आलोक तोमर
मनमोहन सिंह की यूपीए द्वितीय की सरकार का पहला श्वेत पत्र या रिपोर्ट कार्ड कुल मिला कर फर्जी है। मनमोहन सिंह की इस सरकार की असली उपलब्धि तो यही रही है कि मंत्री एक दूसरे से झगड़ते रहे हैं और बड़े घोटालों के सबूत सामने आ जाने के बावजूद मंत्रियों को हटाया नहीं जा सका है।
गठबंधन राजनीति की मजबूरी में संचार मंत्री राजा को नहीं हटाया गया जबकि मनमोहन सिंह के पास शशि थरूर को हटाने का साफ साफ उदाहरण मौजूद था। मंत्रियों ने भी बहुत तीर नही मारे है। राजस्थान से आए सीपी जोशी सबसे महत्वपूर्ण माने जाने वाले ग्रामीण विकास मंत्रालय के मंत्री है और सरकार का सबसे महत्वपूर्ण अभियान मनरेगा लागू करने का जिम्मा भी उन्हीं का है। मगर उन्हें क्रिकेट के कारोबार में ललित मोदी को निपटाने से फुरसत मिले तब न। मनरेगा में दुनिया के सबसे आर्थिक घोटाले हो रहे हैं। मगर यह जरूर है कि सीपी जोशी के मंत्रालय की वेबसाइट को सबसे अच्छी सरकारी वेबसाइट का इनाम मिल चुका है।
उधर प्रफुल्ल पटेल है जिनकी बेटी आईपीएल के लिए पापा के आदेश पर चलने वाले जहाज भी उड़ा देते हैं और दूसरे मामले में एयर इंडिया को आदेश दिया जाता हेै कि बड़ा विमान ले जाना क्योंकि मंत्री जी की बेटी बिजनेस क्लास की बजाए फर्स्ट क्लास में बैठ कर जाएगी। पी चिदंबरम को अब तक यह समझ में नहीं आया कि माओवादियों से निपटना हेै या उनसे बातचीत करनी हैं। दंतेवाड़ा में जो हो रहा है उसके बाद भी चिदंबरम को अगर मनमोहन सिंह बहुत सारे नंबर उन्हें देना चाह रहे हैं तो उनकी मर्जी है वरना खुद मनमोहन सिंह को उनके अनिर्णयों और लगातार बढ़ती महंगाई के अलावा सरकार में दलालों के प्रवेश के कारण खुद कितने नंबर मिलने चाहिए यह आप खुद तय कर लीजिए।
शरद पवार से ज्यादा निकम्मा और नालायक मंत्री तो शायद ही कोई हो। खाद्य मंत्री के तौर पर बार बार भूले भटके बयान देते हैं। कभी कहते है कि देश में खूब पैसा है तो कभी कहते हैं कि देश के किसान दुनिया के सबसे सुखी किसान है। फिर कहते हैं कि जरूरत पड़ी तो विदेशों से अनाज आयात किया जा सकता है। दलाली का एक और रास्ता निकल आया। वैसे भी बारामती के शक्कर और शराब बनाने वालों के तौर पर अपने आपको किसान और किसानों का मसीहा कहने वाले शरद पवार असम में क्रिकेट के मसीहा हैं।
यूपीए द्वितीय में सबसे ज्यादा नंबर प्रणब मुखर्जी को मिलने चाहिए और इसलिए नहीं कि उनकी बेटी मेरी दोस्त हैं बल्कि इसलिए कि उन्होंने वित्त मंत्रालय जैसा जटिल विभाग इसके अलावा सरकार की अनगिनत कमेटियों के वे सदस्य हैं और इस उम्र में भी लगभग 22 घंटे काम करते हैं। झपकी कभी कार में लगा लेते हैं तो कभी जहाज में।
