ऐसे जाओगे दिग्विजय!
Images


आलोक तोमर
दिग्विजय सिंह इतने अचानक जाएंगे इसका कतई अंदेशा नहीं था। इस नवंबर में वे पचपन साल के होने वाले थे और देखने में चालीस से ज्यादा के नहीं लगते थे। जब उनके राजनैतिक मार्गदर्शक चंद्रशेखर अच्छी खासी काया के बावजूद अचानक बीमार पड़ कर हमेशा के लिए चले गये थे उस दिन भी और  हमारे गुरु प्रभाष जोशी के निधन के दिन भी उनके घर के नीचे खड़े होकर दिग्विजय सिंह ने कहा था कि इस साली जिंदगी का क्या भरोसा? आज है और कल नहीं। प्रभाष जी और चंद्रशेखर लंबी उम्र जी चुके थे मगर दिग्विजय सिंह को तो इन दिनों ममता बनर्जी अपने कोटे से रेलवे राज्यमंत्री बनाने को तैयार थी।
बिहार के गिध्दौर इलाके के जमुई गांव के रहने वाले दिग्विजय सिंह चंद्रशेखर की सरकार मे भी थे और अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में भी। तीन बार लोकसभा और दो बार राज्यसभा के सदस्य रहे थे और आखिरी चुनाव वो नीतिश कुमार के सामने डंके की चोट पर बगावत करके बांका से अपनी दम पर निर्दलीय जीता था। अपनी दम पर दिग्विजय को बहुत भरोसा था। आखिर बिहार के एक देहात से आकर जवाहर लाल नेहरु छात्रसंघ का चुनाव भी वे अपने दम पर ही जीते थे।  
1955 में जन्मे दिवंगत सांसद जेएनयू की छात्र राजनीति के भी मजबूत स्तंभ थे। वे छात्र संघ के महासचिव भी रहे। हाल ही में किसान महापंचायत के माध्यम से उन्होंने एक नये राजनीतिक आंदोलन की नींव डाली और 9 मई को गांधी मैदान में आखिरी जनसभा संबोधित की थी। इस समय वे बांका से निर्दलीय सांसद थे। दिवंगत प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की श्भारत यात्राश् में उनके साथ उन्होंने पदयात्रा की थी। राजनीतिक सफर की उनकी शुरुआत राज्यसभा सदस्य के रूप में 1990 में हुई। चंद्रशेखर मंत्रिमंडल में वे वित्ताा राज्य मंत्री बनाये गये थे।
बाद में विदेश मंत्रालय का भी उन्हें जिम्मा मिला। 12वीं लोकसभा के सदस्य के रूप में 1998 में उन्होंने लोकसभा में प्रवेश पाया। 1999 में 13वीं लोकसभा में वे दुबारा चुने गये। वाजपेयी सरकार में वे रेल राज्यमंत्री भी बनाये गये थे। बाद में इन्हें उद्योग व वाणिज्य मंत्रालय और विदेश मंत्रालय का भी जिम्मा मिला। 15वीं लोकसभा में तीसरी बार 2009 में बांका से निर्दलीय चुने गये। राज्यसभा सदस्य के रूप में इस्तीफा देकर उन्होंने बांका से चुनाव लड़ा था।
यह उनकी खासियत थी कि विचारधारा के लिए वे सदैव संघर्षरत रहते थे। अपनी राजनीतिक प्रतिबध्दताओं से कभी उन्होंने समझौता नहीं किया। जदयू से टिकट नहीं मिलने पर वे निर्दलीय चुनाव लड़े और जीते। बड़े पद पर रहकर उसकी गरिमा जरूर बढ़ायी पर छोटे पद के लिए कभी राजनीति नहीं की। जेएनयू के कोर्ट मेम्बर होने के साथ ही वे राष्ट्रीय रायफल एसोसिएशन के भी पदाधिकारी थे। राष्ट्रकुल खेल की समिति में भी वे शामिल रहे। श्री सिंह ने अनेक देशों की यात्रा की थी।
अपनी जन्म भूमि गिध्दौर (जमुई) से उनकी गहरी बाबस्तगी थी। हर वर्ष दुर्गा पूजा के मौके पर वे यहां गिध्दौर महोत्सव का आयोजन करते थे। देश के बड़े पत्रकार और कलाकारों का यहां जुटान होता रहा। दिवंगत सुरेंद्र सिंह और माता सोना देवी की वे इकलौती संतान थे।
छात्र राजनीति का सफर रू पटना विश्वविद्यालय की पढ़ाई के बाद एमए और एमफिल के लिए उन्होंने जेएनयू में नामांकन कराया था। वहां के छात्र संघ के वे अध्यक्ष भी रहे थे। बाद में पढ़ाई के लिए जापान भी गये लेकिन नौकरी का अवसर मिलने के बावजूद जापान छोड़कर वापस भारत आए।

दिग्विजय सिंह बहुत सारे रहस्य अपने सीने में दफन करके ले गये। एक रहस्य तो उन्होने पूरी जिंदगी किसी से नहीं कहने के लिए कहा था मगर अब वे नहीं तो बताया जा सकता है। आखिर दिग्विजय ने जिंदगी की शर्त तोड़ दी तो उम्मीद है कि उनकी आत्मा यह शर्त तोड़ने के लिए भी मुझे माफ कर देगी। परवेज मुशर्रफ जब कारगिल  के बाद पहली बार भारत आये थे तो आगरा बैठक में उन्हे ले जाने के लिए प्रोटोकॉल के तहत दिग्विजय सिंह को ही नियुक्त किया गया था। दिग्विजय सिंह याद करते थे कि जब गाड़ी तीस जनवरी मार्ग से निकली तो मुशर्रफ ने पूछा कि क्या आपके यहां तारीखों पर भी सड़कों के नाम रखे जाते हैं? 
