आलोक तोमर
एक देश अपना संविधान बनाता है। कोई संविधान किसी देश को नहीं बनाता। यह याद रखते हुए सोचिए कि आपने जिन्हें अपना नगर निगम/पालिका पार्षद, विधायक, जनपद अध्यक्ष या सांसद चुना हैं, और अगर आपको लगता है कि वोट मांगते समय राग जयजयवंती गाने वाले अब न काम कर रहे हैं, न आपकी सुन रहे हैं, न आपके इलाके का विकास कर रहे हैं और देखते ही देखते उनके घर की मंजिले बढ़ रही है, गाड़ियाें की संख्या और रईसी बढ़ रही है तो क्या आपका मन नहीं करता कि आपने किसी और को वोट दिया होता तो ज्यादा लायक साबित होता।
कई बार मन में यह भी आता होगा कि अपने ही चुने हुए जनप्रतिनिधि नेता को बदल डालें। लेकिन अभी तक हमारे संविधान में राइट टू रिकॉल यानी अपने ही निर्वाचित प्रतिनिधि को उसके निकम्मेपन के बदले पद से हटा दिया जाए और नए प्रतिनिधि का चुनाव किया जाए। जरूरी नहीं कि नया प्रतिनिधि भी आपकी सारी उम्मीदों पर खरा उतरे मगर जो भी चुन कर आएगा उसे याद रहेगा कि जिन्हाेंने चुना है उनके पास कुर्सी छीनने का अधिकार भी है। आखिर हमारे सांसद औरतों की तस्करी से ले कर पैसा ले कर सवाल पूछने के धंधे में शामिल पाए गए हैं, पैसा ले कर संसद में सरकार के पक्ष या विपक्ष में वोट डालने के लिए अदालतों से दोषी करार दिए गए हैं मगर हम एक सामूहिक शर्मिंदगी के अलावा कुछ नहीं कर पाते। इसके अलावा यह तथ्य सदैव ध्यान में रखना चाहिए कि भारत में ज्यादातर सांसद और विधायक पूरे बहुमत से जीत कर नहीं आते। एक तो हम और आप वोट डालने ही नहीं जाते और जो पचास साठ फीसदी वोट पड़ते हैं उनमें से जिसे पैतीस फीसदी मिल गए वह सदन तक पहुंच जाता है। दूसरे शब्दों में ये नेता जी अपने पैसठ प्रतिशत मतदाताओं के प्रतिनिधि नहीं होते।
कॉमनवेल्थ संसदीय एसोसिएशन में काफी लंबे समय तक इस मुद्दे पर विचार किया और कम से कम सांसदों के मामलों में मतदाताओं द्वारा उनकी वापसी के लिए जनमत संग्रह की राय पर पहुंचे। भारत में राष्ट्रपति प्रणाली नहीं हैं इसलिए हमारे सांसद सबसे ज्यादा जवाबदेह हैं। वे ही सरकार बनाते हैं और वे ही सरकार चलाते हैं। हमारा संविधान लागू हुए छह दशक से ज्यादा होने जा रहे हैं लेकिन संविधान की समीक्षा के लिए बनाए गए राष्ट्रीय आयोग ने इस विषय में कोई निष्कर्ष निकालने का साहस नहीं किया।
बेचारा मतदाता निरीह है। पार्टियां टिकट देते समय उससे पूछ कर उम्मीदवार नहीं चुनती। इसके बाद जब चुनाव होते हैं तो आम तौर पर जीते हुए उम्मीदवार के खिलाफ जो उम्मीदवार हारते हैं उन सबके वोट मिला लिए जाएं तो वे विजयी उम्मीदवार से ज्यादा बैठते हेैं। जाहिर है कि मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग जो निर्णायक नहीं होता, नेता जी के खिलाफ वोट डाल चुका होता है। इसीलिए नेता जी को नाकामयाब रहने पर वापस घर में बिठाने का इंतजाम होना चाहिए।
