आलोक तोमर
लगभग ग्यारह साल सेना में अपने और अपने कई साथियों के खिलाफ हुई जालसाजी को आखिरकार उजागर करने में सफल रहे ब्रिगेडियर देवेंद्र सिंह सेना ट्रिब्यूनल के फैसले के मुताबिक वापस मेजर जनरल बन कर सेना में जा सकते हैं मगर उनका दिल इतना टूट चुका है कि वे एक कारगो कंपनी में काम कर के ही खुश हैं। होंडा सिटी चलाते हैं और उसकी पिछली सीट अपने मामले में लिखे गए पत्रों, दस्तावेजों और फैसलों से भरी हुई हैं।
देवेंद्र सिंह को लेफ्टिनेट जनरल कृष्ण पाल सिंह ने नहीं कि उनकी पदोन्नति की जाए और ऐसा इसके बावजूद हुआ था कि कारगिल युद्व में उन्होंने बहुत शानदार बहादुरी दिखाई थी और एक ग्रेनेड से तो उनकी नाक की हड्डी भी जुलाई 1999 में टूट गई थी। ब्रिगेडियर सिंह वही अधिकारी हैं जिन्होंने सबसे पहले घुसपैठ की खबर दी थी और यह भी बताया था कि घुसपैठियों के साथ पाकिस्तानी सेना के छह सौ जवान आएंगे।
2006 में उन्हें जबरन रिटायर कर दिया गया था और अब अपने आप उन्हें मेजर जनरल बना दिया जाएगा। उनके समकालीन कई लेफ्टिनेंट जनरल भी बन चुके हैं और एक तो सेनाध्यक्ष भी बन गए थे। भूतपूर्व सेना अध्यक्ष जनरल वेद प्रताप मलिक ने तो यहां तक कहा कि देवेंद्र सिंह बहुत शानदार और बहादुर अफसर हैं और मैं खास तौर पर उन्हें शाबाशी देने बटालिक गया था। ब्रिगेडियर सिंह ने कहा कि उनकी लड़ाई दोबारा सेना में जाने की नहीं बल्कि युद्व के इतिहास को सही तरीके से पेश करने की थी जिसमें उन्हें न्याय मिलता दिखाई पड़ रहा है।
सेना के ट्रिब्यूनल ने कारगिल युद्व का इतिहास सही ढंग से और ईमानदारी से लिखने का आदेश दिया है और इस आदेश में साफ कहा गया है कि जनरल कृष्ण पाल सिंह ने ब्रिगेडियर देवेंद्र सिंह की भूमिका को घटाने के लिए एक फर्जी बटालियन कागजों पर बना ली थी और जो लड़ाई ब्रिगेडियर सिंह ने लड़ी थी उसका श्रेय इस कागजी बटालियन को दे दिया गया था। अब इस फर्जी ब्रिगेड का पर्दाफाश हो चुका है और सेना के कई भूतपूर्व जनरल और उनके राजनैतिक आका भी अब नपेंगे।
देवेंद्र सिंह कारगिल युद्व के दौरान बटालिक में सबसे ऊंची पहाड़ी पर 70 इंफेन्ट्री ब्रिगेड का नेतृत्व कर रहे थे। सेना के ट्रिब्यूनल ने उत्तरी कमान के मुख्यालय में बैठे अधिकारियों को ब्रिगेडियर सिंह के साथ हुए अन्याय के लिए बाकायदा फटकारा है। ट्रिब्यूनल में सर्वोच्च न्यायालय के भूतपूर्व जज एके माथुर और सेना के भूतपूर्व उप सेनापति लेफ्टिनेंट जनरल मिलन नायडु थे और उन्होंने दस्तावेजों के सहारे ही जनरल कृष्ण पाल सिंह के चेहर से नकाब उतार दिए।