दिग्विजय ने मुशर्रफ का सामान्य ज्ञान बढ़ाया था कि तीस जनवरी को आपके मुल्क को साठ लाख रुपये दिलवाने से नाराज नाथूराम गोडसे ने इसी सड़क पर गांधी जी की प्रार्थना सभा में उनकी हत्या की थी। मुशर्रफ ने एक और सवाल किया था कि आपके यहां हमारे कायदे आजम जिन्ना के नाम पर कोई सड़क नहीं है। दिग्विजय ने कहा था योर एक्सीलेंसी आपके यहां महात्मा गांधी के नाम पर कोई गली भी हो तो बता दीजिएगा। फिर भी दिग्विजय और मुशर्रफ की दोस्ती हो गयी थी।
अब वो रहस्य जिसके बारे में बहुतों को पता नहीं। आखिर आगरा वार्ता विफल क्यों हुई और मुशर्रफ आधी रात को पाकिस्तान के लिए क्यों उड़ गये। कहानियां बहुत सारी कही जाती है मगर दिग्विजय सिंह से ज्यादा किसको पता होगा। दिग्विजय ने बताया था कि होटल के अपने कमरे में भारत के साथ दोस्ती का करार साइन करने मुशर्रफ निकल ही रहे थे तभी टीवी चौनल पर भाजपा नेता सुषमा स्वराज पत्रकारों से हरियाणवी अंग्रेजी में बात करते हुए दिखाई पड़ीं। सुषमा स्वराज कह रहीं थी कि पाकिस्तान कितना भी जोर लगा ले हम कश्मीर पर अपना हक कायम रखेंगे। दिग्विजय ने बताया था कि मुशर्रफ तैयार हो रहे थे और यह सुनते ही धम से सोफे पर बैठ गये और बहुत रुआंसी आवाज मे पूछा कि इस बयान के बाद मै किसी भी करार पर दस्तखत कर दूं, पाकिस्तान जाकर क्या मुंह दिखाउंगा। इसके बाद वे अटल जी से मिले बगैर वापस निकल गये।
लोदी रोड पर जो बंगला उन्हे सांसद के तौर पर मिला उसी में वे मंत्री बनने पर भी रहें और मंत्री नहीं रहे तो भी रहे। पत्रकारिता के प्रति इतना प्रेम कि प्रभाष जी की कागद कारे वाली रचनावली प्रकाशित हुई तो आयोजन से लेकर कम से कम हजार लोगों की पार्टी का खर्चा खुद उठाया। जब मैं पैगम्बर वाले कार्टून के प्रकाशन के सिलसिले में दिल्ली के तात्कालीन पुलिस आयुक्त के के पॉल के कमीनपन का शिकार होकर तिहाड़ जेल पहुंच गया तो साथ देने वालों में दिग्विजय सिंह सबसे आगे थे। उन्होने ने तत्कालीन उप-राष्ट्रपति भैरो सिंह शेखावत से शिवराज पाटील को फोन करवाया । तब तक एक फोन अटल बिहारी वाजपेयी भी कर चुके थे और मुद्दा संसद में उठ चुका था।
दिग्विजय सिंह के घर जाओ तो पेट भर कर खाये बगैर नहीं लौटते थे। एक बार अपनी मुसीबत उन्हे बता दो तो वह दिग्विजय सिंह की मुसीबत बन जाती थी। जार्ज फर्नाडीज के अपमान के मामले पर नीतिश कुमार से भिड़ गये और शरद यादव ने जब कहा कि तुम्हे भाजपा से टिकट दिलवा देते हैं तो उन्होने कहा कि इतने बुरे दिन नहीं आये हें। जिस राज्य का मुख्यमंत्री हराने पर तुला हो वहां भी अच्छे खासे वोट पाकर जीते और ठाठ से दिल्ली में झंडा गाड़ा। लोग उन्हे राजपूत वादी कहते हैं मगर उनके सबसे अंतरंग दोस्तों में प्रभाष जी थे, उदयन शर्मा थे और ये दोनों राजपूत नहीं थे।
वैसे भी जब ब्राम्हण नेता ब्राम्हणों की राजनीति करते हैं और यादव नेता यादवों की तो दिग्विजय सिंह भी इसी राजनैतिक संसार मे रहने के लिए अभिशप्त थे और इस अभिशाप के बावजूद बहुतों की छत्रछाया बने हुए थे। पत्नी पुतुल और दो प्यारी बेटियों के दिल पर क्या बीत रही होगी। पता नहीं। मगर दिग्विजय सिंह से शिकायत है कि इतने अचानक और बगैर बताये क्यों चले गये। आखिर प्रियरंजन दास मुंशी पिछले तीन साल से बेहोश नहीं पड़े हुए हैं। दिग्विजय सिंह का यह विश्वास था कि उनके दोस्त, और मेरे जैसे छोटे भाई रो रो कर ही याद करेंगे।