स्विट्जरलैंड से यह सिलसिला शुरू हुआ था और अमेरिका में लागू किया गया। बीसवीं सदी में अमेरिका का यह एक सबसे बड़ा लोकतांत्रिक का दिन था मगर वहां यह सफल इसलिए नहीं हो पाया कि वहां संघीय लोकतंत्र हैं और सांसद जनता के प्रति कम और राष्ट्रपति के प्रति ज्यादा जवाबदेह होते हैं। स्विट्जरलैंड में तो उन्नीसवीं सदी में ही यह व्यवस्था शुरू की गई थी और 1903 में अमेरिका के कई प्रदेशों में सांसदों को वापस बुलाने का प्रावधान लागू किया गया। अमेरिका के 18 प्रांताें में वापसी के जनादेश की व्यवस्था है और 1921 मे पहली बार उत्तरी डकोटा के गर्वनर लिन थ्रेजीयर को जनादेश के जरिए पद से हटाया गया था। 2003 में कैलिफोर्निया के गर्वनर ग्रे डेविस को सरकारी बजट में धांधली करने के इल्जाम में जनता ने हटा दिया था।
अमेरिका में संविधान कहता हैं कि आप अगर किसी भी जनप्रतिनिधि को वापस आम आदमी बनाना चाहते हैं तो उसी मतपत्र पर उसके विकल्प का नाम भी लिखिए। दूसरे शब्दो में यह पुराने प्रतिनिधि को चुनने का आम चुनाव होता है। 1988 में ऐरिजोना के गर्वनर को जन याचिका के जरिए हटाने की पूरी तैयारी हो चुकी थी तभी महाअभियोग के जरिए उन्हे हटा दिया गया। कनाडा में इस व्यवस्था का अच्छी तरह इस्तेमाल होता रहा है और मतदाताओं को अधिकार है कि निर्वाचित जनप्रतिनिधि को एक याचिका के जरिए हटाने की कोशिश करे। मतदाताओं की एक न्यूनतम संख्या होती है और इसके जरिए प्रधानमंत्री तक को हटाया जा सकता है। जनवरी 2003 में तत्कालीन प्रधानमंत्री को हटाने की 22 याचिकाए दी गई थी मगर किसी में न्यूनतम मतदाताओं की संख्या पूरी नहीं थी। मेनेजुएला में 1999 में राष्ट्रपति सहित किसी भी जनप्रतिनिधि को हटाने की व्यवस्था है और 20 प्रतिशत मतदाताओं की याचिका पर इस मामले पर जनादेश दिया जाता है। स्विट्जरलैंड में भी व्यवस्था है और सिर्फ दस प्रतिशत मतदाता चाहिए मगर आज तक हो नहीं पाया है।
भारत का लोकतंत्र सबसे जीवित और सक्रिय लोकतंत्र है। यह दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र भी है। कायदे से यहां अपराधी, असामाजिक और अवांछित तत्वो को राजकीय पदों से हटाने की व्यवस्था सबसे पहले लागू की जानी चाहिए थी। मगर हमारे यहां तो एक बार चुन लेने के बाद मतदाता के हाथ पांच साल के लिए कट जाते हैं और पांच साल बाद भी जातियों से ले कर तमाम आधारों पर चुनाव का फिर फैसला होता है।
लोकसभा के पिछले अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने भी संसद के भरे सदन में सांसदों को मतदाताओं द्वारा वापस करने के अधिकार पर अपनी मोहर लगाई थी मगर आम तौर पर लोकतंत्र विरोधी माने जाने वाले वामपंथियों ने सोमनाथ चटर्जी को पार्टी से ही बाहर कर दिया। चुने हुए नेता जनसेवक होतो हैं। जनता को अपने सेवक बदलने का वैसे ही अधिकार होना चाहिए जैसे मालिकों को नौकर बदलने का। मगर नाम के नौकर ये लोग हमारे लोकतंत्र के राजा हैं और तिरंगा झंडा और लाल बत्तियां इनकी रक्षा करते हैं।