आलोक तोमर
नाम है सज्जन खान। धर्म है इस्लाम जिसमें बुद्व यानी मूर्तियाें की पूजा गुनाह है मगर सज्जन खान रोज सुबह अपने घर मे बने मंदिर में ब्रह्म, विष्णु, महेश की पूजा करते है। उन्हें उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले के अजीतगंज गांव में सज्जन ठाकुर के नाम से भी जाना जाता है। रईस किसान हैं और उनके पूर्वज बैस राजपूत दर्जनों पीढ़ियो पहले इस्लाम को अपना बैठे थे। गांव के मौलवी ने उन्हे मूर्ति पूजा के कारण काफिर करार दे दिया है लेकिन सज्जन खान उर्फ सज्जन ठाकुर कहते हैं कि उन्हे इसकी परवाह नहीं हैं। उनका कहना है कि मेरी रगो में आज भी ठाकुर खून बहता है और मैं गांव के मौलवी की परवाह नहीं करता।
खान अकेले नहीं हैं। राजपूत पूर्वजो के सैकड़ो परिवार मध्य उत्तर प्रदेश के गांव में ठाकुर साहब कहे जाते हैं मगर वे मुस्लिम हैं। आम मुस्लिमों की तरह वे कपड़े भी नहीं पहनते बल्कि ठाकुरों की तरह पगड़ी बांधते हैं। चौदहवीं और पंद्रहवीं शताब्दी के दौरान गौतम, बैस और दीखित राजपूत परिवारों ने इस्लाम हमलावरों के दबाव में इस्लाम धर्म अपना लिया था और फतेहपुर, बांदा और उन्नाव जिलों में बस गए थे। मगर यह सभी और खास तौर पर गौतम मुस्लिम अब भी अपनी हिंदू विरासत को छोड़ नहीं पाए।
कानपुर जिले के बिंदकी गांव के प्रधान रहे हसन ठाकुर कहते हैं कि यह गांव फतेहपुर जिले के गौतम ठाकुरों की राजधानी थी। ये लोग लंबी दाढ़ी नहीं रखते और देवबंद हो या उलूम, वहां के फतवे भी नहीं मानते थे। मर्द लंगी नहीं पहनते और महिलाएं बुर्का नहीं पहनती। सज्जन के पिता मिज्जन ठाकुर तो साफ साफ कहते हेैं कि खुदा को मानने का मतलब नहीं हैं कि हम अपने कपड़े तक बदल डाले। संस्कृतियों और समुदायो का यह समागम इससे भी आगे जाता है। गौतम ठाकुर और गौतम मुस्लिमों के बीच का भेद मिटा दिया गया है। हिंदू गौतम ठाकुर भी है और मुस्लिम गौतम और दोनो एक दूसरे के शोक उत्सवों में राजपूत संस्कारों के साथ शामिल होते है। एक दूसरे से मिलते हैं तो सलाम नहीं करते, पांव छूते है। होली मिलन करते है, रामलीला करते हैं, कीर्तन करते हैं और नमाज भी पढ़ते हैं। निकाह में बाकायदा मंडप के नीचे फेरे लिए जाते हैं और दूल्हा टोपी नहीं, साफा पहनता है।
सज्जन खान उर्फ सज्जन ठाकुर इतने रईस हैं कि कभी भी हज करने मक्का मदीना जा सकते हैं। लेकिन सज्जन खान चित्रकूट तो हो आए हैं लेकिन अभी तक हज करने का मौका नहीं आया है। कहते हैं कि जब अल्लाह बुलाएगा तब चले जाएंगे वरना अल्लाह तो दिल में बसता है। हिंदू और मुस्लिम वोट बैंक के जमाने में यह कहानियां अटपटी लग सकती है लेकिन इनका अपना इतिहास है।
दक्षिण एशिया में जब मुसलमानों ने दिग्विजय अभियान शुरू किया था तो सबसे पहले मोहम्मन बिन कासिम ने लगातार राजपूतो को मुसलमान बनाना शुरू कर दिया था। गजनी के सुल्तान ने राजपूत महाराजा जयपाल सिंह को हराया और उनकी प्रजा को मुस्लिम घोषित कर दिया। मोहम्मद गोरी ने जब दिल्ली जीती तो 1192 में ही महाराजा पृथ्वी राज चौहान ने पहली बार में ही उसे हरा दिया था और माफ कर के वापस कर दिया था मगर वह दोबारा आया और अफगानिस्तान से जीतता हुआ दिल्ली तक पहुंचा और भारत में मुगल साम्राज्य की स्थापना की। राजपूतों को इस्लाम में आकर्षित करने के लिए उन्हे शेख और सैय्यद की उपाधियां भी दी जाने लगी। फिर भी यह धर्म परिवर्तन संस्कार पूरी तरह नहीं बदल पाया।