अभी तो ब्रिगेडियर सुरेंदर सिंह की याचिका पर सुनवाई होनी है, तब और भेद खुलेंगे। ब्रिगेडियर सुरेंदर सिंह कारगिल की 121 ब्रिगेड के मुखिया थे और युद्व के दौरान ही उन्हें कोर्ट मार्शल कर के बर्खास्त कर दिया गया था। यह भी एक अनोखी घटना हैं जब युद्व के चरम पर सेना के अधिकारी किसी का एक दिन में कोर्ट मार्शल कर के उसे बर्खास्त कर दे। सुरेंदर सिंह ने कारगिल युद्व की असलियत पर एक किताब भी लिख दी है जो जल्द ही प्रकाशित होने जा रही है और इस किताब में बड़े अधिकारियों और मुख्यालय के साथ हुआ उनका पत्र व्यवहार भी शामिल हैं।
मगर देवेंद्र सिंह और सुरेंदर सिंह के साथ हुए बर्ताव में फर्क है। जहां सुरेंदर सिंह को जलील कर के बर्खास्त कर दिया गया था वही देवेंद्र सिंह को उनकी बहादुरी के लिए उचित सम्मान नहीं मिलने दिया गया और उनकी पदोन्नति भी रोक दी गई। देवेंद्र सिंह का मामला इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इससे पता चलता है कि सेना के शिखर पर बैठे अधिकारी किस तरह अपना मतलब निकालने के लिए जालसाजी कर सकते हैं, झूठ बोल सकते हैं और फाइलें दबा सकते हैं।
कृष्ण पाल सिंह ने देवेंद्र सिंह के बारे में जो तथाकथित गोपनीय रिपोर्ट लिखी उसमें लिखा है कि ब्रिगेडियर अशोक दुग्गल ने 12 दिन तक देवेंद्र सिंह की जगह लड़ाई लड़ी और दुश्मन का सामना किया। यह झूठ है मगर सेना के उत्तरी कमान के तत्कालीन लेफ्टिनेंट जनरल एच एम खन्ना ने इसे बगैर कुछ पूछे मान लिया और उस समय डायरेक्टर जनरल मिलिट्री ऑपरेशन एन सी विज को सौप दिया और उन्होंने भी कोई सवाल नहीं किया तथा यह रिपोर्ट सेनाध्यक्ष जनरल वी पी मलिक को सौंप दी। विज बाद में सेनाध्यक्ष भी बने। कृष्ण पाल ंसिह की रिपोर्ट बताती है कि अशोक दुग्गल ने नया ब्रिगेड हेडक्वार्टर बनाया था और वह पूर्वी क्षेत्र में था। देवेंंद्र सिंह इस रिपोर्ट के अनुसार पश्चिमी इलाके में थे और आराम से बैठे थे। मगर दस्तावेजाें मे लिखा है कि दुग्गल कभी कमान संभालने पहुंचे ही नहीं थे और इसकी पुष्टि सेना के कई दस्तावेज करते हैं।
कर्नल गुरुशरण सिंह और कर्नल अवतार सिंह के शपथ पत्र में साफ कहा गया है कि उन्हें 8 मई से 9 अगस्त 1999 के दौरान बटालिक सेक्टर में जो हुआ उसकी पूरी जानकारी हैं। इसके कहा गया है कि ब्रिगेडियर देवेंद्र सिंह जी पूरा अभियान संभाल रह थे और अधिकारी के इस अभियान का नेतृत्व करने की कोई खबर नहीं है। यह बात पूर्वी और पश्चिमी दोनों इलाकों के लिए कही गई है।
अवतार सिंह और ब्रिगेडियर दुग्गल को 1 जुलाई से 4 जुलाई तक 72 घंटों के लिए बटालिक सेक्टर में भेजा गया था जहां ब्रिगेडियर देवेंद्र सिंह की कमान संभाल रहे थे और वहां कोई ब्रिगेड हेडक्वार्टर नहीं बनाया गया था। कृष्ण पाल सिंह की रिपोर्ट पर भरोसा करें तो ब्रिगेडियर दुग्गल ने 72 घंटे में ही वह कारनामा कर दिखाया जो भारतीय सेना 80 दिनों में कर पाई थी। दुग्गल ने अपना जो कैंप बनाया था और जिसमें वे दारू पी कर सोते रहे थे उसे ही झूठे कृष्ण पाल सिंह ने एक ब्रिगेड हेडक्वार्टर करार दे दिया है।