बांग्लादेश के भीतर जो हो रहा है
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आलोक तोमर
बांग्लादेश के स्वाधीनता संग्राम में भारत का सहयोग और सक्रिय भूमिका होने का रहस्य अब कोई रहस्य नहीं है। कहानी शेख मुजीबुर्रहमान से शुरू हुई थी जो पाकिस्तान के आम चुनाव में 1971 में पूर्वी पाकिस्तान यानी अब के बांग्लादेश के सबसे बड़े नेता बन कर उभरे थे। उस समय की पाकिस्तान सरकार ने शेख मुजीब को बातचीत के बहाने इस्लामाबाद बुलाया था और कैद कर के यह ऐलान भी कर दिया था कि देशद्रोह के आरोप में मुजीब को सजा ए मौत सुनाई जाएगी।

पूर्वी पाकिस्तान में हंगामा खड़ा हो गया था। अभूतपूर्व जुलूस निकल रहे थे। सरकारी कार्यालयों पर ताले पड़ गए थे। बैंको के खजाने लुट रहे थे और पाकिस्तानी सेना ने सीधे अपनी ही जनता पर हमला बोल दिया। बंगाली सैनिक नहीं लड़ेंगे और अपनों को नहीं मारेंगे, यह सोच कर पंजाब से पंजाबी और पठान फौजी पलटने बुलाई गई। दमन और अत्याचार इस हद तक पहुंच गया था कि बांग्लादेश से लोग भाग कर भारत आने लगे।
इंदिरा गांधी इस अवसर की नजाकत, संकट और संभावनाओं तीनों को समझ गई थी। भारतीय सेना और सीमा सुरक्षा बल के अधिकारियों और जवानों द्वारा बांग्लादेश के पिट रहे नागरिकों को संगठित और सैनिक रूप में प्रशिक्षित करने का काम होता रहा। नागरिक की इस सेना को मुक्तिवाहिनी नाम दिया गया था और 1971 के दिसंबर महीने में पाकिस्तान ने भारत के पश्चिमी और उत्तरी सेक्टरों यानी गुजरात, राजस्थान और कश्मीर के इलाकों में हमला बोल दिया था।

इंदिरा गांधी ने रिचर्ड निक्सन जो उस समय अमेरिका के राष्ट्रपति थे, को फोन कर के सारे हालात बताए और कहा कि अब भारत के लिए पाकिस्तान के साथ युद्व में शामिल होने के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचा है। निक्सन ने खुली धमकी दी कि अगर ऐसा हुआ तो अमेरिका पाकिस्तान का साथ देगा। इंदिरा गांधी जीवट वाली महिला थी और उन्होंने हमले का जवाब हमले से दिया। निक्सन ने धमकी देने के लिए अपनी नौसेना का सातवां बेड़ा बंगाल की खाड़ी में भेजा और इंदिरा गांधी ने रेडियो पर आ कर ऐलान किया कि अगर ये बेड़ा अगले चौबीस घंटों में भारतीय समुद्र सीमा से बाहर नहीं हो जाता तो फिर हमारी जंग अमेरिका से हैं। बेड़ा रवाना हो गया। युद्व हुआ और हमेशा की तरह पाकिस्तान हारा।


पाकिस्तान को आखिरकार शेख मुजीब को रिहा करना पड़ा और वे सीधे बांग्लादेश जाने की बजाय पहले भारत आए जहां उन्हें बंग बंधु का नाम दिया गया और बहुत बड़ी शोभा यात्रा निकाली गई। इतिहास के इस चर्चित अध्याय को आपके सामने रखने का एक ही कारण है कि बांग्लादेश में अब जो हो रहा है उसे इतिहास के संदर्भों के साथ समझा जाए। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री जुल्फीकार अली भुट्टो ने शिमला आ कर संधि पर दस्तखत किए और भारत ने पूरी उदारता दिखाते हुए लाखों युद्वबंदी रिहा किए और यहां तक कि लड़ाई में जो हिस्से पाकिस्तान से छीन लिए गए थे उन्हें भी वापस कर दिया गया। इन हिस्साें का ही इस्तेमाल कारगिल घुसपैठ के दौरान पाकिस्तानी घुसपैठियों ने किया था।

शेख मुजीब शान से नए बांग्लादेश के पहले राष्ट्रपति बने मगर पूरे चार साल वे इस पद पर रह नहीं पाए। आईएसआई के एजेंटों ने शेख मुजीब और उनके पूरे परिवार की 15 अगस्त 1975 को यानी जानबूझ कर भारत की आजादी के दिन घर में घुस कर हत्या कर दी। यह कहानी अब पैतीस साल पुरानी हो चुकी है और शेख मुजीब के हत्यारों में सेना के अफसर शामिल थे। पैतीस साल तक सरकारे बदलती रही और एक और राष्ट्रपति जिया उर रहमान का कत्ल हो गया और उनकी पत्नी खालिदा जिया भी राष्ट्रपति रह ली मगर कातिलों के साथ सजा का कोई सलूक नहीं किया गया।
इस साल 27 जनवरी को हत्यारों में जो पांच पकड़े गए थे उन्हे फांसी पर लटका दिया गया। अब बांग्लादेश में दूसरी तरह का संग्राम शुरू हो गया है। एक बड़ा तबका जिसे पाकिस्तान का खुला समर्थन प्राप्त है, अखबारो में, सभाओं में और टेलीविजन चैनलों पर प्रचार कर रहा है कि शेख मुजीब को मारा ही इसलिए गया था क्योंकि वे बांग्लादेश को भारत का उप निवेश बना देना चाहते थे और हत्यारे दरअसल बांग्लादेश के सच्चे देशभक्त थे। ये बांग्लादेशी इतने देशभक्त हैं कि अपने देश को ही अवैध करार दे रहे हैं और उसके पाकिस्तान में दोबारा विलय का अभियान चला रहे हैं।

