ब्रिटिश गुलामी का एक खेल समारोह
Images

आलोक तोमर


कॉमनवेल्थ
खेलों का बहुत शोर मचाया जा रहा है और अब तो इस खेल का मुख्य प्रतीक यानी ब्रिटेन की महारानी का राजदंड भी भारत पहुंच चुका है जिसे आखिरी खबर मिलने तक दिल्ली की मेट्रो में सैर करवाने के बाद भारत दर्शन के लिए भेजा जाएगा। इस राजदंड की भारत यात्रा पर सुरक्षा तथा अन्य खर्चो पर कम से कम पचास करोड़ रुपए का खर्चा आने वाला है।
भारत सरकार और खास तौर पर दिल्ली में शीला दीक्षित की सरकार बार बार यह सफाई दे रही है कि उनकी तैयारियां पूरी हैं और खेल शान से होंगे। इन तैयारियों के चक्कर में बने गङ्ढो और गिरते पुलों से सत्तर से ज्यादा लोग सिर्फ दिल्ली में शहीद हो चुके है। दिल्ली की तो कॉलोनियों तक को सजाया जा रहा है कि पता नहीं कब कौन विदेशी, टहलता हुआ किसी बस्ती में जा निकले तो उसे दिल्ली का शानदार दर्शन हो। नए फ्लाई ओवर, नई मेट्रो लाइनें, नई सड़के बन रही है इसलिए कॉमनवेल्थ का स्वागत किया जाना चाहिए लेकिन यह समझना जरूरी है कि राष्ट्रकुल यानी कॉमनवेल्थ खेल हमारे लिए शर्मनाक क्यो हैं?
आप जानते हैं कि कॉमनवेल्थ उन देशों का समूह हैं जहां अंग्रेज कभी राज करते थे और यह राज उन्होंने आम तौर पर ईस्ट इंडिया कंपनी और दूसरे व्यापारिक संगठनों के जरिए कायम किया था। कहा जाता है कि एक जमाने में अंग्रेजों के राज में सूरज नहीं डूबता था। अब ज्यादातर देशों से अंग्रेजों का राज चला गया है मगर कॉमनवेल्थ के नाम पर ये देश जिसमें हमारा भारत भी शामिल हैं, ब्रिटिश महारानी की पूजा करते हैं और यह अपमानजनक खेल आयोजन करते हैं जो अग्रेंजो के भूतपूर्व गुलामों का खेल समारोह है।
इतिहास देखे तो सबसे पहले कॉमनवेल्थ खेल 1930 में ब्रिटिश एम्पायर गेम्स के नाम से हुए थे। 1954 में इस खेल मेले का नाम ब्रिटिश एम्पायर और कॉमनवेल्थ गेम्स रखा गया। 1970 तक यह ब्रिटिश कॉमनवेल्थ गेम बना और 1978 में इसे ब्रिटिश नाम के प्रेत से मुक्ति मिली। शुरू में छह टीमें खेलती थी- आस्टे्रेलिया, कनाडा, इंग्लैंड, न्यूजीलैंड, स्कॉटलैंड और वेल्स। फिलहाल कॉमनवेल्थ देशों के तौर पर 54 देशों को गिना जाता है। मगर इन खेलों में 71 टीमें हिस्सा लेती है। खुद इंग्लैंड से इंग्लेैंड, स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी ऑयरलैड की टीमें आती है जबकि ओलंपिक में सिर्फ इंग्लैंड की टीम जाती है।
इसके अलावा अब भी अपने आपको ब्रिटिश उपनिवेश मानने वाले गोयमसी, जर्सी, आइल ऑफ मैन और कई ब्रिटिश उपनिवेशों की टीमें भी आती हैं। आस्ट्रेलिया के नार्कुक द्वीप की अलग टीम है। न्यू द्वीप की अलग टीम है। दो प्रांतों की अलग टीमें हैं और वे न्यूजीलैंड की तरफ से आती है। 1851 में एक बदनाम पादरी एस्ले कुपर ने टाइम्स अखबार में ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन वाले देशों के खेलों का समारोह करने की सलाह दी थी। 