अग्नि कन्या की राजनैतिक ज्वालाएं
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आलोक तोमर
ममता बनर्जी बंगाल में जीत का जश्न मना रही है और माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के लाल किले में दरार पड़ गई है। मगर एक बात पर खास तौर पर गौर करने की जरूरत है। स्थानीय निकाय चुनाव राजधानी कोलकाता और शहरों और कस्बों में हुए थे। बंगाल विधानसभा की 294 विधानसभा सीटों में लगभग 200 देहाती अंचल में हैं जहां पंचायतों में तृणमूल कांग्रेस ने असर तो दिखाया है लेकिन वाम मोर्चा के पास अब भी पंचायती लोकतंत्र का बहुमत हैं। 200 सीटों का यह आंकड़ा ममता बनर्जी को पूरा करना है।

जिस दिन परिणाम आए, उसी रात पश्चिम बंगाल कांग्रेस के नेता और देश के वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी को एक बड़ी बैठक में हिस्सा लेने कोरिया रवाना होना था। वे जाने के पहले का इतना होमवर्क कर रहे थे कि किसी से भी और खास तौर पर पत्रकारों से मिलने से उन्होंने इंकार कर दिया था। लेकिन अपनी पुरानी शिष्या और उनके चरण छूने वाली ममता बनर्जी को शाबाशी देना वे नहीं भूले। उन्होंने कांग्रेस की पराजय भी स्वीकार की। कांग्रेस बंगाल में लगभग हाशिए पर चली गई।

लेकिन ममता बनर्जी कांग्रेस के बगैर वाम मोर्चा की सरकार का सफाया करने के लिए यह आसानी से विश्वास करने लायक तथ्य नहीं है। नगरपालिकाओं और नगर निगमाें के चुनाव कूड़ा, गंदगी, नाले, सीवर और सड़क के मुद्दों पर लड़े जाते हैं मगर विधानसभा चुनावों में मुद्दे एकदम अलग होते हैं। विधानसभा चुनाव प्रदेश के विकास और बहुत हद तक केंद्र राज्य संबंधों के आधार पर लड़े जाते हैं और इसमें राष्ट्रीय राजनीति के समीकरण्ाों का काफी बहुत हाथ होता है।

इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि यूपीए देश की सरकार चला रही है और इसकी पिछली सरकार में वाम मोर्चा भी शामिल था और उसने अमेरिकी एटमी करार के मामले पर सरकार गिराने की भी कोशिश की थी। तृण्ामूल कांग्रेस चाहे जितनी सुफल हो लेकिन अभी वह एक क्षेत्रीय पार्टी ही है और ममता बनर्जी को रेल मंत्री होने का लाभ भी इस चुनाव में मिला हैं। आखिर उन्होंने दुरंतो से ले कर कई रेलगाड़ियां चलाई है और बंगाल की भावुक जनता को इसका गर्व भी है।

आखिर 1977 से पहले बंगाल में कांग्रेस ही राज कर रही थी। सिध्दार्थ शंकर रॉय आखिरी कांग्रेसी मुख्यमंत्री थे और आपातकाल के बाद इंदिरा गांधी विरोधी लहर में दरअसल माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने बंगाल की आधी से ज्यादा सीटों पर जनता पार्टी को उम्मीदवार खड़े करने का आमंत्रण दिया था और जनता पार्टी ने कहा था कि वह दो तिहाई सीटों से कम पर चुनाव नहीं लड़ेगी। जनता पार्टी की यह भूल माक्र्सवादियों और पूरे वाम मोर्चा के लिए वरदान बन गई। तब से 33 साल हो गए वहां वाम मोर्चा का शासन ही चला आ रहा है। ज्योति बसु उम्र के कारण रिटायर हुए तो उन्होंने बुध्ददेव दास गुप्ता को कमान सौंप दी। दास गुप्ता ममता बनर्जी से सामना करने में उतने सफल नहीं हुए। उनकी नीतियों की वजह से ममता बनर्जी को अपनी विजय यात्रा और आगे बढ़ाने में काफी सफलता हासिल हुई। कांग्रेस के स्थानीय नेतृत्व में अभाव के कारण और पिछले दो वर्षों में प्रियरंजन दास मुंशी की बीमारी के कारण अनुपस्थिति भी कांग्रेस के बिखराव का एक कारण बनी।

