कितनी स्वायत्ता चाहिए कश्मीर को?
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आलोक तोमर
मनमोहन सिंह को पता नहीं क्या जल्दी पड़ी थी कि उन्होंने कश्मीर को स्वायत्ता देने के लिए एक नहीं, चार चार कमेटियां बना डाली। कश्मीर वैसे ही काफी स्वायत्त है। भारत की सेनाएं और सुरक्षा बल चार करोड़ रुपए रोज खर्च कर के उसे स्वायत्त और पाकिस्तान से बचाए रखती है। शुरूआती तर्क यह था कि पाक अधिकृत कश्मीर को स्वायत्ता दी गई है और वहां अब भी मुख्यमंत्री को आज भी वजीर ए आजम कहा जाता है। यह बात अलग है कि हमारी कश्मीर विधानसभा में इस पाक अधिकृत कश्मीर की विधानसभा सीटों के लिए अब भी खाली कुर्सियां रखी हुई है, इस उम्मीद में कि कभी न कभी तो यह हिस्सा भी हमारे पास आएगा।

इंदिरा गांधी से ले कर अटल बिहारी वाजपेयी तक पाकिस्तान से जब भी जंग हुई है, ऐसे हालात बार बार बने हैं कि भारत की सेना लाहौर के अनारकली बाजार में तिरंगा गाढ़ सकती थी मगर ऐसा नहीं हुआ। पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज नहीं आया और सीमा पार से लगातार गोलियां चलती रही। अब तो सीमा पार से भारतीय सेना के बंकरों को निशाना बनाया जाने लगा है। जिस भारत सरकार ने कश्मीर को स्वायत्ता देने के लिए रिपोर्ट तैयार की है उसमें कश्मीर के मुख्यमंत्री रह चुके और वर्तमान मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के अब्बा जान फारूख अब्दुल्ला भी मौजूद है। नेशनल कांफ्रेंस की स्वायत्ता वाली मांग पुरानी है। 

पाकिस्तान में गुलाम कश्मीर के भी टुकड़े कर दिए गए हैं। बाल्टिस्तान और गिलगित को इससे अलग रखा गया है। वहां राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के अलावा उनकी अपनी सुप्रीम कोर्ट भी हैं। तकनीकी रूप से भारत और कश्मीर का रिश्ता संचार, सुरक्षा, विदेश नीति और मुद्रा तक ही रह गया है। स्वायत्ता की जो शर्मनाक रिपोर्ट मनमोहन सिंह सरकार ने तैयार की हैं उसे भी अभी कश्मीर विधानसभा ने मंजूर नहीं दी हैं जबकि वहां नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस की मिली जुली सरकार है।

कश्मीर में आजादी की मांग करने वाले और पाकिस्तान में विलय चाहने वाले बहुत से नासमझ लोग हैं जिनको यह समझ में नहीं आता कि कश्मीर की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए उसे भारत या पाकिस्तान दोनों में से एक को चुनना ही होगा। कश्मीर को ठीक से चलाने के लिए और वहां का विकास करने के लिए राज्य के तीन हिस्सों में विभाजन की जो मांग की जा रही है उसकी तार्किकता पर संदेह नहीं किया जा सकता।

आखिर जो लोग कश्मीर गए हैं वे जानते हैं कि जम्मू का मिजाज और समाज दोनों अलग हैं, बोली अलग हैं और धार्मिक प्राथमिकताएं भी अलग है। जब कश्मीर घाटी में बर्फ पड़ती है तो विधानसभा सत्र जम्मू में होता है और सरकार भी जम्मू से ही चलती है। लेकिन सर्दी का यह तर्क बहुत ज्यादा समझ में आने वाला है नहीं। आखिर स्विट्जरलैंड में तो बारह महीने बर्फ जमी रहती है मगर वहां की संसद और सरकार को उठा कर किसी गर्म देश में नहीं ले जाया जाता। अमेरिका के वॉशिंगटन में भी अच्छी खासी सर्दी पड़ती हेै मगर व्हाइट हाउस खाली नहीं कर दिया जाता।

फिर कश्मीर में असली मुसीबत तो लेह, लद्दाख के इलाके की है। सोनमर्ग के पास जो जिला दर्रा पार होते ही लद्दाख शुरू हो जाता है और शिया बहुल इस इलाके में आतंकवाद की कोई घटना कभी नहीं सुनी गई। मगर लद्दाख को शेष भारत से जोड़ने वाले हाइवे को रोकने के लिए ही मुशर्रफ ने कारगिल की लड़ाई शुरू की थी। लड़ाई दरअसल कारगिल में नहीं हुई थी बल्कि कारगिल जिले में द्रास सेक्टर में हुई थी। लेकिन इस इलाके की कश्मीर सरकार ने जो भयानक उपेक्षा की है उसे देख कर शर्म आती है।

एक तो इंग्लैंड के आकार के लद्दाख इलाके में सिर्फ दो ही जिले हैं। एक लेह हैं और दूसरा कारगिल। सिंधु नदी जिसके नाम पर हिंदुस्तान बना हैं, यहां बहती हैं मगर यहां के लोगों के लिए न तो शिक्षा के साधन उपलब्ध हैं और न रोजगार के। पूरी कश्मीर घाटी में सरकारी कर्मचारियों की अगर गिनती की जाए तो लद्दाख के निवासी मुश्किल से आधा प्रतिशत भी नहीं निकलेंगे। कारगिल अच्छा खासा कस्बा हैं जहां दो बड़े होटल भी हैं मगर कोई बड़ा स्कूल नहीं हैं। लेह में जरूर बड़े होटल भी हैं और अब तो दिल्ली पब्लिक स्कूल की शाखा भी वहां खुल गई हैं।

फिर भी इस पूरे इलाके में स्थानीय लोगों से ज्यादा फौज नजर आती है। दूर दूर तक आबादी नहीं हैं और जानलेवा दुर्गम रास्तों पर बीच बीच में बसे छोटे गांव है। दुनिया के दूसरे सबसे ठंडे इस इलाके में एक ही फसल उगाई जा सकती है और जो लोग नियंत्रण रेखा पर रहते हैं वे तो हमेशा पाकिस्तानी गोलीबारी के साए में ही रहने पर मजबूर हैं।

सर्दियों में अगर कारगिल में कोई असाध्य रूप से बीमार पड़ जाए तो उसे बचाने का या श्रीनगर या लेह के अस्पतालों में ले जाने का कोई साधन नहीं हैं। कश्मीर सरकार ने दिल्ली बात कर के कारगिल और श्रीनगर के बीच एक विमान सेवा का इंतजाम भी किया गया था लेकिन रनवे सेना के कब्जे में हैं और विमान का कुछ तय नहीं हैं कि वह कब आएगा और कब नहीं आएगा?
स्वायत्ता का जहां तक सवाल हैं तो भारत ने कश्मीर को वैसे भी काफी स्वायत्ता दे रखी हैं और सूचना के अधिकार जैसे जरूरी कानून को कश्मीर में लागू करवाने में चार साल लग गए और कश्मीर विधानसभा में इसे मंजूर करते समय इसमें इतने सारे बदलाव किए गए कि अब भी सूचनाएं सरकारी अधिकारियों के पास बंधक पड़ी हुई है।