मिग भारत की मजबूरी क्यों हैं?
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आलोक तोमर
एक और मिग जहाज आसमान से गिर पड़ा। पायलट ने खुद बाहर निकलने के पहले एक गांव को बचा लिया और जहाज खेतों पर गिरा। गांव के लोग किस्मत वाले थे जो बच गए वरना मिग जहाज तो बैंकों, स्कूलों, सरकारी इमारतों और घरो पर भी गिरते रहे हैं। भारत में मिग विमान की यह एक सौ दो वीं दुर्घटना है। अब तक नब्बे से ज्यादा प्रशिक्षित पायलट इस उड़न ताबूत के कारण जान गंवा बैठे हैं। इंसानी जान की तो क्या कीमत लगाई जाए लेकिन सिर्फ जो विमान गिरे हैं उनकी कीमत हजारों करोड़ रुपए में हैं और मिग कंपनी मानने को राजी नहीं हैं कि उनके जहाज में कोई गड़बड़ है। वे कहते हैं कि अनाड़ी भारतीय पायलटों को इतना आधुनिक विमान उड़ाना ही नहीं आता। भारत पता नहीं क्यों अर्जेटाइना जैसे छोटे से देश से कुछ नहीं सीखता जिसने दो विमान गिरने पर सारे मिग विमान रुस को वापस कर दिए थे और अपना पैसा वापस ले लिया था।

मिग का नाम उन दो इंजीनियरों मिकायोन और गुरेविच को मिला कर बना है जिन्होंने पहले मिग का डिजाइन तैयार किया था। मिग कंपनी का पहले नाम भी मिकायोन एंड गुरेविच डिजाइन ब्यूरो था जो अब रशियन एयरक्रॉफ्ट कॉरपोरेशन है। मिकायोन की 1970 में मौत हुई और उसी के समय गुरेविच को भी कंपनी के नाम से हटा दिया गया। मगर जहाज का नाम मिग बना रहा। 1940 में पहला मिग बना था मगर इसे विश्व युद्व के इस्तेमाल नहीं किया गया था। अब तो मिग 35 तक बन गए हैं और भारत सरकार जिसके पास जहाजों के 39 बेड़ों की जगह सिर्फ 26 बेड़े हैं, और ज्यादा मिग विमान खरीदने का सौदा कर रही हैं।

सोवियत संघ के जमाने में भारत और सोवियत दोस्ती एक राजनयिक अनिवार्यता थी। सोवियत संघ टूट फूट गया और अब रूस भी महाशक्ति नहीं रह गया है मगर भारत सरकार रक्षा सामग्री के मामले में पता नहीं क्यों रूस पर इतनी अधिक आश्रित है। हालत यह है कि रूसी नौ सेना के कबाड़ में पड़े गोर्शकोव को मरम्मत कर के अरबो डॉलर में खरीदा जा रहा है और रूस बार बार इसके दाम बढ़ा रहा है और भारत हर बार बढ़ा हुआ दाम देने पर मजबूर है। गोर्शकोव जब भारतीय नौ सेना में तीन साल बाद शामिल होगा तब तक निर्माण की तारीख के आधार पर उसके रिटायरमेंट को सिर्फ तीन साल रह जाएंगे। तीन साल चलने वाला जहाज लेने के लिए अरबों डॉलर लुटाना कहां की बुद्विमानी है।

मिग दुर्घटनाएं इतनी आम बात हो गई है कि इन्हें अब बड़ी खबर भी नहीं माना जाता। पता नहीं यह त्रासदी है, गलती है या एक कातिल मजाक है मगर मिग विमानों के प्रति भारत का मोह किसी की समझ में नहीं आने वाला है। रक्षा मंत्रालय के वैज्ञानिक मिग 29 तक की जांच कर चुके हैं और इसके ढांचे में ही पचासों गलतियां निकाल चुके हैं। खुद रक्षा मंत्री ने संसद में यह स्वीकार किया है और उनके बयान में यह भी कहा गया था कि मिग की तेरह स्कवाड्रन में से सिर्फ छह अब काम कर रही है और वे भी 2012 तक सेवा से हटा दी जाएंगी। भारत का मिग मोह इतना विकट है कि इस कमी को पूरा करने के लिए मिग 27 को अपग्रेड किया जा रहा है और मिराज के बेड़े में भी परिवर्तन किए जा रहे है। यह तब हेै जब मिग 27 के अगले संस्करण मिग 29 में पाई गई खामियों के बाद खुद रूस ने इस विमान को उड़ाना बंद कर दिया था। रुस में भी मिग 29 की कई दुर्घटनाएं हुई थी।

