अटल जी के नाम पर एक कलंक
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आलोक तोमर 
अटल बिहारी वाजपेयी की जिंदगी में विवाद और अपवाद तो बहुत आए, लेकिन कलंक का सामना उन्हें अब करना पड रहा है। इस कलंक का नाम अनूप मिश्रा है। अनूप मिश्रा भाजपा के नेता हैं। पार्टी के बडे पदों पर रह चुके हैं और मामाजी का नाम जितना अनूप मिश्रा ने भुनाया है, उतना तो और किसी ने नहीं भुनाया होगा। अटलजी के पूर्वजों और वंशजों में अनूप मिश्रा बहुत ताकतवर माने जाते हैं और अटलजी कहते हों या न कहते हों, उनकी परावर्तित आभा अनूप पर पडी हुई है, इसलिए जब भाजपा को ताकत मिलती है, तो उसमें अनूप मिश्रा की भागीदारी हमेशा रहती है।
अटल जी ने अपना परिवार कभी नहीं बसाया, लेकिन उनकी बहुतों पर कृपा होती रही है। उनमें से कुछ पात्र थे और ज्यादातर अपात्र। अपात्रों की इस सूची में अचानक अनूप मिश्रा का नाम सबसे ऊपर आ गया है। अनूप मिश्रा ने माल काटा, अपने आपको राष्ट्रीय नेता के तौर पर स्थापित करने की कोशिश की, मामाजी प्रधानमंत्री बने, तो अनूप मिश्रा नेहरू युवा केंद्र के उपाध्यक्ष के तौर पर केंद्रीय उपमंत्री का दर्जा पाकर दिल्ली में विराजमान हो गए। यहां के उनके कामों पर इतना विवाद हुआ और हिसाब-किताब में इतनी गडबड हुई कि आखिरकार रजिस्टर ही गायब करने पडे। जल्दी ही उनको अहसास हो गया कि उनके अंदर मामाजी यानी अटल बिहारी वाजपेयी जैसे राजनेता और राजनायक बनने की क्षमता नहीं है। अगर अनूप मिश्रा अपने दम पर राजनीति करते, तो शायद कभी नगर निगम के पार्षद भी नहीं हो पाते। अब अटलजी का नाम जुडा है, तो भाजपा और सत्ताा जब भी करीब आते हैं, तो अनूप की गाडी पर लाल बत्ताी भी लग ही जाती है।
यह जानने के लिए बहुत ज्ञानी होने की जरूरत नहीं है कि राजनीतिक प्रताप और महिमा बहुत ही क्षणभंगुर हुआ करती है। अनूप मिश्रा जैसे लोकल राजनीतिज्ञ भी इस बात को जानते हैं। अटलजी की इच्छा हमेशा परिवार के साथ रहने की रही है और ग्वालियर की शिंदे की छावनी की तंग गलियों में प्रधानमंत्री रहने और उसके बाद भी उनका काफिला नहीं जा सकता था, इसलिए वे अनूप मिश्रा के यहां ही ठहरते थे। अनूप मिश्रा को इस बात ने भी बहुत ताकत दी। अटलजी अब बूढे हो गए हैं, तो अनूप को कारोबार का शौक लग गया है। अनूप मिश्रा जानते हैं कि आज की तारीख में शिक्षा से अच्छा कोई कारोबार नहीं है, इसलिए उन्होंने एक बडा कालेज खोला और वह भी ग्वालियर के पास एक गांव में।
अब उन्हें अपने कालेज को विश्वविद्यालय बनवाना था और इसके लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नियमों के अनुसार ज्यादा जमीन चाहिए थी, तो बेला गांव की जमीन पर कब्जा कर लिया गया। गांव और कालेज के बीच से जो मुख्य रास्ता जाता है, उस पर चाहरदीवारी बनने लगी और इसके लिए बडी-बडी मशीनें आ गईं। गांव के लोगों को पता लगा, तो पूरा गांव विरोध करने के लिए जमा हो गया। तब जाकर अनूप मिश्रा के बेटे, साले और भाई ने बताया कि उन्होंने तो पूरा गांव सरकार से लीज पर ले लिया है, लेकिन गांव वाले मानने को तैयार नहीं थे।
