आलोक तोमर
नई दिल्ली, 1 जुलाई- अमेरिका के दोगलेपन का जवाब नहीं। अमेरिका की एक फैडरल अदालत ने सिर्फ ई मेल पर अमेरिका में रहने वाले सिखों की एक याचिका मंजूर करते हुए केंद्रीय सड़क परिहवन मंत्री कमलनाथ को 1984 के सिख विरोधी दंगों में मानवाधिकारों का उल्लंघन करने और हत्यारों का साथ देने के मामले में हाजिर होने का समन भेजा है।
यह वही अमेरिका है जिसका कहना है कि 1984 में ही भोपाल में यूनियन कार्बाइड हादसे के लिए जिम्मेदार कंपनी के चेयरमैन वारेन एंडरसन को भारत नहीं भेजा जा सकता क्योंकि इसके लिए पर्याप्त कानूनी आधार नहीं है। अमेरिका की एक अदालत कह चुकी है कि भोपाल के मामले में अमेरिका की अदालत में मुकदमा नहीं कर सकता क्योंकि भोपाल उसके न्याय क्षेत्र से बाहर है।
अब सवाल यह है कि अगर भोपाल अमेरिका के न्याय क्षेत्र में नहीं हैं तो दिल्ली क्यों हैं और कैसे हैं? क्या कमलनाथ को अमेरिका की अदालत एंडरसन को बचाने के लिए हड़का रही है क्योंकि कमलनाथ भोपाल के मामले पर बने मंत्रिमंडलीय समूह के एक महत्वपूर्ण सदस्य हैं और देश के भूतपूर्व पर्यावरण मंत्री के तौर पर भोपाल के कार्बाइड कारखाने की कमियों के बारे में उन्हें दूसरों से कुछ ज्यादा ही पता है।
अमेरिका की अदालत ने कमलनाथ के खिलाफ मुआवजे और सजा का मामला एक विशेष कानून में दर्ज किया है जिसमें अमेरिका ने अपने आपको अधिकार दे रखा है कि दुनिया के किसी भी देश के नागरिक को वह अपने सामने पेश करवा सकती है। कमलनाथ परेशान नही हैं मगर उन्हें हैरत जरूर है कि 26 साल बाद अमेरिका की एक अदालत ने एक ऐसे मामले में उनके खिलाफ रपट दर्ज करना उचित समझा जिसमें भारत की कोई अदालत उन्हें दोषी नहीं मानती।
कमलनाथ को मार्च में पहले एक नोटिस दिया गया था जिसमें अमेरिकी अदालत ने 21 दिन के भीतर उनसे उन पर लगे हत्या और मानवाधिकारों के उल्लंघन के आरोपों का जवाब मांगा था। कमलनाथ इसे कागज का टुकड़ा मानते हैं और कहते हैं कि अमेरिका भारत में कानून चलाने वाला देश कब से बन गया? उनका सवाल यह भी है कि यह अदालत कौन सी है और इसके अधिकार क्षेत्र क्या क्या है?
दो सिख मित्रों ने न्यूयॉर्क की एक संस्था की ओर से यह मामला शुरू किया है। अपील में कहा गया है कि शिकायत करने वाले जसबीर सिंह के परिवार के 24 लोग इस दंगे में मारे गए थे और दूसरे अपीलकर्ता महेंद्र सिंह के पिता की मौत हो गई थी। इनका वकील भी भारतीय मूल का एक सिख गुरपतवंत सिंह पनून हैं जिसने अपने जन्मदाता देश के बारे में कहा है कि भारत में मानवाधिकारों के उल्लंघन पर सजा देने के कोई उचित प्रावधान ही नहीं है। पनून ने कहा है कि अभी तक हम भारत सरकार द्वारा बिठाए गए विभिन्न आयोगों के फैसले का इंतजार कर रहे थे लेकिन वहां से न्याय मिल नहीं रहा।
उधर दिल्ली उच्च न्यायालय के वकील हरविंदर सिंह फुल्का ने कहा है कि दिल्ली सिख गुरुद्वारा कमेटी जानबूझ कर गुरुद्वारा रकाबगंज पर हुए हमले के मामले में कमलनाथ को बचाने की कोशिश कर रही है। फुल्का ने 2 नवंबर 1984 के इंडियन एक्सप्रेस में संजय सूरी की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा है कि संजय सूरी ने कमलनाथ के खिलाफ रंगनाथ मिश्रा आयोग में शपथ पत्र भी दिया था। फुल्का ने कैप्टन अमरिंदर सिंह को भी इस मामले में पत्र लिख कर साथ देने की बात कही है।
कमलनाथ दोषी है या नहीं, यह भारत की अदालते तय करेंगी और अमेरिका ने जो धृष्टता कर के वहां की अदालत का समन कमलनाथ के नाम भिजवाया है उस पर तो भारत के विदेश मंत्रालय को अमेरिका से सवाल पूछना चाहिए मगर भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जब बराक ओबामा से मुलाकात के दौरान एंडरसन का नाम तक नहीं लेते तो उनकी सरकार से अपने ही एक मंत्री को बचाने की क्या उम्मीद की जाए? वैसे कमलनाथ अपने आप में काफी हैं और उन्हें मनमोहन सिंह जैसे कमजोर वकील नहीं चाहिए।