उत्तर प्रदेश के खुर्जा में सबसे ज्यादा धर्मांतरण हुए। पंजाब और कश्मीर में भी खास तौर पर राजपूतों को मुसलमान बनाया जाता रहा क्योंकि उन्हें अपनी फोजों में लड़ने के लिए योद्वा चाहिए थे। इस्लाम अपनाने के बावजूद जन्म से ले कर विवाह और मरण संस्कारों में भी इन लोगों ने कभी अपने हिंदू संस्कार नहीं छोड़े और आज पाकिस्तान के अधिकृत कश्मीर में 6 लाख 43 हजार मुस्लिम राजपूत रहते हैं और वहां के तो सदर भी मोहम्मद सुजा राठोड़ रह चुके हैं जिन्होने अपनी जाति का मोह नहीं छोड़ा था और मरते दम तक राठौड़ ही बने रहे।
कम लोगो को पता होगा कि पाकिस्तान के संस्थापक कायदे आजम जिन्ना के पूर्वज भी राजपूत थे। हालांकि उनका जीवन परिचय उन्हें खोजा मुस्लिम कहता है। पाकिस्तान के भूतपूर्व प्रधानमंत्री मलिक फिरोज खान मून और पाकिस्तानी पंजाब के दो और सिंध प्रांत के भी दो मुख्यमंत्री वे ही थे जो धर्म परिवर्तन कर के राजपूत से मुसलमान बने थे। पाक अधिकृत कश्मीर में राजा मुमताज हुसैन राठौर प्रधानमंत्री थे तो राजा मोहम्मद जुल्कारेन राष्ट्रपति थे। सरदार सिकंदर हयात खान भी पाक अधिकृत कश्मीर के प्रधानमंत्री रहे और राजा स्वरूप खान पाकिस्तानी पंजाब के भूतपूर्व गवर्नर थे।
पाकिस्तान के रक्षा मंत्री रहे राव सिकंदर इकबाल राजस्थान के एक राजवंश के वंशज थे और राणा मोहम्मद हयात खान वहां की संसद के अध्यक्ष भी रह चुके थे। पाकिस्तान के एक गृह मंत्री चौधरी अली अकबर खान रह चुके है। पाकिस्तान की मुस्लिम लीग के एक अध्यक्ष राणा खुदादान खान थे। और तो और जो शोएब अख्तर अभी हाल में सानिया मिर्जा से शादी कर के पाकिस्तान ले गया है उसके पूर्वज भी राजपूत थे। यह बहुत कुछ ऐसा ही है जैसे पृथ्वी राज कपूर और पूरा राजपूज खानदान पठान था। सिखों में भी राजपूतों की संख्या कम नहीं हैं और जिन्हें अपनी वंश परंपरा मालूम हैं वे अपने पूर्वजो की परंपराओं का पालन करते हैं। एक बहुत बड़ा समाज मेव राजपूत मुस्लिमों का है जिसकी जड़े मुख्य तौर पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हेैं मगर मध्य प्रदेश तथा राजस्थान में भी इनती संख्या कम नहीं है।ं इनके नाम मुस्लिम हो गए हेै लेकिन जाति के नाम अब भी राठौर, चौहान, कुशवाह, तोमर और परिहार बने हुए है।
उत्तराखंड के एक बहुत अमीर मुस्लिम परिवार के राजपूत वंश परंपरा के कुंवर रफत अफलात रावजादा ने 1981 में हिम्मत दिखाई और वापस हिंदू धर्म में आ कर कुंवर आंदन सुमन सिंह बन चुके हैं। अब तक वे उत्तर प्रदेश, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और राजस्थान में पचास हजार से ज्यादा हिंदू मूल के और खास तौर पर राजपूत मूल के मुस्लिमाें का शुद्विकरण संस्कार कर के उन्हें हिंदू बना चुके हैं।
कई मित्रों को यह तथ्य सांप्रदायिक लग सकते हैं लेकिन असल में अगर सांप्रदायिकता की जड़ और जमीन को समझना हैं तो यह ऐतिहासिक और समाजिक घटना समझनी जरूरी हैं। मुस्लिम संगठनों का एक तरह से इंटरनेट मुखपत्र मिली गजट तो अपने अंदाज में लिखता है कि आनंद सुमन सिंह वास्तव में मुस्लिम से हिंदू धर्म में आए थे लेकिन वे पहले आर्य समाज में शामिल हुए थे जहां आर्थिक घपला करने के आरोप में उन्हे निकाल दिया गया था मगर सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा के सबसे बड़े नेता स्वामी अग्निवेश इस आरोप से इंकार करते हैं।
यह सामाजिक इतिहास हमे बताता है कि भारत और पाकिस्तान में राज करने वाले चाहे जैसे हो मगर असल में वहां के लोग गर्भनाल से और पीढ़ियों के संस्कारों से आपस में एक हैं और उन्होंने धर्म बदलने की पूर्वजों के जमाने में कभी रश्म निभाई हो तो अलग बात है मगर सिर्फ नाम के लिए मजहब बदला और मजहब के लिए नाम नहीं बदले।