आलोक तोमर
पी चिदंबरम पर पहले गर्व होता था, फिर दया आती थी और अब गुस्सा आने लगा है। उनका ऑपरेशन ग्रीन हंट माओवाद के खिलाफ पहले कदम पर ही लड़खड़ता नजर आ रहा था और अब तो इस बात की पुष्टि हो गई है कि माओवादियों का रेड हंट भारत सरकार के ग्रीन हंट पर भारी पड़ रहा है। सिर्फ छत्तीसगढ़ में पिछले तीन महीने में दो सौ पचास मौते हुई है। इनमें से एक सौ तिरपन सुरक्षा कर्मचारी या पुलिस वाले हैं और बाकी आम आदिवासी जिन्हें माओवादियों ने उनके कल्याण का सपना दिखाया था।
यह सही है कि इतने बड़े देश में किस जगह जमा हो कर माओवादी कौन सी बड़ी वारदात करने वाले है, इसका अंदाजा हर वक्त नहीं लगाया जा सकता। मगर सिर्फ दंतेवाड़ा में लगातार बसे उड़ाई जा रही थी, मुखबिर होने के इल्जाम में आदिवासी पंचों और सरपंचों को माओवादियों की पंचायत खाप अदालत बन कर सजाए मौत सुनाती और तुरंत सिर कलम कर देती है तो समझना चाहिए कि कहीं न कहीं खोट जरूर है। यह खोट इरादों में नहीं तो नीतियों में है।
अभी उस दिन चिदंबरम कह रहे थे कि वे माओवादियों को आतंकवादी मानने के लिए तैयार नहीं है। उनकी वकील बुद्वि की माने तो सारे माओवादी गांधीवादी हैं और कुछ दिन के लिए उन्होंने हथियार उठा लिए है। जिन माओवादियों ने ऐलानिया तौर पर कह दिया है कि वे भारत के संविधान को अवैध मानते हैं और इस संविधान के आधार पर चल रही सरकार से किसी किस्म की बातचीत नहीं करना चाहते, उनसे देश को और देश के गृह मंत्री चिदंबरम को किस बातचीत की उम्मीद है। बातचीत में जितने शब्द नहीं बोले जाएंगे उससे ज्यादा लाशे उड़ीसा, झारखंड, बंगाल, बिहार और छत्तीसगढ़ में गिरती रहेगी।
चिदंबरम का नया पैतरा यह है कि उनके पास सीमित अधिकार है। एक तो वे शब्दों का गलत इस्तेमाल कर रहे है। उन्होंने अंग्रेजी में कहा कि मेरे पास लिमिटेड मेंडेट है। मेंडेट का अर्थ जनादेश या मिले हुए अधिकार क्षेत्र को कहते हैं। क्या चिदंबरम यह कहना चाहते है कि भारत के प्रधानमंत्री ने उनके हाथ बांध रखे हैं और वे सीआरपीएफ को हर आदेश देने के पहले उसकी प्रति प्रधानमंत्री को दिखा लेते? अगर उनके अधिकारों को सीमित कर दिया गया है और इस वजह से देश के सामने वे निकम्मे साबित हो रहे हैं तो वे अपनी आत्मा से पूछा कर देखे कि क्या उन्हें देश का गृह मंत्री बने रहना चाहिए।
इस मामले में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह का नजरिया एकदम साफ है। एक तो वे माओवादियों को आतंकवादी कहने में एक पलक नहीं झपकते और यह जिम्मेदारी स्वीकार करने में भी उन्हें कोई दिक्कत नहीं होती कि केंद्रीय बलों के माओवाद प्रभावित क्षेत्रों में तैनात किए जाने में राज्य सरकार की पूरी जिम्मेदारी है। मगर रमन सिंह यह भी कहते है कि दंतेवाड़ा में जो हुआ वह अब स्थानीय कानून और व्यवस्था की चीज नहीं रह गई है। उन्हाेंने तो दंतेवाड़ा की स्थिति जम्मू कश्मीर और एक जमाने के पंजाब के आतंकवाद से कर दी है।
