आलोक तोमर
हमारे देश की सरकार का कहना है कि भारत की कुल आबादी में सिर्फ 26 फीसदी लोग गरीबी की रेखा के नीचे रहते हैं। सबसे पहले तो यह कि इस 26 फीसदी का मतलब भी 40 करोड़ लोग होते हैं और इसके बाद यह कि गरीबी की रेखा जिन बाबुआें ने कीमती कलमों से खींची है वे अफसर बनने के बाद शायद एक घंटे भी भूखे नहीं रहे होंगे।
भारत सरकार के अफसराें के पास शानदार घर है, एयर कंडीशंड ऑफिस हैं, एयर कंडीशंड कारे हैं और उनके बच्चे भी इतनी फीस दे कर पढ़ते हैं जितनी अगर दस परिवारो पर खर्च कर दी जाए तो वे गरीबी की रेखा से बाहर निकल आएं। इसके बाद यह कि भारत सरकार ने गरीबी की जो रेखा बनाई है वह फर्जी है और भारत के प्रशासन की तरक्की और सफलता दिखाने के लिए उसे आंकड़ों के आधार पर रचा गया है।
परिभाषा के अनुसार अगर आप गांव में रहते हैं और 369 रुपए महीना यानी दस रुपए नब्बे पैसे रोज कमाते हैं और शहरी इलाकों में रह कर 560 रुपए महीने के कमा लेते हैं तो आपको गरीब नहीं गिना जाएगा। महान अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह से विनम्र सवाल है कि भारत के किस शहर में 560 रुपए में रहने के लिए गरीब से गरीब बस्ती में कमरा मिल जाएगा और परिवार का खाना पीना भी उसी में हो जाएगा? गांवों में भी 369 रुपए महीने में कौन सा परिवार गुजारा करने में समर्थ होगा। अभी हम कैलोरी और दूसरे खर्चों की बात नहीं कर रहे हैं। लगभग डेढ़ करोड़ की आबादी वाले हमारे देश में गरीबी के नाम रप यह भद्दा मजाक पता नहीं कब से जारी है और पता नहीं कब तक जारी रहने वाला है।
पहले शहरी और आधिकारिक रूप से मान्यता प्राप्त गरीबों की ओर आइए जहां 19 रुपए प्रतिदिन पाने वाले को गरीब नहीं माना जाता। एक दिन के 19 रुपए में आप क्या क्या कर सकते हैं। महंगाई का जो आलम है उसमें आप 19 रुपए की सब्जी नहीं खरीद सकते, एक लीटर मिट्टी का तेल नहीं खरीद सकते, आटा, दाल चावल, नमक और मसाले छोड़ दीजिए, दूध और दवा भी नहीं खरीद सकते क्योंकि अब तो गरीबों के कल्याण के लिए बनाई गई अमूल डेरी में भी दूध का दाम 24 रुपए प्रतिलीटर कर दिया गया है।
19 रुपए में आपको 2400 कैलोरी नहीं मिल सकती। यूनीसेफ से आंकड़ा उधार ले कर भारत में भी कहा जाता है कि अगर आप एक दिन में 2400 कैलोरी खाने में सक्षम है तो आपको गरीब नहीं कहा जा सकता। उधर हमारे कर्ता वर्ग में से बहुत सारे ऐसे हैं जो ढाई तीन सौ रुपए की रोज तो सिगरेट पी जाते हैं। जब कैलोरी यानी भोजन की बात होती है तो उसे गरीबी की रेखा केैसे कहा जा सकता है? उसे तो भूखमरी की रेखा कहा जाना चाहिए। ये जो 26 प्रतिशत लोग भारत सरकार के रजिस्टरों में गिनाए गए हैं वे सरकारी आंकड़ों के हिसाब से भी सिर्फ एक वक्त खाना खा सकते हैं। फिर भी मनमोहन सिंह और उनकी सरकार मुदित है कि सकल घरेलू उत्पादन बढ़ रहा है और अपने नागरिक जो राजकीय परिभाषा के हिसाब से संसाधन मात्र हैं, चैन से है। दूसरे राजकीय संसाधनो जैसे जनरेटरों एयरकंडीशनरों की मरम्मत में महीने में इससे कई गुना ज्यादा खर्च हो जाता है। संसाधन वे भी हैं मगर मानव संसाधन नहीं हैं और अपने देश में सबसे बेकार मानव संसाधनो को ही माना जाता हैं।
