आलोक तोमर
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सीधे अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा से संपर्क कर सकते हैं और जरूरी हुआ तो उनसे मिलने वॉशिंगटन भी जा सकते है। मध्य प्रदेश सरकार ने भोपाल गैस त्रासदी की समीक्षा और आगे की कार्रवाई के लिए जो उच्च स्तरीय कानूनी समिति बनाई हैं उसकी यही राय है।
समिति का कहना है कि वॉरेन एंडरसन और उनके एक सहयोगी के खिलाफ भारतीय दंड विधान की धारा 304 के तहत सीबीआई ने मुकदमा दर्ज किया है और न्यायमूर्ति अहमदी ने बाकी सब अभियुक्तों के खिलाफ यह धारा बदल कर कमजोर धारा 304 ए और बी लगा दी थी मगर एंडरसन अब भी धारा 304 का ही अभियुक्त हैं। इसके अलावा भोपाल की अदालत के समन जाते रहे और यहां तक कि अमेरिका के सबसे बडे अखबार वॉशिंगटन पोस्ट में एंडरसन के फोटो के साथ उसे हाजिर होने के विज्ञापन भी छपवाए गए इसलिए वह अब भारतीय कानून का और बड़ा अपराधी बन गया हैं।
कानूनी भाषा में कहे तो मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री राज्य के मुख्य प्रशासक या चीफ एग्जीक्यूटिव की हैसियत से बराक ओबामा से बात कर सकते हैं, मुलाकात कर सकते हैं और कानूनी भाषा में पत्र लिख कर जवाब मांग सकते हैं। श्री चौहान फिलहाल यूरोप में हैं और दिल्ली और भोपाल में उनके कानूनी सलाहकार इन सब विकल्पों पर विचार कर रहे हैं। श्री चौहान वैसे भी कसम खा चुके है कि वे इस मामले को फिर से शुरू करवाए बगैर चैन से नहीं बैठेंगे।
एक तकनीकी दिक्कत है। भारत एक यूनियन या संघ प्रणाली पर चलने वाला फैडरल देश नहीं है जैसा कि अमेरिका है। अमेरिका के हर प्रांत के प्रशासक को यह स्वायत्ता है कि व्हाइट हाउस से पूछे बगैर दुनिया में किसी भी देश के राष्ट्राध्यक्ष से संपर्क कर सके। भारत में मुख्यमंत्रियों को राज्यपाल के जरिए केंद्र सरकार से अनुमति मांगनी होती है और यह अनुमति राष्ट्रपति केंद्र सरकार की सलाह पर ही देते हैं। प्रधानमंत्री की भूमिका इसमें महत्वपूर्ण होती है।
इस बात की संभावना कम ही है कि अब तक निठल्ली बैठी रही भारत सरकार शिवराज सिंह चौहान को आसानी से बराक ओबामा से बात करने की अनुमति देगी। उसके पास तर्क है कि जब केंद्र सरकार का एक मंत्रिमंडलीय समूह इस मामले में काम कर रहा है तो प्रदेश सरकार को बीच में नहीं पड़ना चाहिए। असल में यह प्रतिबंध तो 1985 में ही लग गया था जब भोपाल गैस लीक एक्ट के तहत इस मामले में सारी जिम्मेदारी और अधिकार केंद्र सरकार ने ले लिए थे। तब से अब तक तीसरी बार मंत्रिमंडलीय समूह बना हैं और एक एंडरसन का प्रत्यर्पण नहीं हो पाया।