चिदंबरम को रमन सिंह से कम से कम विनम्रता से चूक स्वीकार कर लेने की शैली सीखनी चाहिए। दिल्ली में योजना आयोग की बैठक में आए रमन सिंह ने कहा कि लोकतंत्र के इतिहास की आज तक की सबसे बड़ी लड़ाई छत्तीसगढ़ में चल रही है और मैं अपनी पुलिस और केंद्रीय बलों के तालमेल से इसे जीत कर दिखाऊंगा। चिदंबरम को घमंडी, अड़ियल और किसी की नहीं सुनने वाले कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने फिर जिम्मेदारी तय करने की बहस छेड़ दी है और इसमें भी साफ साफ इशारा है कि जिम्मेदारी सिर्फ राज्य सरकार की नहीं है। चिदंबरम खुद कह रहे हैं कि समस्या अब इतना विकराल रुप धारण कर चुकी है कि जिम्मेदारी सिर्फ राज्य सरकार पर नहीं डाली जा सकती।
अपने अधिकारों और कर्तव्य क्षेत्र के - वही लिमिटेड मेंडेट वाले तर्क के बारे में भी चिदंबरम का कहना है कि माओवादी चुनौती ने इस पूरे मामले में उनकी राय बदल दी है। उन्होंने कहा है कि चूंकि राज्य सरकारों को इस समस्या से निपटने की प्राथमिक जिम्मेदारी दी गई है इसलिए मैं अपने अधिकारों को सीमित मानता था। मगर इस शब्द से खेलने की कोई जरूरत नहीं हैं क्योंकि इस आधार पर तो यह भी कहा जा सकता है कि राज्यों के मुख्यमंत्रियों के पास भी सीमित अधिकार है।
भारतीय जनता पार्टी ने चिदंबरम को राजीव गांधी की याद दिलाई है जिन्होंने राज्यों की कानून व्यवस्था स्थिति में राज्यों द्वारा ठीक से उपलब्ध कानूनी प्रावधानों के आधार पर निपटने में असमर्थ रहने पर टाडा जैसा कानून बनाया था। भारतीय जनता पार्टी खुल कर रमन सिंह के साथ हैं और उनसे कहा है कि वे माओवादियाें की चुनौती को मंजूर करे और उन्हें दिखाने की माओवादियों से निपटने में किसी से कम नही।
रमन सिंह को दिग्विजय सिंह ने माओवाद पर शास्त्रार्थ करने की चुनौती दी थी। दिल्ली में जब रमन सिंह से दिग्विजय सिंह की टिप्पणी के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि दिग्विजय सिंह जब चाहे उनसे बात कर सकते हैं लेकिन हमें तो मिल कर माओवाद का सामना करना है। आपस में बातचीत तो हम करते ही रहेंगे। रमन सिंह दिल्ली में प्रधानमंत्री और गृह मंत्री से भी मिल कर गए है।
चिदंबरम और रमन सिंह इस बात पर एकमत है कि माओवादी प्रभाव वाले इलाकों में बमबारी करने से कोई फायदा नहीं क्योंकि इसमें निर्दोष मारे जाएंगे। मगर उन्हाेंने यह जरूर कहा कि भारत की सेना बहुत मजबूत हैं और उसका सहारा मिले तो माओवादियों को और ज्यादा कुशलता से जवाब दिया जा सकेगा। रमन सिंह यह मंजूर करने को भी तैयार नहीं हैं कि छत्तीसगढ़ में बड़े घरानों द्वारा पूंजी निवेश और नए जमींदारों यानी पंजीपतियों के आने की वजह से माओवादियों ने छत्तीसगढ़ को अपना निशाना बनाने की पहल की है।
रमन सिंह का सवाल है कि आदिवासी इस तरह की जटिल तकनीक वाली बारुदी सुरंगे नहीं बना सकते जिनसे इतने बड़े विस्फोट किए जा सके। यह पता लगाना केंद्र सरकार का काम है कि उन्हें तकनीकी और आर्थिक सहायता कहां से मिल रही है। चिदंबरम और रमन सिंह आपसी बहस में उलझ गए हैं और माओवादी इसका फायदा उठा रहे है। रही बात दंतेवाड़ा की तो वहां लगातार हमले इसलिए हो रहे हैं क्योंकि जगदलपुर के आगे दंतेवाड़ा उस राजमार्ग पर हैं जो आंध्र प्रदेश और उड़ीसा जाता है और महाराष्ट्र का गढ़चिरौली भी वहां से बहुत दूर नहीं है। दंतेवाड़ा को तो विशेष आर्थिक अपराध क्षेत्र के तौर पर घोषित किया जाना चाहिए।