रईसों की सभा है राज्यसभा
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आलोक तोमर 
कर्नाटक के करोड़पति व्यापारी उदय बी गरुडचार बंलगुरु और दूसरे शहरों में कई आलीशान मॉल चलाते हैं। बिहार से उनका दूर दूर तक कोई वास्ता नहीं है। लेकिन लगभग चार हजार किलोमीटर दूर पटना पहुंच कर उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर राज्यसभा के लिए नामांकन दाखिल किया। वे चतुर हैं इसलिए उन्हें पता होगा कि आखिर एक अनजान प्रदेश में बगैर किसी राजनैतिक सहारे के उन्हे वोट खरीदने पड़ेंगे। इसके लिए वे तैयार हैं।

गरुडचार के बारे में बाद में। लेकिन झारखंड मुक्ति मोर्चा ने चंडीगढ़ के एक सुपर रईस कवंरदीप सिंह को राज्यसभा का अपना उम्मीदवार घोषित किया है। अलकैमिस्ट उद्योग समूह के मालिक कवंरदीप सिंह के बारे में अब तक किसी को दूर दूर तक इल्म नहीं था कि उनका शिबू सोरेन या झारखंड से कोई संबंध भी है। कवंरदीप अस्पताल चलाते हैं और बहुत सारे होटलों और रिसार्ट के मालिक हैं। एक अखबार भी चलाते हैं और जमशेदपुर में हवाई जहाज उड़ाने का स्कूल खोलने की उनकी योजना है। कवंरदीप सिंह का नाम पिछले साल फरवरी में तब पहली बार अखबारों की सूर्खियों में आया था जब उन्होंने इनकम टेक्स के सर्वे के बाद 22 करोड़ रुपए की वो रकम जमा की थी जिसे पहले उनके हिसाब में दिखाया ही नहीं गया था।

जहां तक कर्नाटक के गरुडचार का सवाल है तो वे अपना गणित बताने में संकोच नहीं करते। उन्हें 11 निर्दलीयों के 10 कांग्रेसी विधायकों के पांच पांच वोट बहुजन समाज पार्टी और माक्र्सवादी लेनिनवादी कम्युनिस्ट पार्टी के विधायकों के मिलने की उम्मीद तो है ही, माक्र्सवादी और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के 4 वोट और 6 वोट एनडीए यानी भाजपा और जनता दल यूनाइटेड से पाने की उन्हें पूरी उम्मीद हैं।

जाहिर है कि एक अनजान आदमी को एक अजनबी प्रदेश में अगर इतना आत्मविश्वास है और उन्हें नामांकन भरने के लिए पर्याप्त विधायक मिल गए हैं तो इसमें खेल पैसे का ज्यादा है। राज्यसभा की सीटे बाकायदा खरीदी जाती है यह कई बार जाहिर हो चुका है और मध्य प्रदेश में पिछले राज्यसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के एक विधायक ने 25 लाख रुपए की रकम भोपाल पुलिस को सौंपी थी और बताया था कि यह पैसा उसे कांग्रेस समर्थित उम्मीदवार विवेक तन्खा को वोट देने के बदले दी गई थी। बाद में आरोप प्रमाणित नहीं हुआ, यह अलग बात है मगर विवेक तन्खा भी जीत नहीं सके और प्रभात झा ने उन्हें हरा दिया। प्रभात झा अब मध्य प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष भी हैं। विवेक तन्खा भारत के अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल बना दिए गए हैं।

संसद में लोकसभा और राज्यसभा ब्रिटिश संसदीय प्रणाली के आधार पर ही बनाए गए हैं। ब्रिटेन में राज्यसभा को हाउस ऑफ लार्डस कहते हैं और भारत में भी राज्यसभा लाट साहबों और रईसों का क्लब बनती जा रही हैं। कर्नाटक में भारत के सबसे बड़े शराब व्यापारी और भारत सरकार के 600 करोड़ से ज्यादा के देनदार विजय माल्या को भारत के सबसे आलसी प्रधानमंत्री रहे हरदन हल्ली देवेगौड़ा ने अपने विधायक बेच दिए हैं। देवेगौड़ा इधर उधर से जुगाड़ कर लेंगे और राज्यसभा में दोबारा आ जाएंगे। राज्यसभा को लोकतंत्र का पिछला दरवाजा ऐसे ही नहीं कहा जाता हैं।