अमेरिका में रोनाल्ड रीगन के बाद जॉर्ज बुश सीनियर, बिल क्लिंटन, जॉर्ज बुश जूनियर और अब बराक ओबामा राष्ट्रपति बन चुके हैं। भारत में राजीव गांधी के बाद विश्वनाथ प्रताप सिंह, चरण सिंह, चंद्रशेखर, इंदर कुमार गुजराल, हरदन हल्ली देवेगौड़ा, नरसिंह राव, अटल बिहारी वाजपेयी और अब मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री है। वाजपेयी सरकार ने प्रत्यर्पण के लिए पत्र भेजने की पहल तो की थी मगर परामर्श के लिए बांबे डाइंग के मालिक नुस्ली वाडिया की एक मित्र कानूनी कंपनी से परामर्श लिया था और इस कंपनी ने कहा था कि एंडरसन का भोपाल त्रासदी में सीधे कोई हाथ नहीं हैं इसलिए उसे भारत नहीं भेजा जा सकता। अगर एंडरसन वाकई निर्दोष है तो भारत की अदालतों के सामने आ कर भी यह बात कह सकता था। जमानत पर था इसलिए जेल जाने का सवाल ही नहीं उठता था।
अब तो अमेरिका का एक नामी अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स लिख रहा है कि भारत सरकार ने एंडरसन को कुछ ज्यादा ही छूट दे दी। सीधे साधे एक मामले में चार्ज शीट दाखिल करने में तीन साल लग गए। इस चार्ज शीट का भी न्यायमूर्ति अहमदी ने कबाड़ा कर दिया। जहां तक यूनियन कार्बाइड की बात है तो यूनियन कार्बाइड ने एक बयान में 2001 में ही कह दिया था कि फैक्टरी उनकी नहीं, भारत की एवररेडी इंडस्ट्रीज की है। बाद में इसे अमेरिका की ही डाउ केमिकल्स ने खरीद लिया। न्यूयॉर्क टाइम्स लिखता है कि चार करोड़ सत्तर लाख डॉलर का जो मुआवजा सौदा हुआ था उतना तो उस बीपी ऑयल कंपनी का सलाना विज्ञापन बजट ही है जिस कंपनी के पाइपों से मैक्सिकों की खाड़ी में तेल रिस कर विश्व का सबसे बड़ा प्रदूषण हादसा हो चुका है। इस हादसे के लिए बौखलाए बराक ओबामा ने सार्वजनिक बयान दिया था कि मैं उस गधे को तलाश रहा हूं जिसकी वजह से यह हादसा हुआ है और मुझे वो मिल गया तो मैं खुद उसके पिछवाड़े पर चार लात लगाऊंगा।
यही ओबामा भोपाल त्रासदी के प्रति उतने गंभीर नहीं है। यूनियन कार्बाइड इंटरनेशनल लिमिटेड ने हादसे की दसवीं साल गिरह के आसपास 1994 में भारत की यूनियन कार्बाइड मैक्लॉड रसेल इंडिया लिमिटेड को बेच कर एवररेडी इंडस्ट्रीज इंडिया लिमिटेड के हवाले कर दिया था। एक और सवाल यह है कि 7 दिसंबर 1984 को जब भोपाल पुलिस ने एंडरसन को गिरफ्तार कर के अज्ञात कारणों से रिहा कर दिया था उस दिन भी एंडरसन सीबीआई का अभियुक्त था। सीबीआई ने 6 दिसंबर को सुबह 10 बजे मामला दर्ज कर लिया था और एंडरस 7 दिसंबर को भोपाल पहुंचा। फिर जिस भी कारण से हुई हो, जमानत के लिए एंडरसन को अदालत तत्कालीन हनुमानगंज पुलिस थाने के इंस्पेक्टर सुरेंद्र सिंह ठाकुर ले गए थे। सीबीआई के अधिकारी क्या कर रहे थे? सीबीआई तो सीधे केंद्र सरकार के आदेश पर काम करती है।
अब तो यूनियन कार्बाइड के लिए मसीहा बनने के बाद रिटायर हो कर भारत के मुख्य न्यायाधीश ए एम अहमदी यूनियन कार्बाइड के पैसे से चलने वाले भोपाल मेमोरियल ट्रस्ट के चेयरमैंन है यानी यूनियन कार्बाइड के टूकड़ों पर पल रहे हैं। उन पर कई बार इल्जाम लग चुका है कि अस्पताल के संचालन में कई गंभीर धांधलियां हुई हैं। मगर अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है। मध्य प्रदेश सरकार को निश्चय ही पहल करनी चाहिए वरना फिर मामला कानूनी झमेलों में फंस जाएगा और एंडरसन तो वैसे भी चाहे जितने ठाठ से रहे, कब्र में पांव लटकाए बैठा है।