गर्व से कहो - हम बेवकूफ हैं!
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आलोक तोमर
जातियों की जनगणना पर सवाल उठाने वाले बहुत सारे हैं। कुछ लोगों का पेशा ही सवाल उठाना होता है। जैसे कुछ दूसरे लोगों का पेशा सवालों को पहेली बना देने का होता है और उनमें से भी कुछ लोगों का पेशा पहेलियो को कानूनी फैसला बना देने का होता है।
ठीक है कि जातियों की आखिरी जनगणना ब्रिटिश राज में हुई थी और अब हम आजाद देश हैं इसलिए हमे गुलामी के दिनों के विवादों का पालन नहीं करना चाहिए। इससे क्या फर्क पड़ता है कि हम डेढ़ सौ साल पुराने कानून वे ही चला रहे हैं जो गुलामी के दिनों में बने थे। चमचों और लालाओं के सदन राज्यसभा को हाउस ऑफ लार्ड्स की तर्ज पर उच्च सदन कहते है।
जब बहस चल ही पड़ी है और हर चलती हुई बहस में घुस जाने की हम भारतीयों को पुरानी आदत है तो मेरी भी एक सलाह सुन लीजिए। जब आप ठाकुर, ब्राह्मण, कुर्मी, वैश्य और कायस्थ वगैरह गिन रहे हैं तो देश के एक बहुसंख्यक तबके को क्यों भूल जाते हैं? जनगणना के फॉर्म में एक खाता उन लोगों का भी होना चाहिए जो बेवकूफ है। भारत एक कृषि प्रधान देश तो है ही, उससे भी ज्यादा बेवकूफी प्रधान देश हैं। बेवकूफ बनने में हमे मजा आता है।
हमे इंतजार रहता है और हम पलक पांवड़े बिछा कर खड़े रहते हैं कि कोई आए और हमे बेवकूफ बनाए। पुरानी बेवकुफियां बोर करती है। गरीबी हटाने की बेवकूफी से हम बोर हो चुके हैं। हमे इस बात से अब कोई फर्क नहीं पड़ता कि भारत विश्व की एक बड़ी आर्थिक ताकत बन चुका है। एक लौकी या एक तोरई खरीदते वक्त हमारा यह भ्रम दूर हो जाता है। मनमोहन सिंह के अर्थशास्त्र पर लौकी भारी पड़ती है।
उधर अब बेवकूफ बनाने की नई सीरीज शुरू हो चुकी है। देश उड़ रहा है। भले ही एयर इंडिया की कोई उड़ान गिर पड़ती है, किसी का टायर पंचर हो जाता है, किसी के ब्रेक नहीं लगते, किसी का ऑटो पायलट जाम हो जाता है लेकिन हमारे देश के महारथी जब उड़ते हैं तो राजमाता सोनिया गांधी की कृपा से कुछ नहीं होता। आज कल उड़ने के निशाने पर पाकिस्तान है।
पहले पाकिस्तान को एक नहीं, ग्यारह डोजियर दिए गए। पाकिस्तान ने कहा कि सबूतों में दम नहीं है। पहले विदेश मंत्री एस एम कृष्णा पाकिस्तान के लिए उड़े और वहां काफी आनंद कर के आए। फिर विदेश सचिव निरुपमा राव गई और अच्छे अच्छे फोटो खिंचवा कर आई। फिर गृह मंत्री चिदंबरम गए और पाकिस्तान से पूछा कि भाई हाफिज सईद देते हो या नहीं।
पाकिस्तान जैसे देश ने भारत के गृह मंत्री को याद दिलाया कि पाकिस्तान में अभिव्यक्ति की आजादी हैं और हाफिज सईद जो बोल रहा है उसे हम नहीं रोक सकते। हेडली ने अब तो भारतीय एजेंसियों को भी बता दिया है कि लश्कर ए तैयबा और पाकिस्तान की आईएसआई एक साथ मिल कर काम कर रही है और जब चिदंबरम ने पाकिस्तान के रहमान मलिक और महमूद कुरैशी को जब यह बताया तो उन्होंने कंधे उचका दिए। चिदंबरम ने भारत आ कर कहा कि बातचीत में काफी फल निकले हैं।  अब यह फल नारियल के हैं या आड़ू के, यह चिदंबरम जाने।