1911 में लंदन में किंग जॉर्ज पंचम के सिंहासन पर बैठने के अवसर पर पहला समारोह आयोजित किया गया जिसका नाम फेस्टिवल ऑफ एम्पायर था। इसमें ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, दक्षिण अफ्रिका और खुद इंग्लैंड की टीम ने हिस्सा लिया था। 1928 में हैमिल्टन कनाडा में ब्रिटिश एम्पायर गेम का आयोजन किया गया और 1930 में यह खेल समारोह ब्रिटिश एम्पायर और कॉमनवेल्थ गेम के नाम से हुआ और इसमे महिलाओ को सिर्फ तैराकी प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने की अनुमति थी। 1934 में महिलाएं एथलेटिक खेलों में भी हिस्सा लेने लगी। 1931 में ब्रिटिश साम्राज्य ने कनाडा को कॉमनवेल्थ खेलों का ध्वज दिया। यह गुलामी का ध्वज अब भारत मे भी फहराया जाएगा, हालांकि आधिकारिक रूप से इस ध्वज को 1950 के खेलों में खत्म कर दिया गया था।
1930 से 1950 तक खेल समारोह का उद्धाटन ब्रिटिश ध्वज ले कर ही होता था। 1958 से परंपरा बदली गई मगर ब्रिटिश राजमहल बकिंघम पैलेस से एक शानदार लाठी यानी राजदंड इन खेलाें का प्रतीक बना दिया गया। यह राजदंड उद्धाटन समारोह में अतिथि देश का एक बड़ा खिलाड़ी ले कर चलता है। सारे देश वर्णमाला के अनुसार सूची में चलते हैं और अतिथि देश सबसे आखिर में चलता है। भाग लेने वाले देशों के झंडे स्टेडियम में अलग अलग लगे झंडो पर फहराए जाते हैं और इसमें ब्रिटिश सेना को भी सलामी बजाई जाती हैं।
इस साल भारत आयोजन कर रहा है और 2014 में स्कॉटलेैंड में आयोजन होगा। 31 खेलों को मान्यता दी गई है जिनमें से जीवन बचाओं नाम का एक खेल भी हैं जो कभी नहीं खेला गया। बॉलीवाल को मान्यता है मगर वह भी कॉमनवेल्थ में कभी नहीं खेला गया। इसकी वजह या तो खेल आयोजक बना सकते हैं या अब भी अपने आपको दुनिया का मालिक मानने का बहम पालने वाले वे देश जो इन खेलों में लगातार हिस्सा लेते रहे हैं।
भारत ने 1934 से 1938 तक इन खेलों में हिस्सा लिया। फिर सोलह साल तक भारत रहा और आजाद भारत ने 1954  और 1958 के खेलों में हिस्सा लिया और फिर आठ साल बाहर रहा और इसके बाद फिर 1966 से 1986 तक हिस्सा लिया और आठ साल बाहर रहा। मगर 1990 से अब तक भारत अपनी गुलामी की यह रस्म निभाता आ रहा है।
सवाल यह है कि हमने अंग्रेजों की लगभग ढाई सौ साल की गुलामी से मुक्ति पाने के लिए बहुत लंबी लड़ाई लड़ी और इस लड़ाई में सरदार भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद से ले कर महात्मा गांधी तक की बहुत बड़ी भूमिका रही लेकिन अब हमे यह गुलामी का खेल बहुत भाने लगा है और इसके चक्कर में हमने सिर्फ तैयारी में करोड़ों रुपए खर्च कर दिए हैं- बगैर यह सोचे कि आखिरकार हम एक बार फिर गुलामी की पुष्टि ही कर रहे हैं। मेरी विनम्र राय में हमे इस कलंक के समारोह का बहिष्कार करना चाहिए और जनमत संग्रह कर के भारत सरकार पर दबाव बनाना चाहिए कि आखिर हम बार बार अपने आपको गुलाम होने की याद क्यो दिलाना चाहते हैं?