रामविलास पासवान भी इस बार राज्यसभा के मैदान में हैं और एक जमाने में लोकसभा चुनाव में सबसे ज्यादा वोट पा कर गिनीज बुक तक पहुंच चुके पासवान जन्में भले ही गरीब परिवार में हों मगर आज वे भी करोड़पति है। अकेले वे ही नहीं, उनसे ज्यादा पैसा तो उनकी दूसरी पत्नी रीना के पास हैं और कम लोगों को पता है कि रीना के नाम से नई दिल्ली के बसंतकुंज में एक पेट्रोल पंप हैं और महरौली में सोनिया गांधी के पड़ोस मे एक फॉर्म हाउस भी है। वैसे उनका सरकारी बंगला भी सोनिया गांधी के दस जनपथ के ठीक बगल में हैं और उनकी दीवारे जुड़ी हुई हैं।

भाजपा के राज्यसभा उम्मीदवार राजीव प्रताप रुडी पायलट है और इन दिनों गो एयर विमान सेवा का जहाज उड़ाते हैं। करोड़पति वे भी हैं। हालांकि इन सब नेताओं की दौलत बंगलुरु के मॉल मालिक उदय बी गरुडचार और कवंरदीप सिंह की तुलना में कुछ नहीं हैं मगर यह समझ लेना चाहिए कि राज्यसभा के लोकतंत्र में आम आदमी की जगह नहीं हैं। आज की तारीख में राज्यसभा में 108 करोड़पति बैठे हैं। इनमें राहुल बजाज है जो निर्दलीय यानी वोट खरीद कर आए हैं। उनके बाद रेस में घोड़ो के मालिक एनएएम रामास्वामी 300 करोड़ के मालिक हैं। आंध्र प्रदेश से आने वाले और चार पन्नों का विजिटिंग कार्ड रखने वाले टी सुब्रमनि रेड्डी फिल्मों से ले कर सीमेंट तक का कारोबार करते हैं और उन्होंने भी 271 करोड़ रुपए की आमदनी घोषित की है। पिछली राज्यसभा में जया बच्चन थी जिन्हाेंने अपने पास 215 करोड़ रुपए होने की बाकायदा घोषणा की थी। कांग्रेस के खदान मालिक अनिल लाड 188 करोड़ के मालिक हैं और हाल ही में राज्यसभा से रिटायर हुए अमर सिंह के पास 81 करोड़ रुपए है। इनकी तुलना में जम्मू कश्मीर के महाराजा डॉक्टर कर्ण सिंह अपेक्षाकृत कम अमीर हैं और उनके पास सिर्फ 61 करोड़ रुपए की दौलत है। कम्युनिस्ट पार्टी के डी राजा और समन पाठक ने ऐलान किया है कि उनके पास एक भी पैसा नहीं हैं। बृंदा करात के पास सिर्फ एक लाख 74 हजार रुपए की आमदनी बताई गई है। अभी तक सबसे रईस राहुल बजाज ही हैं लेकिन चुनावों के बाद राज्यसभा का चेहरा बदलने वाला हैं और रईसों का क्रम भी।

राज्यसभा के सदस्य निर्वाचित हो कर आते हैं यह सही है लेकिन यह निर्वाचन ऐसा होता है जिसमें पार्टी के निर्वाचित सदस्य ही वोटर भी होते हैं। इसलिए यह एक तरह से बंधक निर्वाचन होता है। कुछ सांसद क्रॉस वोटिंग भी करते हैं लेकिन आम तौर पर यह वोटिंग अतिरिक्त वोटो की होती है और वोट बाकायदा बिकते हैं। हमारे देश में मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री बनने के बाद एक अटपटा रिवाज यह चल निकला है कि प्रधानमंत्री लगातार राज्यसभा से ही चुनकर आता रहे। पंजाब के मनमोहन ंसिंह लगातार असम से सांसद बने हुए हैं। ऐसा नहीं कि प्रधानमंत्री बनने के बाद वे लोकसभा चुनाव लड़ कर जीत नहीं सकते थे मगर यह भी सच है कि उन्होंने लोकसभा का चुनाव लड़ने की कभी हिम्मत ही नहीं की। यह देश के लिए गोरव की बात नहीं हैं कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के शिखर पर एक ऐसा व्यक्ति बैठा हो जो सीधे निर्वाचन के जरिए चुन कर नहीं आया।