आलोक तोमर
भोपाल गैस कांड में कानूनी फैसले के नाम पर जो अभूतपूर्व अन्याय हुआ है उसके पीछे की कहानियां अब सामने आती जा रही है। सीबीआई ने पहले सही धाराओं में मामला बनाया था। यह धारा 304 थी जिसका मतलब होता है कि अभियुक्त को पता था कि उसकी लापरवाही से व्यक्ति या व्यक्तियों की मौत हो सकती है और फिर भी सावधानी नहीं बरती गई। इस धारा में कम से कम दस साल और अधिक से अधिक उम्र कैद का प्रावधान है।
भारत सरकार ने भोपाल आए यूनियन कार्बाइड के चेयरमैन वारेन एंडरसन को कैसे राजकीय अतिथि की मुद्रा में गिरफ्तार किया और कैसे दिल्ली से राजीव गांधी या पी नरसिंह राव या दोनों का फोन तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के पास आया और तीन घंटे के भीतर वारेन एंडरसन को रिहा कर के सरकारी जहाज में दिल्ली पहुंचा दिया गया और वहां से वह अमेरिका उड़ गया। यह मेहरबानी तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति और उसके पहले सीग्रेड फिल्मों के हीरो रह चुके रोनाल्ड रीगन के एक फोन के बाद हुई थी।
फिर भारत सरकार ने एक विशेष अध्यादेश जारी कर के भोपाल की लड़ाई लड़ने के लिए सिर्फ खुद को अधिकार दे दिया। भारत सरकार ने अमेरिका की एक अदालत में तीन अरब तीस करोड़ डॉलर का मुआवजा मांगने के लिए अमेरिका की अदालत में मामला दायर किया मगर अदालत ने कहा कि जुर्म भोपाल में हुआ है और मामला भी वहीं चलना चाहिए। सीबीआई तो धारा 304 के तहत दिसंबर 1987 में ही वारेन एंडरसन और यूनियन कार्बाइड की अलग अलग शाखाओं के अधिकारियों के खिलाफ चार्ज शीट भी दाखिल कर चुकी है और फरवरी 1989 में भोपाल के चीफ जुडिशियल मजिस्ट्रेट ने एंडरसन के खिलाफ जमानत के दौरान किए गए वायद के बावजूद अदालत में पेश नहीं होने पर गैर जमानती वारंट जारी कर दिया और इसको तामिल भी करवा लिया गया।
मगर उसी महीने भारत सरकार को पता नहीं एंडरसन के प्रति दया का ऐसा दौरा आया कि तीर अरब तीस करोड़ डॉलर के बजाय सिर्फ चार करोड़ सत्तर लाख के मुआवजे पर सौदा कर लिया गया। भोपाल के लोग बहुत खफा थे और कई याचिकाएं और समीक्षा याचिकाएं भारत के सर्वोच्च न्यायालय मे डाली गई जिन्हें तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश अहमदी ने खारिज ही नहीं कर दिया बल्कि 1996 में तो फैसला दे दिया कि मामला 304 का नहीं बल्कि 304 ए और बी का बनता है जिनमें अधिकतम सजा दो साल की हैं।
कोई आश्चर्य नहीं कि जब यूनियन कार्बाइड ने भोपाल हॉस्पीटल ट्रस्ट लंदन में बनाया तो अहमदी साहब उसके अध्यक्ष बनाए गए। फरवरी 2001 में तो यूनियन कार्बाइड ने घोषित ही कर दिया कि भारत की फैक्टरी के लिए उसकी कोई देनदारी शेष नहीं हैं। अगले साल हुई एक शोध ने साबित किया कि यूनियन कार्बाइड प्लांट के आसपास रहने वाली मांओ के दूध में पारा पाया गया हैं। अमेरिकी सरकार कहती रही कि उसे एंडरसन का कोई पता नहीं हैं जबकि एक ब्रिटिश अखबार के संवाददाता उसके घर पहुंच गए और गोल्फ खेलते हुए उसके फोटो भी खींच लाए। अमेरिका के साथ भारत की प्रत्यर्पण संधि है मगर अमेरिका ने एंडरसन को कभी भारत सरकार को नहीं सौंपा।
