आलोक तोमर
संत विनोबा भावे गांधी जी के अंधे अनुयायी नहीं थे। समाज को बदलने की उनकी अपनी परिभाषाएं थी। वे जानते थे कि देश में इतनी जमीन हैं कि सबका पेट भर सकता हैं लेकिन भूमिका वितरण बहुत असमान है। ज्यादातर किसान सीमांत कृषको के वर्ग में आते हैं जिनके पास एक या दो बीघा जमीन हैं और वे उसमें अपने परिवार का गुजारा नहीं कर सकते। करोड़ों लोग तो ऐसे है जिनके पास एक इंच भी जमीन नहीं हैं।
विनोबा को भारतीय संस्कृति में दान का महत्व मालूम था। गोदान से मोक्ष मिलता हैं यह एक जानी मानी धारणा है। इस धारणा को आगे बढ़ाते हुए विनोबा की मंडली ने 1951 में आंध्र प्रदेश के पोचमपल्ली गांव से भूदान की शुरूआत की और अब तो सरकारी रिकॉर्ड में इस गांव का नाम भूदान पोचमपल्ली है। भूदान मिशन की मुख्य धारा यह थी कि जमींदारों के पास जा कर उनसे सात्विक तौर पर भीख मांगी जाए और कहा जाए कि वे अपने जमीन का एक छोटा सा हिस्सा गरीबों और दलितों को दे दे। विनोबा दस साल से ज्यादा पूरे भारत में घूमते रहे और लोगों को समझाते रहे कि गांधी जी की सर्वोदय की जो धारणा है भूदान उसी का एक विस्तार है।
सामाजिक न्याय की दिशा में आजाद भारत में यह एक पहला कदम था और विनोबा को बीस हजार वर्ग किलोमीटर जमीन पूरे देश में मिली जो उन्हाेंने राज्य सरकारों को सौंप दी कि उन्हें गरीबों में बांट दिया जाए। इसी भूदान यात्रा के दौरान चंबल घाटी में उन्होंने डाकुओं का पहला आत्म समर्पण 1960 में करवाया। यह अब तक चंबल घाटी में हुए तीन आत्म समर्पणों में सबसे सफल था।
मगर भूदान के मामले में विनोबा को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। वे तो बीस हजार वर्ग किलोमीटर जमीन का लक्ष्य ले कर निकले थे मगर दो हजार वर्ग किलोमीटर भी कम नहीं होता। उनका लक्ष्य पांच करोड़ एकड़ का था जो भारत की उपजाऊ जमीन का छठवां हिस्सा है। बिहार और उत्तर प्रदेश में विनोबा सबसे ज्यादा समय रहे और आश्चर्य की बात यह है कि विनोबा ने जो जमीन जमीदारों से अर्जित की थी उसका सिर्फ 872 एकड़ ही बांटा गया और जिन लोगों में बांटा गया वे सभी असल में भूमिहीन या दलित नहीं थे।
विनोबा का लक्ष्य बिहार में 3 लाख 20 हजार एकड़ का था। मगर 31 मार्च 1966 को जब भूदान यज्ञ कमेटी की समीक्षा बैठक हुई तो पता चला कि भूदान में मिली जमीन पर वापस जमींदारों ने कब्जा कर लिया हैं। रामगढ़ के राजा ने तो ज्यादातर जंगल और वह जमीन दे दी जो कानूनी मुकदमाें में फंसी हुई थी। बाकी लोगों ने भी बंजर जमीन दी या बीहड़ दे दी। यह एक संत को ठगने की बेशर्म कोशिश थी।
बाद में मंडल कमीशन की वजह से सामाजिक न्याय के मसीहा माने गए विश्वनाथ प्रताप सिंह ने भी अपनी मांडा रियासत की बहुत सारी जमीन दान में दी थी। मगर बाद में वहां नहर बन गई और वह जमीन उपजाऊ हो गई। विश्वनाथ प्रताप सिंह की पत्नी ने बाकायदा अदालत में हलफनामा दिया कि उनके पति का मानसिक संतुलन ठीक नहीं हैं इसलिए उनके द्वारा किया गया दान अवैध माना जाएगा। यह जमीन भी वापस हो गई। दिलचस्प बात यह है कि मानसिक संतुलन ठीक होने का दावा करने वाले यही विश्वनाथ प्रताप सिंह बाद में देश के प्रधानमंत्री बने और मंडल कमीशन लागू कर के तो उन्होंने वास्तव में जाहिर कर दिया कि वे अपना मानसिक संतुलन खो बैठे हैं।
यह तथ्य अपने आप में काफी है कि ज्यादातर लोगों ने मुकदमों में फंसी जमीन दान में दी मगर इन मुकदमाेंं को सरकार चाहती तो आसानी से निपटा सकती थी मगर राज्य सरकारों ने तो विवादरहित और खेती लायक जमीन भी ठीक से और निष्पक्ष भाव से नहीं बांटी। हर राज्य विधानसभा में जहां विनोबा गए थे, उन राज्यों में भूदान यज्ञ कानून भी बनाया मगर यह कानून सिर्फ कागजों पर रहा। 1960 में बिहार के राजस्व विभाग के भूमि सुधार विभाग ने भूदान की जमीन अंचल अधिकारियों को प्रशासन के लिए दे दी। नवंबर 2000 तक की बिहार की ऑडिट रिपोर्ट बताती है कि अंचल अधिकारियों ने भूदान की जमीन का कोई रिकॉर्ड नहीं बनाया और जिला प्रशासन ने भी उसकी कोई निगरानी नहीं की। इसी ऑडिट में पता चला कि इस जमीन के इस्तेमाल के लिए कई फर्जी सहाकारी सोसायटियां भी बना ली गई। संत विनोबा के भूदान को राज्य सरकारों और उसके अधिकारियों ने मजाक बना दिया था।
भूदान कमेटी ने अब सर्वोच्च न्यायालय से अपील की है कि भूदान में मिली जमीन को उपयुक्त पात्रों के बीच बांट दिया जाए और ऐसा न्यायिक निगरानी में हो। लेकिन विनोबा का यह पावन प्रयोग लोगो के लालच और चालाकी के अलावा सरकार की आपराधिक लापरवाही में फंस कर रह गया। भूदान यात्रा के जो अब बूढ़े हो चुके साथी बचे हैं उन्हें नहीं लगता कि उनके जीवन में यह सपना पूरा हो पाएगा।
पटना की भूदान यज्ञ कमेटी के अध्यक्ष रहे भावेश चंद्र कहते हैं कि चार लाख एकड़ जमीन 1950 से वितरण की कानूनी जरूरताें को पूरा करने में पड़ी हुई है। दरअसल कम लोगों को याद है कि भूदान आंदोलन की वजह से उस समय के नक्सलवादी आंदोलन को भी काफी झटका लगा था क्याेंकि वे किसानों को जमीन दिलवाने की लड़ाई बंदूकों से लड़ रहे थे। आज भी माओवाद जो आदिवासियों को हक दिलाने की बात करता है का जवाब भूदान या ग्राम संपर्क जैसा कोई बड़ा आंदोलन हो सकता है लेकिन उसके लिए एक विनोबा और चाहिए। अपनी दिक्कत यह है कि अपने पास अरुंधती राय जैसी छम्मक छल्लो तो बहुत है, मगर विनोबा एक भी नहीं है। विनोबा को तो मैगसायसाय सम्मान 1958 में ही मिल गया था लेकिन उन्हे भारत रत्न घोषित करने में भारत सरकार को 1983 तक इंतजार करना पड़ा।