मगर भारत ने पहले ही भारतीय नौ सेना के लिए मिग 29 के खरीदने का आदेश दे दिया है और यह विमान खटारा गोर्शकोव जो भारतीय नौ सेना में आते ही आईएनएस विक्रमादित्य हो जाएगा, से ही उड़ान भरेंगे। रुस ने मिग 35 की सीरिज का दस अरब डॉलर की खरीद का एक प्रस्ताव भेजा है और भारत गंभीरता से उस पर विचार कर रहा है। वायु सेना के विशेषज्ञों ने साफ कह दिया है कि मिग 35 मिग 29 का ही थोड़ा बदला हुआ संस्करण्ा है मगर रक्षा मंत्रालय रूस को वचन दे चुका है।

और मिग 29 को जो अपग्रेड किया जाना है वह तो काम रूसी इंजीनियर ही करेंगे लेकिन इस पर 9 अरब 63 करोड़ डॉलर का जो खर्चा आएगा वह भारतीय नौ सेना को देना होगा। मनमोहन की अर्थव्यवस्था पता नहीं क्या कहती है मगर इतने पैसे में तो पूरे देश में शिक्षा का अधिकार लागू करने के लिए स्कूल खोले जा सकते हैं और पांच साल तक शिक्षकों का वेतन निकल सकता है। मगर हमने तो रुस को उसका कबाड़ खरीदने का वचन दे दिया है और इस मामले में भारत दुनिया का सबसे बड़ा कबाड़ी देश हो जाएगा।

एक बार पहले भी मिग 21 और मिग 27 विमानों को अपग्रेड किया गया था। अरबों रुपए उसमें भी खर्च हुए थे और बाद में ध्यान आया था कि मिग के इंजीनियरों ने बीवीआर नाम का वह उपकरण लगाया नहीं जिससे नजर के पार भी रडार की मदद से हमले किए जा सकते है। पाकिस्तान के पास यह उपकरण हैं मगर भारत जो मिग 35 का सौदा करने जा रहा है उसमें यह उपकरण नहीं है। भारत को अपने पायलटों की जान और भारत की जनता से वसूले गए पैसे की परवाह नहीं है। मिग 29 का आठ अरब पचास करोड़ डॉलर एडवांस भुगतान कर भी दिया गया है। इनमें से छह विमान मूल उपकरणों के साथ तथाकथित तौर पर सुरक्षित बनाए जा रहे हैं और बाकी के लिए कह दिया है कि हम भारतीय वायु सेना के इंजीनियरों को प्रशिक्षित कर देंगे और वे नासिक में वायु सेना इंजीनियरिंग केंद्र में अपने आप अपनी मर्जी से सुधार कर लेंगे। 2010 से 2011 के बीच सिर्फ चौदह विमानो को सुरक्षित बनाने के लिए उनके सुधार करने का प्रस्ताव किया गया है।

वायु सेना के अधिकारियों का कहना है कि ये सुधार करने के बाद मिग 29 विमानों की उम्र 25 से बढ़ कर 40 साल हो जाएगी मगर सवाल यही है कि हमारा इतना मिग मोह क्यों हैं? भारत सरकार दरअसल जागी ही तब थी जब पांचवा मिग 29 जामनगर के पास अरब सागर में गिरा था। मिग बेड़े की जांच हो ही रही थी तब तक एक और जहाज गिर गया। यह दुर्घटना भी जामनगर के पास हुई थी। पूरी दुनिया में 350 मिग जहाज गिर चुके हैं जिनमें 170 पायलट अपनी जान नहीं बचा पाए।

कुल मिला कर कहानी यह है कि भारत सरकार को और खास तौर पर भारत के रक्षा मंत्रालय को मिग दुर्घटनाओं से कोई सबक सीखने की जरूरत नहीं जान पड़ती। एनडीए सरकार ने रूस के प्रति रक्षा सामग्री की निर्भरता घटाने की कोशिश की थी और अमेरिका और फ्रांस के साथ लड़ाकू विमानों के सौदे किए थे मगर भारत सरकार यानी यूपीए की सरकार की प्राथमिकताओं में न पायलटों की सुरक्षा है और न विमान दुर्घटनाओं से बचाव की सुरक्षा का कोई अभियान हैं। मेरा फिर सवाल यही है कि हम रूस के हाथों कब तक ठगे जाते रहेंगे?