इन लोगों का कहना है कि तत्कालीन राष्ट्रपति याह्या खान तो शेख मुजीब को पाकिस्तान का राष्ट्रपति बनाना चाहते थे मगर मुजीब भारत की मदद से बांग्लादेश बना कर उसके मुखिया बनना चाहते थे। कोई महामूर्ख ही होगा जो पूरे पाकिस्तान को छोड़ कर उसके एक प्रांत को देश बनाने और उसका मुखिया बनने की बात कहे। लेकिन बांग्लादेश का एक ताकतवर तबका यह बात कह रहा है तो इसके अलावा हमारे पास कोई विकल्प नहीं हैं कि बांग्लादेश में ऐसे तत्व भी हैं जो बांग्लादेश का वापस भारत में विलय चाहते हैं और इसके लिए उन्हे शेख मुजीब की तरह उन हसीना वाजिद को मारने में एक मिनट नहीं लगेगा जिन्हें वे भारत का एजेंट कहते है।

जब खालिदा जिया की सरकार थी तो इन पांचो हत्यारों को संसद से माफी दिलवा दी गई थी लेकिन फिर जब हसीना वाजिद आई तो उन्होंने यह फैसला पलट दिया। बांग्लादेश में मौजूद पाकिस्तान के इन एजेंटों का कहना है कि भारत की रिसर्च एंड एनालिसिस विंग- रॉ भारत का विस्तार करना चाहती है और सिक्कम जैसे बौद्व ''देश'' को इन्होने हड़प लिया। इन लोगों का कहना है कि सिक्किम में वहां के नेता काजी लेंदुक दोर्जी को भारत सिक्किम कांग्रेस का नेता बनाया गया और उसके बाद लोकतंत्र लाने के नाम पर सिक्किम के राजा चोंग्याल को हटा दिया गया और सिक्किम को भारत में मिला लिया गया। इनका इल्जाम है कि भारत बांग्लादेश के साथ भी यही हरकत करना चाहता है और इसके लिए रॉ के एजेंट सक्रिय है।

बांग्लादेश राइफल्स में अचानक अनजान लोग भर्ती होने लगे है और आपको याद होगा कि पिछले पांच वर्षों में बांग्लादेश राइफल्स ने भारत के और खास तौर पर बीएसएफ के चालीस से ज्यादा जवानो और अफसरो को मार गिराया है।

अभी एक सप्ताह पहले ही भारत और बांग्लादेश के बीच उत्तर पूर्व की सीमा पर बांग्लादेश राइफल्स ने तीन हजार राउंड गोलिया चलाई और यह फायरिंग सिर्फ दिखावे के लिए की गई थी और प्रतीकात्मक थी इसलिए इसमें सौभाग्य से कोई मारा नहीं गया। बांग्लादेश में भारत के साथ हुई तमाम बातचीत के बावजूद उत्तर पूर्व के आतंकवादियों को प्रशिक्षण मिलता रहा है और शरण मिलती रही हैं। इनमें से कुछ तो अब वापस भारत की शरण में आने लगे हैं लेकिन जो बांग्लादेश में रह गए हेैं उन्हें अपार संपत्ति और बेशुमार खजाने कहां से मिल रहे हैं यह किसी से छिपा नहीं है।

बांग्लादेश पर राज कर रही सरकार अभी इस हैसियत मे नहीं हैं कि इन सब पर काबू कर पाए लेकिन यह आसानी से समझा जा सकता है कि जब बांग्लादेश भारत के साथ हर क्षेत्र में संधि करने को तैयार है और आर्थिक के अलावा अंतर्राष्ट्रीय राजनयिक क्षेत्रों में भी भारत का समर्थन लगातार चाहिए तो कम से कम भारत के साथ वह साफ तौर पर दुश्मनी बरतने वाले कदम नहीं उठा सकता। अब अगर बांग्लादेश पर पाकिस्तान का दबाव बढ़ रहा है और वहां भी आईएसआई के बहुत सारे अड्डे मौजूद है तो यह मानना पड़ेगा कि नियंत्रण बांग्लादेश के हाथ से निकलता जा रहा है और भारत को अपने हित में ही बांग्लादेश को बिखरने और वहां कोई दूसरा हत्याकांड होने से बचाना पड़ेगा।