सेना की पैतीस साल पुरानी शर्म
Images

आलोक तोमर
पैतीस साल पहले पाकिस्तान के लिए जासूसी करने के इल्जाम में पांच सैनिकों का कोर्ट मार्शल कर के उन्हें जेल में डाल दिया गया था। सांबा जासूसी कांड के नाम से चर्चित इस मामले में जिन लोगों को सजा मिली थी उन्होंने कभी न्याय मांगने की जिद नहीं छोड़ी और अब जा कर उन्हें उम्मीद बंधी है कि शायद उनको न्याय मिल पाए।

सेना झूठ बोल रही थी यह इसी बात से जाहिर था कि सभी अदालतों ने सेना से इस मामले के दस्तावेज मांगे लेकिन सेना ने गोपनीयता का बहाना बना कर कभी दस्तावेज नहीं दिए। अभियुक्ताें को दिल्ली उच्च न्यायालय ने बरी कर दिया तो सेना सर्वोच्च न्यायालय में चली गई। सीधी वजह यह थी कि इन सैनिकों और अधिकारियों पर झूठ मामला बनाने वाले बड़े अधिकारियों की पोल खुल जाती तो शायद वे जेल में पड़े होते। सेना के भीतर कुटिलताओं, चालाकियों, जालसाजियों और अन्यायों का जो सिलसिला चल रहा है यह बहुत पुराना है। मगर सांबा जासूसी कांड में तो भारतीय सेना ने हद ही कर दी।

यह दस्तावेज क्या हैं? जिन सैनिकों पर पाकिस्तान के लिए जासूसी का आरोप लगाया गया था उनके द्वारा किए गए टेलीफोन और वायरलैस संदेश। यह तब की कहानी है जब फोन में एसटीडी नहीं थी और मोबाइल फोन का तो सवाल ही नहीं था। और यह तो सेना में कुली रह चुका आदमी भी बता देगा कि भारतीय सेना की वायरलैस फ्रीक्वेंसी से कोई आम सैनिक पाकिस्तान बात नहीं कर सकता। उस समय ट्रंक कॉल लगा कर बात करनी होती थी और सेना की छावनी में ट्रंक कॉल लगे और छुपा रहे यह शायद कोई भी मंजूर नहीं कर पाएगा।
और दस्तावेजों में इन सैनिकों को पीट पीट कर लिए गए बयान हैं जिनका वे अदालत में न सिर्फ खंडन कर चुके हैं बल्कि पीटने वालों की असलियत भी बता चुके है। इतना ही नहीं, जिन बड़े अफसरों ने आरोप लगाया था उनके बारे में भी दस्तावेज मौजूद हैं और इनके समने आने पर माहौल में आग लग सकती है। यही वजह है कि सेना के आला अफसर डरे हुए हैं। जिन अधिकारियों ने यह फर्जी जासूसी कांड गढ़ा था उनमें से सभी रिटायर हो चुके हैं और कुछ की तो मौत हो चुकी है। सेना अदालत को दिए जाने वाले अपने दस्तावेज में कैसे हेर फेर करती है और कैसे सेना का इतिहास ही बदल देने की कोशिश की जाती है यह आप करगिल में देवेंद्र सिंह जैसे बड़े अफसर के साथ हुई बदतमीजी और बेईमानी के बहाने जान चुके हैं।

आइए अब आपको सार बता देते हैं कि सांबा जासूसी घोटाला था क्या? सबसे पहले तो यह कि सांबा जम्मू के पास एक खामोश सा कस्बा है और पाकिस्तान की सीमा के बहुत पास है। 24 अगस्त 1978 और 23 जनवरी 1979 के बीच 168 इंफेंट्री ब्रिगेड और इसकी शाखाओं के पचास लोगों को सेना की गुप्तचर शाखा ने पाकिस्तान के लिए जासूसी करने के इल्जाम मेें गिरफ्तार किया था। पकड़े गए लोगों में एक ब्रिगेडियर, तीन लेफ्टिनेंट कर्नल, कई मेजर, कैप्टन और छोटे अधिकारी थे। 11 आम नागरिक भी थे जो सेना के लिए काम किया करते थे। कहा गया कि पाकिस्तानी जासूसों ने इनके नाम बताए हैं।

