आलोक तोमर
वामपंथियों और भारतीय जनता पार्टी के बीच सबसे बड़ी राजनैतिक दुश्मनी हैं मगर महंगाई के खिलाफ दोनों ने बंद एक साथ एक ही दिन और तकनीकी तौर पर अलग अलग आयोजित किया। दोनों के निशाने पर कांग्रेस थी।
कांग्रेस के प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी मजाक उड़ाने से नहीं चूके। उन्होंने कहा कि कुछ दिन बाद वामपंथी संघ की शाखाओं में जाने लगेंगे और भाजपा के कार्यालय में कार्ल माक्र्स का फोटो लग जाएगा। सिंघवी जो नहीं कह सके उसकी पोल लाल कृष्ण आडवाणी ने अपने ब्लॉग पर खोल दी।
आडवाणी अनाड़ी नेता नहीं है। वे किसी भी बयान के लिए वक्त का पूरा ख्याल रखते हैं। उन्होंने रहस्योद्धाटन किया कि पिछले बजट सत्र के दौरान माक्र्सवादी नेता बासुदेव आचार्य और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के गुरुदास दासगुप्ता प्रतिपक्ष की नेता सुषमा स्वराज से उनके संसद के कार्यालय में मिलने पहुंचे थे।
दरअसल दोनों कम्युनिस्ट पार्टिया लगातार प्रचार में लगी थी कि उनका भाजपा से कोई लेना देना नहीं हैं और दोनों दलों के बीच कोई संवाद तक नहीं है। मगर इन्हीं बयानों को वे असर करने के लिए लाल कृष्ण आडवाणी ने इन महारथियों को सच का सामना करवा दिया और बंद की तैयारियों के दौरान ही करवा दिया। आडवाणी ने बहुत चतुरता से कहा कि आचार्य और दासगुप्ता दोनों अलग अलग सुषमा स्वराज से मिलने पहुंचे थे और दोनों ने अलग अलग बाते की थी। यह वाम मोर्चा में फूट डालने के लिए काफी है।
जब सुषमा स्वराज से इस बारे में पूछा तो उन्होने कहा कि दोनो संसद के हमारे वरिष्ठ साथी हैं और वे आए तो मैंने उनका पूरा स्वागत किया और पूरे आदर से उनकी बात सुनी और अपनी बात कही। इस कहानी का एक और मतलब है। अगर भाजपा और वाम मोर्चा बंगाल में किसी भी किस्म का राजनैतिक और गुप्त तालमेल कर लेते हैं तो इससे ममता बनर्जी और कांग्रेस के सपनों को सीधे चोट पहुंचेगी। ममता बनर्जी ने तो कह ही दिया है कि माक्र्सवादी पार्टी और भाजपा दोनों एक ही डाल पर खिले दो सांप्रदायिक फूल है। ममता बनर्जी कविताएं लिखती है और कविता में ही उन्होंने यह आरोप लगा दिया है।
माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने अपनी खाल बचाने के लिए कहा कि भाजपा के साथ उनका कभी कोई तालमेल हो ही नहीं सकता। इसके जवाब में आडवाणी ने विस्फोट कर दिया। गुरुदास दासगुप्ता तो इतने स्तब्ध नजर आए कि उन्होंने कहा कि एक निजी बैठक को लाल कृष्ण आडवाणी जैसे बड़े कद के नेता ने राजनैतिक रूप देने की कोशिश की है और इस पर मैं कुछ नहीं कहना चाहता। मगर जब और खोदा गया तो उन्होने कहा कि मैं राजनैतिक तौर पर किसी को अछूत नहीं मानता और सबसे सहयोग की उम्मीद करता हूं। मगर भाजपा के साथ हमारे मतभेद हमेशा बने रहेगे और हम साथ नहीं आ रहे हैं। उधर आडवाणी को पता था कि यही बयान आएगा इसलिए गुरुदास दासगुप्ता को उन्होने यह कहते हुए लिखा है कि आडवाणी जी आज हम आपके उस दायरे में आ गए हैं जहां पहले कभी नहीं आए थे।
आडवाणी ने अपने ब्लॉग में लिखा है कि 7 मई को खत्म होने अपने बजट के आखिरी सप्ताह में सुषमा जी ने मुझे फोन कर के कहा कि बासुदेव आचार्य ओैर गुरुदास गुप्ता आए हुए हैं और चाह रहे हैं कि आप भी इस वार्तालाप में शामिल हों। आडवाणी ने लिखा है कि मैं जब तक अपने कार्यालय से सुषमा के कार्यालय तक पहुंचा तब तक काफी बात हो चुकी थी और गुरुदास दासगुप्ता ने झेपते हुए कहा कि आडवाणी जी हम पहली बार वर्जित क्षेत्र में आए हैं। आडवाणी ने मैं मुस्कुराया और कहा कि आपने खुद ही इसे वर्जित किया है वरना हमे कोई संकोच नहीं हैं और अगर आप अपने द्वारा लगाया गया प्रतिबंध हटा दे तो आपका हमेशा हमारे यहां स्वागत है।
आडवाणी अपने ब्लॉग में लिखते हैं अपने लंबे संसदीय कैरियर में कांग्रेस और वाम दलों का साथ हाल की घटना हैं वरना पहले तो वे कांग्रेस के सनातन विरोधी थे और अन्य दलों के साथ तालमेल करते थे और उनमें जनसंघ और भाजपा भी होते थे। आडवाणी ने याद दिलाया है कि राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार चुनते वक्त होने वाली बैठकों में वामपंथियों ने भाजपा को कभी बैठक की जगह के तौर पर नहीं चुना। जहां तक भाजपा और वामपंथी के तालमेल का सवाल है उसके बारे में भी या तो संसद की लॉबी में बैठक हुई या किसी तीसरी जगह पर।
आडवाणी ने याद दिलाया है कि 1989 में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार को वाम मोर्चा और हमने एक साथ समर्थन दिया था और संसद के सत्र के दौरान प्रधानमंत्री निवास पर हम सब मिल कर खाना खाते थे और खूब हंसी मजाक करते थे। आडवाणी ने याद दिलाया है कि उसी दौरान बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु का संदेश मेरे पास आया कि आप और अटल जी मेरे साथ बसंत विहार में खाना खाने आ सकते हैं। हमे वी पी सिंह की सरकार का काम काज सुधारना है। आडवाणी के अनुसार यह डिनर दोनों दलों के साझा परिचित के साथ हुआ और मैंने कहा कि भोजन अगर अटल जी या मेरे घर होता या आप हमे खाने के लिए कलकत्ता बुला लेते तो बेहतर होता। ज्योति बसु का जवाब था कि उनकी पार्टी को यह पसंद नहीं आता।
आडवाणी यहीं तक नहीं रूके। उन्होने याद दिलाया कि 1967 में जनसंघ के कोझीकोड यानी कालीकट अधिवेशन में पंडित दीन दयाल उपाध्याय की इस बात के लिए निंदा की गई थी कि बिहार की संयुक्त विधायक दल सरकार में जनसंघ भी है और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी भी। दीन दयाल जी ने जवाब दिया था सामाजिक जीवन में हम अछूत होने को बुरा कहते है लेकिन राजनैतिक मामलों में किसी को लगातार लागू किया जाता है। श्री आडवाणी ने एक तरह से यही जवाब वाम मोर्चा के नेताओं को सुना दिया है।