चिदंबरम ने यह नहीं बताया कि जिस वक्त वे पाकिस्तान में थे और तालिबानों पर अपनी सरकारी चिंता जाहिर कर रहे थे तो उस समय पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष अशफाक कयानी और आईएसआई के मुखिया शुजा पाशा अफगानिस्तान में तालिबानी कमांडरों से मिलने गए थे। यह भी पाकिस्तानी अखबारों से पता चला कि पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बाद अब भारत भी तालिबान के निशाने पर है। हम प्रसन्न हुए क्योंकि हम बेवकूफ हैं।
उधर हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह दस जनपथ का आशीर्वाद ले कर टोरंटो के लिए उड़े और वहां बराक ओबामा से काफी देर तक बात की। ओबामा बहुत देर तक मनमोहन सिंह को आतंकवाद का मतलब समझाते रहे। अमेरिका ने आतंकवाद को जैसे पेटेंट करवा लिया है। दुनिया भर में आतंकवाद से निपटने का ठेका बगैर किसी टेंडर के अमेरिका ने ले लिया है। मनमोहन सिंह ने मुंबई में कत्लेआम की साजिश के एक बड़े सरगना डेविड कोलमैन हेडली के बयान का हवाला दिया और कहा कि लश्कर ए तैयबा और आईएसआई के इशारे पर और हाफिज सईद की मदद से हेडली कई बार भारत गया और उसी ने हमले के ठिकाने तय किए थे।
ओबामा सुनते रहे और जिस अमेरिका ने इराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को फांसी पर लटका दिया था, जिसने अफगानिस्तान में लादेन के नाम पर तबाही मचा कर कब्जा कर लिया था, जिसने वियतनाम और गाजापट्टी में बम गिरा कर लाखो लोग मार डाले थे, उस अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा मनमोहन सिंह के सामने मुस्कुराते रहे और मनमोहन सिंह शुद्व बेवकूफ बन कर वापस लौट आए।
वैसे भी जब जनगणना की बात चली ही है तो उत्तर प्रदेश में मायावती की मूर्तियो की गणना क्यों नहीं होनी चाहिए। इन मूर्तियाें को जीता जागता माना गया है और इसीलिए उनकी रक्षा के लिए एक विशेष कमांडो बल भी बनाया गया है। इन मूर्तियो की गिनती नहीं करना भी सरकारी बेवकूफी होगी क्योकि जब तक मायावती सत्ता में रहेगी, इन मूर्तियों की संख्या बढ़ती रहेगी और ज्यादा नहीं तो भारत में जितने पारसी हैं उससे ज्यादा मूर्तियां मायावती की पाई जाएगी। वैसे महामूर्ति मायावती भगवान की दया से अभी भी जीवित हैं और अकेली हजार मूर्तियो के बराबर है।
जैसा कि पहले कहा कि भारत में बेवकूफ गणना भी होनी चाहिए। इससे जाति, धर्म और बाकी सब भेद मिट जाएंगे। अगले, पिछड़े, ऊंचे, नीचे, पढ़े लिखे और निरक्षर सब इस वर्ग मे आ जाएंगे। इन्हें आरक्षण की भी जरूरत नहीं हैं। ये तो बेवकूफ बन कर ही प्रसन्न है। हर उस मनुष्य को यह अपना राजा चुन लेते हैं जो इन्हें सबसे अच्छी तरह बेवकूफ बनाता है। हमारा देश मंडल के नाम पर बेवकूफ बनने को तैयार हैं, पोखरण के नाम पर बेवकूफ बनने को तैयार हैं, महंगाई के बावजूद सकल घरेलू उत्पादन के फर्जी आंकड़े सुन कर बेवकूफ बनने को तैयार हैं। बेवकूफी हमारा राष्ट्रधर्म हैं और हमारे नेता इसे बहुत निष्ठा से निभा रहे हैं। गर्व से कहो, हम बेवकूफ है।