ये पाकिस्तानी जासूस भी भारतीय सेना के बताए गए थे और इनके नाम थे श्रवण दास और आया सिंह। दिसंबर 1994 में बताया गया कि यह खुलासा हुआ था और सेना की गुप्तचर शाखा को लगभग चार साल इनकी गिरफ्तारी करने में लग गए। देश के सबसे बड़े वकीलो में से एक एजी नुर्रानी ने इन सभी पकड़े गए सैनिकों को निर्दोष साबित करते हुए कानूनी धाराओं और उप धाराओं का उल्लेख करते हुए साबित किया था कि असल में यह भारतीय सेना का मनोबल गिराने की पाकिस्तान की साजिश थी और इसमें भारतीय सेना के कई अधिकारी भी शामिल थे। गिरफ्तारियां कई महीनों तक चलती रही क्योंकि जिसने भी इस साजिश में हिस्सा लेने से इंकार किया उसे जासूस बता कर बंद कर दिया गया।
सशस्त्र सैन्य न्यायाधिकरण एएफटी, ने सोमवार को उन पांच सैनिकों के कोर्ट मार्शल दस्तावेज पेश करने को कहा है, जिन्हें लगभग 35 साल पहले सांबा जासूसी मामले में सजा दी गई थी। न्यायमूर्ति एस।एस। कुलश्रेष्ठ के नेतृत्व में न्यायाधिकरण की खंडपीठ ने बनारसी दास, मिलखाई राम, सतपाल, हरीश सिंह और बलकार सिंह की याचिका पर सेना को 30 जून तक इनके कोर्ट मार्शल के दस्तावेज प्रस्तुत करने को कहा है।

देश में अपनी तरह के पहले मामले में सेना के कर्मचारी श्रवण दास और आया सिंह के बयान के आधार पर सेना ने नियंत्रण रेखा के पास तैनात 168 ब्रिगेड के 50 कर्मचारियों सहित 10 आम नागरिकों को भी पाकिस्तान के लिए जासूसी करने के मामले में सजा दी गई थी। वर्ष 1975-76 के इस मामले में ही उक्त कर्मचारी भी शामिल थे। इन्हें बर्खास्त करते हुए सात से 14 साल तक की सजा सुनाई गई थी।

इन सभी ने मामले से खुद को बरी करने की याचिका दायर की है। हाई कोर्ट ने इस संबंध में मामला न्यायाधिकरण को स्थानांतरित किया था। न्यायाधिकरण ने कहा कि दस्तावेज प्रस्तुत करने में असफल रहना इस मामले में सेना के उद्देश्य पर सवाल खड़े करता है। आरोपियों के वकील दीपक भट्टाचार्य ने कहा, श्इतने सालों में पहली बार हमें कोर्ट मार्शल के दस्तावेज देखने को मिलेंगे। मुझे आशा है कि इससे हमें न्याय पाने में मदद मिलेगी।

मामले में दो अन्य आरोपियों कैप्टन ए के राणा और कैप्टन आर एस राठौर की याचिकाएं अब भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं, दोनों के बारे में न्यायाधिकरण सात सितंबर को सुनवाई करेगा। राणा ने बताया कि दोनों को दिल्ली हाई कोर्ट ने वर्ष 2000 में क्लीन चिट दे दी थी लेकिन सेना ने इस फैसले को चुनौती दे दी।

एजी नुर्रानी ने यह भी लिखा था कि जांच को प्रभावित करने की कोशिश भी पाकिस्तान के कहने पर की गई। जिन लोगों ने झूठे बयान देने से मना कर दिया उन्हें न सिर्फ बंद कर दिया बल्कि बयान देने से भी रोक दिया गया। लगभग सभी बयानों में एक लाइन समान है और यह वह है कि हम लोग पाकिस्तान की कंदराल चौकी पर गए जहां पाकिस्तान की सेना की गुप्तचर शाखा के मेजर खान से उनकी मुलाकात हुई। मेजर राठौर ने यह लड़ाई सबसे लंबी लड़ी और उनकी वजह से ही अदालतो ने मामले को गंभीरता से सुना।

मेजर अजवानी नाम के एक अधिकारी ने झूठ बयान देने से इंकार कर दिया गया तो उन्हें भी इसी जासूसी कांड में फंसा दिया गया। जो फाइलें सरकार और अदालत के सामने आनी है उनमे जाहिर है कि मेजर अजवानी ने साजिश रच रहे अधिकारियों के आचारण के बारे में बाकायदा फाइलों पर टिप्पणियां दर्ज की थी। जाहिर है कि उनका कानून की सीमा से बाहर रहना सेना के अधिकारियों के लिए खतरनाक था। सांबा जासूसी कांड में कई समर्पित सैनिकों ने अपनी वफादारी की कीमत चुकाई है और अब वे अदालत से अपने साथ हुए अन्याय की कीमत मांग रहे हैं। सारे भारतीय अपनी सेना पर बहुत गर्व करते हैं लेकिन अगर इसी तरह की खबरे आती रही तो उनका यह गर्व कब तक कायम रहेगा?