जेठमलानी के सामने बंधक भाजपा
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सुप्रिया रॉय
हर्षद मेहता और केतन पारिख जैसे कुख्यात ठगों, इंदिरा गांधी के हत्यारों, संसद पर हमले के मामले में फांसी की सजा पा चुके अफजल गुरु उर्फ मोहम्मद अफजल, जेसिका लाल के कातिल मनु शर्मा और आईपीएल में इतिहास का सबसे प्रचंड घोटाला करने वाले ललित मोदी की वकालत करने वाले और तमाम हत्यारे और तस्करों के लिए अदालत में खड़े होने वाले राम जेठमलानी भाजपा की मजबूरी क्यों हैं यह समझना कठिन है।

जेठमलानी भाजपा की इतनी बड़ी मजबूरी बन गए कि राजस्थान में विधायकों को एक होटल में बंधक बना कर रखा गया ताकि वे किसी और उम्मीदवार से सौंदा नहीं कर सके। यानी भाजपा ने अपने विधायको पर ही जेठमलानी के कारण अविश्वास किया। यही जेठमलानी अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में कानून नहीं, शहरी विकास के मंत्री बनाए गए थे और अटल जी ने सन 2000 में जब जेठमलानी मुंबई से पुणे एक कानूनी भाषण देने जा रहे थे तो जसवंत सिंह से फोन करवाया था कि प्रधानमंत्री ने उनका इस्तीफा मांगा है।

जेठमलानी शहरी विकास मंत्र के नाते नई दिल्ली के विराट वैभवशाली बंगलों, नॉर्थ और साउथ ब्लॉक को गिरा कर वहां मंत्रालयों और मंत्रियों और सांसदों के लिए मुंबई की तरह मल्टी स्टोरी इमारते बनाना चाहते थे जबकि यह पूरा इलाका राष्ट्रीय धरोहर घोषित किया जा चुका है और यहां बगैर अनुमति के एक दीवार भी खड़ी नहीं की जा सकती। यही उनके मंत्रिमंडल से निकाले जाने की वजह बन गई।

जेठमलानी के बारे में सब जानते हैं कि 2004 के लोकसभा चुनाव में जब एनडीए सरकार का सूरज अस्त हुआ था तो जेठमलानी लखनऊ से अटल बिहारी वाजपेयी के खिलाफ निर्दलीय और कांग्रेस के अघोषित समर्थन से लोकसभा चुनाव लड़े थे और जैसा कि स्वाभाविक था, हार गए थे। इस चुनाव के दौरान उन्होने भाषणों में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार को देश की सबसे भ्रष्ट सरकार कहा था और यह भी कहा था कि चुनाव का नतीजा जो भी हो, उनके पास वाजपेयी और वाजपेयी सरकार के खिलाफ इतने सबूत हैं कि वे अटल जी को जेल भिजवा सकते है।

राज्यसभा चुनाव के पहले उन्होने लाल कृष्ण आडवाणी, नितिन गडकरी, सुषमा स्वराज और अरुण जेटली को एक खुली चिट्ठी लिखी थी जिसमें कहा गया था कि मै भाजपा का पुराना साथी हूं और मुझे मध्य प्रदेश से राज्यसभा की सीट पर नामांकन दे दिया जाए। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जेठमलानी के अतीत से अच्छी तरह वाकिफ रहे हैं इसलिए उन्होंने विनम्रता लेकिन सख्ती से जेठमलानी को टिकट देने से इनकार कर दिया। शिवराज सिंह को भूतपूर्व कॉमरेड चंदन मित्रा मंजूर थे और खुद चंदन मित्रा आश्चर्यचकित हैं कि उन्हें कैसे मध्य प्रदेश से टिकट मिल गया क्योंकि वहां से तो हेमा मालिनी को निर्वाचित करने की बात चल रही थी।

अलग अलग दलों में अपनी अपार कानूनी प्रतिभा के माध्यम से जोड़ जुगाड़ कर लेने वाले जेठमलानी 1987 से आज तक लगातार संसद सदस्य बने हुए हैं। उनके बेटे महेश जेठमलानी भी लोकसभा का चुनाव मुंबई से भाजपा  के टिकट पर लड़ कर हार चुके हैं। पुत्र से याद आया कि जेठमलानी जब वर्तमान पाकिस्तान के सिंध प्रांत के शिकारपुर के एक परिवार से निकल कर सिर्फ सत्रह साल की उम्र में वकालत की डिग्री ले चुके थे और सिंध के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ने इतनी कम उम्र में वकालत करने की उनको इजाजत दे दी थी, उसके बाद से उन्होने कानून की दुनिया में लगातार सफलता के झंडे गाढ़े। मगर उनका निजी जीवन विवादों से दूर नहीं हैं।