एक ममता बनर्जी हैं जिनके जिम्मे देश की रेले चलाने का काम है लेकिन उनका ज्यादातर वक्त दिल्ली के रेल भवन की बजाय कोलकाता में कभी नगरपालिका तो कभी नगर निगम के चुनाव लड़वाने में बितता है। अक्सर वे कांग्रेस से रूठ जाती है और यह भी कोई नहीं जानता कि वे बंगाल के अलगे विधानसभा चुनाव तक यूपीए के साथ रहेंगी या नहीं। पहले तो पिछले विधानसभा चुनाव में उन्होंने एनडीए छोड़ कर कांग्रेस का साथ दिया था और फिर जॉर्ज फर्नांडींज की मेहरबानी से एनडीए में वापस आ गई थी। इन दिनों कांग्रेस के साथ है मगर कब तक यह कोई नहीं जानता।
मनमोहन सिंह की सरकार में सबसे हास्यास्पद मंत्री के तौर पर एस एम कृष्णा की गिनती करनी पड़ेगी क्योंकि वे हमेशा गलत जगह पर गलत बात कहते है। जयराम रमेश ने तो एक बयान दे दिया और उसी पर हंगामा हो गया लेकिन एस एम कृष्णा तो बार बार ऐसे बयान देते रहे है जिन्हे सुन कर सरकार भी शर्मा जाए। कभी अरुणाचल प्रदेश पर बोल पड़ते है तो कभी पाकिस्तान जाने के ठीक पहले कश्मीर का मुद्दा उठा कर पाकिस्तान को भी मौका दे देते हैं कि वह यह मुद्दा उठा सके। आखिर ऐसे आदमी को जिसे असल में नगरपालिका अध्यक्ष होना चाहिए था या शायद वह भी नहीं, मनमोहन सिंह किस मजबूरी में अपने साथ रखे हुए हैं।
जयराम रमेश ने चीन जा कर भारत के गृह मंत्री के खिलाफ ही नहीं बल्कि पूरी भारत सरकार की विदेश नीति के खिलाफ बयान दे डाला मगर उनसे सिर्फ सफाई मांगी गई। उन्होंने चिदंबरम से सुनते है कि माफ मांग लिए मगर आज तक चिदंबरम ने इस बारे में कोई टिप्पणी नहीं की है। जयराम रमेश देश भर में विकास की ज्यादातर योजनाएं स्थगित करवाने में लगे हुए हैं। कहीं राजमार्ग बंद करवाते हैं तो कहीं बांध रुकवाते हैं तो कहीं अच्छी खासी चलती हुई सरकारी फैक्टिरियों पर अपने पर्यावरण की आचार संहिता लाद कर उन्हें बंद करवाने पर तुल जाते हैं। इतना ही नहीं, जयराम रमेश चूकि विश्व बैंक की पृष्ठभूमि से हैं और मनमोहन सिंह के पुराने सहयोगी रहे हैं इसलिए उन पर कभी आंच नहीं आती।
पिछली यूपीए सरकार में पूरी दुनिया में भारत के व्यापारिक हितों का डंका पीट देने वाले और दुनिया की बड़ी व्यापारिक शक्तियों को भारत के हित में बोलने पर मजबूर कर देने वाले कमलनाथ ने ऐलान किया था कि वे रोज बीस किलोमीटर राजमार्ग बनाएंगे। असल में आज यह आंकड़ा दस किलोमीटर का भी नहीं हैं और इसकी एक बड़ी वजह खुद जयराम रमेश है। जयराम रमेश ने न सिर्फ जंगलों के बीच से राजमार्ग निकालने के कमलनाथ के विचार को खारिज कर दिया है और उस पर रोक लगा दी है बल्कि इसका कोई वैकल्पिक उपाय भी उनके पास नहीं है।
मनमोहन सिंह की दूसरी सरकार का रिपोर्ट कार्ड एक शब्द में कहे तो दयनीय है। आखिर जिस देश में अब भी गरीबी की रेखा के नीचे एक तिहाई आबादी रहती हो, जहां रोजगार कार्यालयाें तक लोग नहीं पहुंचते हो और पहुंचते भी हैं तो उम्र बीत जाती है मगर रोजगार नहीं मिलता, जहां राजनीति में महिलाओं के आरक्षण विधेयक पास नहीं होता और जहां जनगणना में जाति को शामिल करने को ले कर भयानक सवाल उठाए जा रहे हो वहां देश कैसा चल रहा है और राजनीति कैसी हो रही है यह सवाल ही बेमानी हो जाता है।