आज की बाजार दरें देखे तो सबसे सस्ता चावल 22 रुपए किलो आ रहा है। सबसे सस्ता पिसा हुआ आटा 18 रुपए किलो है और आलू या पत्ता गोभी जैसी सब्जियां भी 12 से 15 रुपए किलो के हिसाब से है। 700 रुपए महीने का हिसाब तो ये हो गया। इसके बाद खाना आप कच्चा तो खा नहीं सकते इसलिए अगर सड़क से भी लकड़ी बिनी जाए और काम चलाने के लिए कोयला या मिट्टी का तेल लाया जाए तो कम से कम पचास रुपए महीने का खर्चा यह हो गया।
अगर पहनने के और रात को सोने के कपड़े और बिस्तर की बात करें तो पचास रुपए महीने का कम से कम खर्चा यह है। यह खर्चा इस आधार पर माना जा रहा है कि यह जो सरकारी गरीब वह सड़क पर सोता है और एक चादर और कंबल में गुजारा कर लेता है। इस हालत में मच्छर भी काटेंगे और सड़क से चलने वाली गाड़ियों का धुआ भी लगेगा इसलिए दवाईयों की भी जरूरत पड़ेगी ओैर सरकारी डिस्पेसरियों में भी लंबी लाइन लगाने के बाद ज्यादा नहीं तो बीस रुपए रोज का खर्चा यह मान लीजिए। आप जो अखबार पढ़ रहे हैं उसका औसतन मासिक खर्च 60 रुपए पड़ता है मगर अपने देश में 820 रुपए महीेने सिर्फ जीवित रहने की कीमत है। अब हिसाब लगाइए तो देश में 68 प्रतिशत लोग गरीबी की रेखा के नीचे रह रहे हैं। आप इसे गरीबी कहे या भुखमरी की रेखा कहे। सरकारी परिभाषाओं पर मत जाइए क्योंकि सरकार तो अपने आपको परमाणु ताकत बनाने में लगी है और चंद्रमा पर अंतरिक्ष यान भेजना उसकी प्राथमिकताओं में से एक हैं। चंद्रमा पर अभी तक गरीबी की रेखा का प्रावधान नहीं है।
सिर्फ सरकारी आंकड़ों पर भरोसा करे और इसके अलावा हमारे पास विकल्प नहीं हैं क्योंकि एनजीओ जो आंकड़े लाते हैं वे पहले से उनके कंप्यूटरों में भरे होते है और सिर्फ प्रिंट आउट निकाले जाते हैं, भारत के लगभग 38 प्रतिशत परिवारो के तीन चार किलोमीटर के पास तक पीने के पानी का कोई साधन नहीं है। मगर हमारे पास दुनिया की सबसे बड़ी मिनरल वॉटर कंपनियां हैं। पचास प्रतिशत लोगें के पास छत नहीं हैं मगर हमारे ज्यादातर मंत्री कई एकड़ वाले बंगलों में रहते है। लगभग सत्तर प्रतिशत लोगों के पास शौचालय नहीं हैं मगर शानदार मॉल्स में दुनिया के सारे ब्रांड मिलते हैं। 85 प्रतिशत गांवों में हायर सेकेंडरी स्कूल नहीं हैं मगर विश्व विद्यालय में उच्च शिक्षा पर सरकार अनुदान देती है। 43 प्रतिशत गांवों में पक्की सड़क नहीं हैं मगर दिल्ली सरकार कॉमनवेल्थ खेलों के लिए प्राइवेट बिल्डरो से शानदार मकान बनवा रही है। हमारा भारत महान है और हम और आप उनसे भी ज्यादा महान है क्योंकि एक पाखंडी को हरा कर दूसरे को अपना शासक बना लेते हैं।