जेठमलानी ने पहली शादी 1947 में यानी चौबीस साल की उम्र में की। पत्नी का नाम रत्ना था और दोनों काफी सुखी जोड़ा माने जाते थे। मगर जैसे ही राम जेठमलानी विभाजन के बाद बंबई पहुंचे तो उन्हें दुर्गा पसंद आ गई। 15 अगस्त 1947 के पहले ही वे दुर्गा से विवाह कर चुके थे और अब उन्हें विवाह का रजिस्ट्रेशन करवाना था। उस समय बंबई एक प्रांत था जिसे प्रेसीडेंसी ऑफ बॉम्बे कहते थे और वहां दो विवाह करना गैर कानूनी था। इसलिए राम जेठमलानी ने जिंदगी में दिल्ली की पहली यात्रा की और दुर्गा को दिल्ली में आ कर अपनी दूसरी पत्नी बनाया। महेश जेठमलानी और रानी जेठमलानी इन्हीं की संतान हैं और नामी वकील भी है।

जेठमलानी ने जब अटल बिहारी वाजपेयी के खिलाफ चुनाव लड़ने का लखनऊ से फैसला किया था तो भाजपा के सभी महान बडे नेताओं ने उन्हें भटका हुआ, मानसिक रूप से बीमार, देशद्रोही और उलझा हुआ शरणार्थी तक कह डाला था। भाजपा नेताओं के पास यह कहने के कारण भी थे। आखिर इन्हीं जेठमलानी ने संसद में कांधार विमान अपहरण विवाद पर अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधान सचिव और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बृजेश मिश्रा को आतंकवादियों को छोड़ने के फैसले के लिए जिम्मेदार ठहराया था। जिस सरकार ने यह फैसला किया था उसमें जेठमलानी खुद कानून मंत्री थे मगर उन्होंने संसद में कहा था कि उनकी सलाह तो मानी ही नहीं गई। जिन लाल कृष्ण्ा आडवाणी ने जेठमलानी को टिकट दिलवाया था उन्होंने संसद में ही कहा था कि जेठमलानी गलत जानकारी दे रहे हैं और मैंने भी कांधार मामले में विरोध जाहिर किया था। जेठमलानी ने आडवाणी का मजाक उड़ाते हुए कहा था कि आप कैसे गृह मंत्री थे कि इस मामले को मंत्रिमंडल तक नहीं ले गए। इसका मतलब है कि आपकी सरकार में भी सुनी नहीं जाती। आडवाणी को निरुत्तर होना पड़ा था।

जेठमलानी के एनडीए सरकार में मंत्री रहने के दौरान कई और कहानियां है। सरकारी फाइलों से जाहिर है कि प्रधानमंत्री के तौर पर अटल बिहारी वाजपेयी ने जेठमलानी पर कभी भरोसा नहीं किया मगर आडवाणी की राय मान कर उन्हें मंत्री जरूर बना दिया और एक दौर में वे कानून मंत्री भी रहे। उसी दौरान भारत के अटॉर्नी जनरल के तौर पर आडवाणी के पुराने दोस्त रहे सोली सोराब जी को नियुक्त किया गया था और अधिकारो और कानूनी मामलों में राय को ले कर दोनों दोस्तों के बीच ऐसी दुश्मनी हुई कि जेठमलानी ने सोराब जी को बहुत रुखी चिट्ठियां लिखी। इतना ही नहीं, भारत के भूतपूर्व मुख्य न्यायाधीश ए एस आनंद ने भी इस बात पर आपत्ति की थी कि विभिन्न न्यायिक आयोग के अध्यक्ष चुनते समय उनसे नहीं पूछा गया। जेठमलानी ने कहा था कि उन्हें इतना कानून आता है कि वे न्यायमूर्ति आनंद की सिफारिशे सुनने के लिए बाध्य नहीं हैं।

एक बार वकीलों ने हड़ताल की तो जेठमलानी ने न सिर्फ वकीलों को हड़काया बल्कि बार एसोसिएशन के अध्यक्ष को पद से हटा दिया। बाद में वे खुद सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष चुने गए। मुंबई के दंगों के बारे में श्रीकृष्ण आयोग की रिपोर्ट पर तो उन्हाेंने कह दिया था कि न्यायपालिका सरकार के काम में हस्तक्षेप कर रही है। जेठमलानी तो कहते है कि अटल बिहारी वाजपेयी के कान उनके खिलाफ सोली सोराब जी ने भरे थे और सोराब जी को मेरा कानून मंत्री बनना पसंद नहीं आया। राम मंदिर के मामले में भी राम जेठमलानी की राय एनडीए सरकार और भाजपा से एकदम अलग रही है।

ऐसे में राम जेठमलानी को लाल कृष्ण आडवाणी ने अगर जिद कर के राज्यसभा में ले जाने की पहल की तो जाहिर है कि यह उनका सिंधि भाई वाला प्रेम नहीं होगा। आडवाणी पर चाहे जितने आरोप लगते रहे मगर सच यह भी है कि जब आडवाणी पर हवाला कांड में आरोप लगा था तो उनके वकील भी जेठमलानी ही थे। इसके अलावा गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ गुजरात के दंगों के मामले भी जेठमलानी ही लड़ रहे हैं और चूंकि नरेंद्र मोदी भाजपा के लिए जरूरी है तो जेठमलानी उनके लिए जरूरी क्यों नहीं होंगे?