ममता बनर्जी को मालूम है कि कांग्रेस ने उनकी दी हुई 23 सीटों पर चुनाव नहीं लड़ कर अपना आधार काफी हद तक सुरक्षित रखा है। जो 23 स्थानीय निकाय ममता कांग्रेस को दे रही थी उनमें से 15 पर हमेशा वाम मोर्चा जीतता रहा है और इस बार भी जीता है। अगर ममता के चुनाव समझौते को मान लिया जाता तो कांग्रेस के पास दस के बजाय पांच स्थानीय निकाय ही होते। जलपाईगुड़ी, कूच विहार, मालदा, मुर्शिदाबाद, नदियां और वर्धवान में कांग्रेस ने पहले से अच्छा प्रदर्शन किया हैं। जलपाईगुड़ी में तो तृणमूल ने सिर्फ एक सीट जीती है और सोलह कांग्रेस के खाते में गई हैं। मालदा की इंग्लिश बाजार नगरपालिका में कांग्रेस ने अपने वोट बढ़ाए हैं और मुर्शिदाबाद मे भी कांग्रेस का प्रदर्शन अच्छा रहा है।

यह भी एक अनकहा तथ्य है कि तृणमूल जहां जीती वहां कांग्रेस ने उसकी मदद की क्योंकि अनौपचारिक तौर पर सीटों का बंटवारा कर लिया गया। कई जगह तो कांग्रेसी उम्मीदवार पर्चे बांट कर और सभाएं कर के मैदान से हट गए। वर्धवान में हमेशा वाम मोर्चा जीतता था लेकिन वर्धवान ही नहीं, कालना बीमारी और दईहाट में भी तृणमूल को कांग्रेस का बहुत सहारा मिला। खरारे नगरपालिका में कोई समझौता नहीं होने के बावजूद कांग्रेस ने सभी बीस सीटों पर कोई उम्मीदवार नहीं उतारा। 29 नगरपालिकाएं ऐसी हैं जहां किसी को बहुमत नहीं मिला है और वहां तृणमूल को कांग्रेस की जरूरत पड़ेगी। आंकड़ों का सही विश्लेषण किया जाए तो तृणमूल 79 में से कोलकाता और साल्ट लीक को छोड़ कर सिर्फ 27 सीटे अपनी दम पर जीती है और बाकी कांग्रेस की मदद से। मतलब साफ है कि कांग्रेस का और वाम मोर्चे का कोलकाता में सफाया हो गया मगर बंगाल में कांग्रेस की अब भी ठीक ठाक पकड़ है। जाहिर है कि विधानसभा चुनाव में कांग्रेस तृणमूल कांग्रेस के नेतृत्व में ही सही, लेकिन तालमेल कर क चुनाव लड़ेगी। यानी बंगाल में कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस की मिली जुली सरकार बनने वाली है और ममता बनर्जी का मुख्यमंत्री बनने का सपना पूरा होने वाला हैं।

हाल ही में सीताराम येचुरी प्रणब मुखर्जी से मिलने गए थे और वाम-कांग्रेस के तालमेल का प्रस्ताव रखा था। प्रणब मुखर्जी ने जो कहा उसका मतलब यह है कि क्या आप मजाक कर रहे हैं? मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी और राहुल गांधी तीनों ने बंगाल में ममता का साथ बने रहने का मन बना लिया है। प्रणब मुखर्जी ने तृणमूल से कांग्रेस पर मुहर लगा दी हैं।
बंगाल के स्थानीय निकायों के चुनाव नतीजे बताते हैं कि माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के राजनैतिक समीकरण बदलने वाले है। प्रकाश करात और सीताराम येचुरी दोनों केरल से हैं मगर इन दोनों ने ही मिल कर केरल के माक्र्सवादी मुख्यमंत्री अच्युतानंदन को अपमानित करने में और पार्टी से बाहर निकालने की धमकी देने से भी परहेज नहीं किया था। अगले चुनाव में अगर वाम सरकार बंगाल से चली जाती है तो केरल की सरकार देश में एक मात्र माक्र्सवादी सरकार रह जाएगी और तब अच्युतानंदन कल के छोकरे प्रकाश करात और सीताराम येचुरी को सबक सिखाएंगे।