ज मामलों को कांग्रेस का प्रतिशोध बताते नहीं थकती फिर भी वित्त विधेयक पर वोटिंग के दौरान कांग्रेस की मदद करने के लिए उन्होंने सदन से अनुपस्थित रहने का फैसला किया। उन्होंने कहा कि केंद्र में सांप्रदायिक ताकतें मजबूत नहीं हो इसके लिए वे हर संभव कोशिश कर रही हैं। सांप्रदायिक ताकतों का मतलब भारतीय जनता पार्टी जिनके साथ मिल कर मायावती ने पहली बार उत्तर प्रदेश में सरकार बनाई थी। गरीबों और दलितों की नेता मायावती अपने जन्मदिन का समारोह बहुत धूम धड़ाके से मनाती रही है। खूब मुकुट और थैलियां लेती रही है और इसे देश के दलित वर्ग का अपने आपको मिलने वाला स्नेह बताती रही है लेकिन सामंती अय्याशी करने से उन्हे कोई नहीं रोक सकता।

मायावती के खिलाफ जो लिखेगा वह मनुवादी कहलाएगा। मनु के बहुत खिलाफ है मायावती। इन्हीं मनु ऋषि ने वह वर्ण व्यवस्था लिखी थी जिसकी वजह से वह वर्ग बना है जिसका नेतृत्व माया मैम साहब कर रही है। लेकिन कैसे कर रही है? मायावती के काफिले में बारह जहाज और हैलीकॉप्टर है जिनमें से एक बीचक्राफ्ट जैट भी है जिसे वे अपने उड़ते हुए ऑफिस की तरह इस्तेमाल करती है।

मायावती को अपनी शान में कोई गुस्ताखी मंजूर नहीं। केंद्र सरकार ने जांच कर के सुरक्षा नियमों के तहत उन्हे एसपीजी की सुरक्षा देने से इंकार कर दिया तो उन्होंने करोड़ो रुपए खर्च कर के एसपीजी की तर्ज पर ही अपनी कमांडो फोर्स बना ली। उत्तर प्रदेश देश का वह अकेला राज्य हैं जहां संयुक्त सचिव स्तर के एक मामूली अफसर को प्रधानमंत्री की तर्ज पर कैबिनेट सचिव कहा जाता हैं। नाम से कुछ नहीं होता। इस कैबिनेट सचिव की भी हैसियत बहन जी के दरबार में चपरासी से ज्यादा नहीं होती।

भारत के सोलह करोड़ से ज्यादा दलित मायावती की अय्याशियों से सम्मोहित हैं। वे बहन जी को हैलीकॉप्टर में उड़ता देख कर खुश होते हैं और आधी रोटी खा कर और पानी पी कर सो जाते हैं। मायावती खुद कहती है कि उन्हें झूठ बोलना पसंद हैं और अगर उनके झूठ बोलने से देश में दलितों की सरकार बन जाती है तो वे पचास बार झूठ बोलेंगी।

एक बार जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के खिलाफ विश्वासमत पर मतदान होना था तो मायावती ने भाजपा के मैनेजरों को विश्वास दिलाया था कि वे सरकार के पक्ष में वोट डालेंगे। मतदान के ठीक पहले पता नहीं क्या कारनामा हुआ कि मायावती के सारे सांसद सरकार के खिलाफ वोट डालने पहुंच गए और बाद में मायावती ने सफाई में काफी निर्लज्जता से यह कहा कि उनकी राजनीति में यही उचित था कि वाजपेयी सरकार गिर जाए, चुनाव हो और चुनाव में बहुजन समाज पार्टी इतने ज्यादा सांसद ले कर आए कि सत्ता पर काबू रख सके। सत्ता की यह दलाली मायावती को बहुत भाती है और इस मामले में वे नीरा राडिया से बहुत अलग नहीं हैं। नीरा राडिया पैसे के लिए धंधा करती है और लगभग यही धंधा मायावती राजनीति के लिए करती है। मायावती अब अपने आप में इतनी बड़ी ताकत बन गई है कि उनके धंधे पर कोई सवाल भी नहीं उठाता।  मायावती ताकत हैं तो ताकत मानना पड़ेगा लेकिन इस ताकत के पीछे जो कालिख है वह भी समझनी पड़ेगी। इसके बगैर उपाय नहीं है।