गांव के सारे लोग यानी महिला, पुरुष, बच्चे और बूढे जमा हो गए थे और इनका नेतृत्व करने के लिए बीस साल का बारहवीं क्लास का भीकम सामने आया और उसने महाबली अनूप मिश्रा के गिरोह से सवाल करने की हिम्मत कर डाली। पहले तो उसे धक्के मारे गए, लेकिन फिर अचानक भीकम के माथे पर पिस्तौल अडाकर गोली दाग दी गई। इससे उसका भेजा जमीन पर बिखर गया। एक दिन बाद ही भीकम के परिवार में शादी थी और अचानक ही शादी का माहौल शोक में बदल गया। पहले गोलियां हवा में चलाई गई थीं, लेकिन गांव वाले जब नहीं डरे, तो फिर जान लेने का फैसला किया गया। ज्ञान, चरित्र और एकता पर जोर देने वाली भाजपा के मंत्रीजी का पूरा खानदान घटना के समय शराब में धुत भी था।
भीकम की हत्या हुई और इसके बाद भी पुलिस खामोश थी, क्योंकि मारने वाले सीधे मुख्यमंत्री और भाजपा के सबसे बडे नेता अटल बिहारी वाजपेयी का नाम ले रहे थे। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान उस समय लंदन से दिल्ली की उडान में थे। पुलिस वाले रिपोर्ट तक नहीं लिख रहे थे। लाश जमीन पर पडी थी। गांव वाले रो-रोकर थक गए थे। मुख्यमंत्री के आधी रात से कुछ पहले भोपाल उतरने के पंद्रह मिनट के भीतर एफआईआर दर्ज हो गई। शिवराज सिंह चौहान स्वयंसेवक हैं और नाम की धौंस में नहीं आते। अनूप मिश्रा के परिवार ने इस बार जो किया, वह तो अक्षम्य है ही, एनडीए की सरकार के दौरान तो अनूप मिश्रा ने बाकायदा एक काउंटर खोल रखा था, जहां केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों से काम कराने के बदले बाकायदा वसूली की जाती थी। बहुत कम लोग जानते हैं कि बाबूलाल गौर को जब मुख्यमंत्री पद से हटाया गया था, तो अनूप मिश्रा भी मुख्यमंत्री बनने के दावेदारों में से एक थे, लेकिन अटलजी जानते थे कि उनके भांजे की असली औकात क्या है, इसलिए उन्होंने किसी से कुछ नहीं कहा। इसीलिए स्थिर मन वाले और काम करना जानने वाले शिवराज सिंह चौहान मुख्यमंत्री बने।
अटलजी की तबीयत ठीक नहीं है, लेकिन भोपाल और मध्यप्रदेश के दूसरे इलाकों में बहुत सारे लोग ऐसे मिल जाएंगे, जिनके सामने अनूप मिश्रा अटलजी के दिल्ली के घर का नंबर लगाते हैं और उनके सचिव जिंटा से लंबी बात करके कहते हैं कि मैंने मामाजी से बात कर ली है। जो लोग दुनियादारी की असलियत नहीं जानते हैं, वे इससे जरूर प्रभावित हो जाते हैं, लेकिन जो असलियत से परिचित होते हैं, वे हंसते ही हैं, फिर भी अनूप मिश्रा की दुकानदारी चलती रहती है। वैसे आपकी जानकारी के लिए यह भी बता दें कि जनता को दवाइयों की आपूर्ति के लिए केंद्र सरकार से जो कोष मध्यप्रदेश के स्वास्थ्य विभाग को मिला था, उसके हिसाब-किताब में बडी गडबडी है।
यह गडबडी किसने की, यह बताने की जरूरत नहीं है। ये मध्यप्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री अनूप मिश्रा ही हैं, जो अब शिक्षा का धंधा करके धन कुबेर बनना चाहते हैं। अनूप मिश्रा ने जो किया और उनके परिवार के लोगों ने जो लाश गिराई, उम्मीद है कि अटलजी के जीवन के इतिहास में यह बात हाशिए पर भी दर्ज नहीं की जाएगी। हम सबको पता है कि अटल बिहारी वाजपेयी जैसे आदर्श राजनेता का जीवन एक खुली किताब के समान है। उनके दामन पर दाग लगाने की हिम्मत कौन कर सकता है। अनूप मिश्रा के कुकर्मों के कारण भी अटलजी का नाम खराब नहीं हो सकता। शिवराज सिंह चौहान को भी अनूप मिश्रा का संरक्षण करने से बचना चाहिए। वैसे वे यह गलत काम करेंगे नहीं, पर फिर भी सावधानी जरूरी है, क्योंकि उन पर अटलजी का नाम लेकर दबाव डाला जा सकता है। अटल बिहारी वाजपेयी के नाम का इस्तेमाल कर-करके बहुत-से लोगों ने दुकानदारी चलाई है, लेकिन उनके भांजे अनूप मिश्रा ने तो बाकायदा डाका ही डाल दिया है।