आलोक तोमर
आप भले ही अनिल अंबानी हो, रतन टाटा हो या धनकुबेर लक्ष्मी मित्तल हों लेकिन अमेरिकी सरकार की राय में आपकी जान की कीमत और वह भी नकदी में अधिक से अधिक आठ हजार डॉलर यानी पैतीस हजार रुपए से ज्यादा नहीं है।
यूनियन कार्बाइड ने भारत की विकास दर और गरीबी को ध्यान में रखते हुए हमारी और आपकी यह कीमत लगाई है और यह भारत सरकार में बगैर किसी लज्जा के इसे मंजूर भी कर लिया। जैसा कि आपको पता है, भारत सरकार के लिए अपने नागरिकों की जान से ज्यादा अमेरिकी पूंजी निवेश महत्वपूर्ण रहा है और डाओ केमिकल्स के पक्ष में इस तरह की राय चिदंबरम भी दे चुके हैं और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह उस पर दस्तखत कर चुके हैं।
अमेरिका की अदालत में भारत सरकार ने मुआवजे का जो मुकदमा किया था और बाद में जिसे न्याय क्षेत्र नहीं होने के बहाने खारिज कर दिया गया था उसमें यूनियन कार्बाइड की ओर से साफ साफ कहा गया है कि भारत जैसे गरीब, पिछड़े और दूसरो की सहायता पर आश्रित देश को अमेरिकी सांस्कृतिक मूल्यों और यहां के नागरिकों की जीवन शैली के आधार पर मुआवजा नहीं मांगना चाहिए। बाकायदा गिनती कर के बताया गया है कि एक अमेरिकी व्यक्ति के जीवन की कीमत अमेरिका के समृध्दि और विकास को देखते हुए पांच लाख डॉलर लगाई जा सकती है जबकि भारत का सकल घरेलू उत्पादन यानी जीडीपी अमेरिका का सिर्फ 1.7 प्रतिशत हैं इसलिए एक भारतीय जीवन का मूल्य सिर्फ साढ़े आठ हजार डॉलर से ज्यादा नहीं लगाया जा सकता।
माफ कीजिए, गाली देने का मन कर रहा है। यूनियन कार्बाइड के इन हरामियों को भारत के नागरिकों की जीवन का मोल तय करने का अधिकार किस कमीने ने दे दिया? उस पापी को तो आधा मिट्टी मे गाढ़ कर उस पर भूखे कुत्ते छोड़ देना चाहिए और तब तक इंतजार करना चाहिए जब तक उसका कंकाल नहीं रह जाए और फिर अमेरिका सरकार से पूछना चाहिए कि भाई साहब इस कंकाल की कीमत क्या है?
मगर अब इसका क्या करे कि भारत सरकार और दुनिया के सबसे बड़े अर्थशास्त्री के तौर पर प्रचारित किए जा रहे मनमोहन सिंह को भी यह शर्मनाक गणित मंजूर है। मनमोहन सिंह को जितनी आर्थिक विद्वान होने की महानता परोसी जा रही है, वे उसके पात्र नहीं हैं। विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष में वे सिर्फ बाबू रहे हैं और दूसरों के निष्कर्षों और निर्णयों का पालन करते रहे है। जिस खुले बाजार का श्रेय उन्हें दिया जाता हैं उसका बीज तो राजीव गांधी सरकार के दौरान ही पड़ गया था क्योंकि राजीव गांधी के सबसे खास सलाहकार अरुण नेहरू, अरुण सिंह, गोपी अरोड़ा और रोमी छावड़ा सब कॉरपोरेट जगत के प्राणी थे और उन्हें पूरी दुनिया का धंधा समझ में आता था। विश्व व्यापी अर्थव्यवस्था राजीव गांधी के जमाने में शुरू हो गई थी और मनमोहन सिंह ने नरसिंह राव के जमाने से इसे आगे ही बढ़ाया। हमारे प्रधानमंत्री कितने बड़े अर्थशास्त्री है वह बाजार में चल रही महंगाई की दर को देखते हुए समझ में आ जाता है।
भारत सरकार ने 1985 में एक कानून बना कर अपने आपको भोपाल के अभागे नागरिको का प्रतिनिधि नियुक्त कर लिया था। कई वकीलों ने और खास तौर पर सरकारी वकीलों ने इसकी तारीफ भी की लेकिन अगर गौर कर के देखे तो पता चलेगा कि भोपाल की जनता का जितना बड़ा अपमान भारत की अपनी सरकार ने किया है उतना यूनियन कार्बाइड ने नहीं किया। यूनियन कार्बाइड तो अपनी खाल बचा रही थी और भारत सरकार उसके प्रति मानवीय आधारो पर दोस्ती निभा रही थी। ये अमानवीय साबित होने वाले मानवीय अधिकार 1989 में बेनकाब हुए थे जब छह लाख दांवों में से सिर्फ दो लाख को जांच करने के लिए मंजूर किया गया था। बाद में इनमें से भी एक लाख रुपए काट लिए गए और एक लाख की फिर कटौती कर ली गई। यह यूनियन कार्बाइड ने नहीं, भारत सरकार ने किया था।
आखिरकार पता नहीं किस कानूनी चमत्कार से मरने वालों की संख्या तीन हजार और गंभीर रूप से आहत होने वालों की संख्या पचास हजार हो गई। भारत सरकार ने कृपालु यूनियन कार्बाइड के साथ समझौता किया और एक लाश की कीमत साढ़े चौदह हजार डॉलर और गंभीर रूप से शिकार हुए लोगों की कीमत सिर्फ तीन हजार एक सौ पच्चीस डॉलर लगाई। अरे, भारत सरकार के अपने औद्योगिक मुआवजा कानून में ही इससे ज्यादा मुआवजा मंजूर है। भारत सरकार ने तो अपने ही कानून का पालन नहीं किया। मृतक मजदूरों को जो राहत मंजूर की गई थी और अब उसे थोड़ा बढ़ाया गया है वह उनके छह महीने वेतन के भी बराबर नहीं है।
जो लोग शारीरिक रूप से बहुत कमजोर हो चुके थे और तिल तिल कर के मर रहे थे उनके लिए वैकल्पिक रोजगार की कोई व्यवस्था नहीं की गई। यहां यह याद दिलाना जरूरी है कि अभी हाल में मैक्सिकों की खाड़ी में ब्रिटिश पेट्रोलियम के तेल रिसाव की दुर्घटना के बदले अमेरिका ने दो अरब डॉलर का मुआवजा वसूल कर लिया है। क्योंकि जैसा कि पहले कहा, अमेरिका विकसित और अमीर देश है और वहां के नागरिकों के जीवन की कीमत भारत से बहुत ज्यादा लगाई जाती है। यह बात अलग है कि अगर अमेरिका में बसे भारतीय एक साथ वापस आ जाए तो नासा से ले कर अमेरिका का इंटरनेट और स्वास्थ्य तंत्र एक पल में ध्वस्त हो जाएगा।