भारत सरकार अपने तरीके से काम कर रही थी। भोपाल में हादसा हुआ था लेकिन मध्य प्रदेश सरकार की कोर्इ्र भूमिका नहीं रहने दी गई थी। सीबीआई के एक जांच अधिकारी ने आरोप लगाया है कि विदेश मंत्रालय ने बाकायदा संदेश भेज कर कहा था कि एंडरसन के प्रत्यर्पण पर ज्यादा जोर नहीं डाला जाए। उस समय पीवी नरसिंह राव प्रधानमंत्री थे और विदेश मंत्री दिनेश सिंह बहुत बीमार थे इसलिए विदेश मंत्रालय के फैसले भी प्रधानमंत्री कार्यालय से होते थे। उस समय विदेश मंत्रालय में उप मंत्री रहे और अब अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री सलमान खुर्शीद का दावा है कि उन्हें इस तरह के किसी संदेश के भेजे जाने की जानकारी नहीं है।
और तो और न्यायमूर्ति अहमदी कहते है कि उन्हें तो किसी समीक्षा याचिका की याद ही नहीं है। भोपाल में अर्जुन सिंह ने जिसके भी आदेश का पालन किया हो मगर इस बात की अब तो तस्वीरे मौजूद हैं कि एंडरसन को बाकायदा लाल बत्ती की एक नीले रंग की कार से भोपाल हवाई अड्डे पहुंचाया गया और वहां से सरकारी जहाज में दिल्ली उड़ा कर भेजा गया। भोपाल पुलिस ने हाल ही में जमानत पर छूटे एंडरसन को बाकायदा सैल्यूट कर के विदा किया।
अब भारत सरकार भोपाल के हजारों निष्पाप लोगों का कानूनी श्राध्द करने में लग गई हैं। भोपाल गैस त्रासदी पर न्याय पाने के लिए भारत सरकार में मंत्रियों का एक समूह पहले से मौजूद था और यूपीए की पहली सरकार के दौरान ही बना लिया गया था। अर्जुन सिंह इस समूह के अध्यक्ष थे। भोपाल के फैसले के अगले ही दिन जब इस समूह को जीवित किया तो पता चला कि भारत सरकार का ऐसा समूह भी था। अगर यह समूह था और इसमें भारत सरकार के जिम्मेदार मंत्री मौजूद थे तो यह समीति इतने सालो से कर क्या रही थी? यह आश्चर्य खास तोैर पर इसलिए भी है क्योंकि इस समिति के अध्यक्ष खुद अर्जुन सिंह थे जिन्हें भोपाल गैस कांड के बारे मेंं दूसरों से ज्यादा पता था।
मध्य प्रदेश सरकार के हाथ बांध दिए गए थे। बाबू लाल गौर के रौशनपुरा चुनाव क्षेत्र में यह हादसा हुआ था। बाबू लाल गौर जानते हैं कि किस गली में कौन रहता है और किसके साथ क्या हुआ? अपने चुनाव क्षेत्र के दो वार्ड बाबू लाल गौर गैस पीड़ितों की सूची में इसके बावजूद नहीं जुड़वा पाए क्योंकि फैसला तो केंद्र सरकार को करना था। जिस व्यक्ति को इस चुनाव क्षेत्र के मतदाता ने लगातार 11 बार जिताया वह भी उनकी मदद करने में लाचार था। भारत सरकार का मंत्रिमंडलीय समूह भी तब जा कर जीवित किया गया जब भोपाल में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ऐलान कर चुके थे कि वे इस लड़ाई को हारने वाले नहीं हैं और सरकार की ओर से उच्च न्यायालय में अपील करेंगे।
भोपाल की जनता को शिवराज सिंह से ज्यादा उम्मीद हैं। पी चिदंबरम नए समूह के अध्यक्ष बनाए गए हैं मगर अब यह उनके ऊपर है कि वे वारेन एंडरसन से पहले निपटना चाहते हैं या माओवादी कातिलों से। कमाल की बात तो यह है कि मध्य प्रदेश के एडवोकेट जनरल रह चुके और अब भारत सरकार के अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल विवेक तन्खा शिवराज सिंह चौहान की बनाई कमेटी में शामिल है। भारत सरकार को उनकी मदद लेने का ध्यान भी नहीं रहा। वैसे भी भारत सरकार में 29 ग्रुप ऑफ मिनिस्टर पहले से हैं और अब 30 हो गए हैं। उम्मीद कीजिए कि शर्म से ही सही, भोपाल को न्याय दिलवाने में अब केंद्र सरकार कामयाब होगी और अमेरिका के साथ रिश्ते बिगड़ने का रोना नहीं रोएगी।