आलोक तोमर
अनूप मिश्रा भले ही छत पर खड़े हो कर चिल्लाते रहे कि उन्हें फंसाया गया है और ग्वालियर में एक गांव में हुए हत्याकांड में उनके बेटे या भतीजे का कोई हाथ नहीं था मगर उन्हें इस्तीफा देने पर बाकायदा मजबूर किया गया और अब तक अपने मामा अटल बिहारी वाजपेयी के नाम पर राजनीति चला रहे अनूप मिश्रा का साथ देने कोई नहीं आ रहा है। उनके मामा जी भी नहीं।
मगर अनूप मिश्रा अकेले नहीं थे। मध्य प्रदेश की सरकार भारतीय जनता पार्टी की है जिसका मुख्य नारा चाल, चरित्र और चिंतन है मगर शिवराज सिंह चौहान की सरकार आखिरकार वैसे ही चल रही है जैसे सरकारें चलती है। जब तक सिर पर नहीं आ जाए तब तक आंखे बंद करे रहो और जब सबूत निरुत्तर कर दें तो किसी की बलि ले लो। अगर लोकायुक्त का रिकॉर्ड ही देखा जाए तो मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और उनके सात मंत्री झमेलों में फंसे हैं और अभी तक जांच पूरी नहीं हो पाई है। तख्त आपका, ताज आपका, फरमान आपका और अरमान आपका। इसी तर्ज पर चल रही है शिवराज सिंह चौहान की सरकार।
मंत्रियों को घेरना आसान है क्योंकि वे जल्दी नजर में आ जाते हैं मगर भारतीय जनता पार्टी के स्वयं सेवक और गैर स्वयं सेवक बहुत सारे विधायक भी ऐसे हैं जिनके नाम थानों के रजिस्टर में औ घपला करने वालों की सूची में दर्ज है। प्रभात झा ने और उनके पहले के अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर ने अनूप मिश्रा वाले मामले में जो सात्विक तत्परता दिखाई, वह दूसरे मामलों में नजर क्यों नहीं आती? लोग अब कहने लगे हैं कि अनूप, प्रभात और नरेंद्र तीनों ग्वालियर के हैं और अनूप का बलिदान करने में ग्वालियर की राजनीति चली। प्रभात झा कहते हैं कि मंत्रियों के साथ क्या किया जाए, यह मुख्यमंत्री को तय करना है और विधायकों के खिलाफ अगर कोई शिकायत मिलती है तो वे उन्हें छोड़ेेंगे नहीं।
ये बड़े बड़े बयान एक तरफ मगर आज की तारीख में सच यह है कि मध्य प्रदेश की सरकार में कई ऐसे अभियुक्त बैठे हैं जिनके खिलाफ जांच हो और सही तरीके से हो तो उन्हें कोई बचा नहीं सकता। सवाल सिर्फ लोकायुक्त के यहां दर्ज मामलों का नहीं है। सवाल लोकतांत्रिक और सामाजिक सुचिता का है। ऐसे मंत्रियों, भूतपूर्व मंत्रियों और विधायकों की संख्या बढ़ती ही जा रही है जो कानून के उस पार चले गए हैं मगर सत्ता के गलियारों में उन पर सवाल नहीं उठाए जाते। बड़ी मुश्किल में और लगभग अंधा कर देने वाले सबूत मिले तो भाजपा के विधायक कमल पटेल को अपने बेटे द्वारा की गई एक हत्या के सबूत मिटाने के आरोप में जेल में डाल दिया गया। जांच सीबीआई कर रही है और उसे पूरा शक है कि मरने वाले दुर्गेश को गोली से उड़ाया गया था। कमल पटेल गिरफ्तार हुए जरूर लेकिन अचानक उनका रक्तचाप बढ़ गया और जमानत नहीं मिलने पर भी इंदौर अस्पताल में आराम करते रहे।
एक मामला छतरपुर जिले में पार्टी की विधायक आशा रानी सिंह का है जो भूतपूर्व निर्दलीय विधायक और डॉन भैया राजा उर्फ अशोक वीर विक्रम सिंह की पत्नी हैं। भैया राजा फिलहाल जेल में हैं क्योंकि उन्होंने अपनी इक्कीस साल की नातिन को इसलिए गोलियों से उड़ा दिया था क्योंकि वह फैशन जैसे अपारंपरिक क्षेत्र में जाना चाहती थी। यह मामला चल ही रहा था तभी राजा भैया के खिलाफ बलात्कार और आत्महत्या का जिम्मेदार बनने का मामला दर्ज हुआ और भाजपा की माननीय विधायक आशा रानी सिंह पर पति के लिए आपराधिक करवा चौथ मनाने यानी एक अपराधी को शरण देने का आरोप लगा।
लोकायुक्त के पास जो मामले भेजे गए थे उनमे से कुछ विचित्र हैं। एक तुकोजी राव पवार का है जिनके बारे में मशहूर है कि वे शाम ढलने के बाद कुछ पैक लगाने के बाद ही सारे सरकारी फैसले किया करते है। जिन कमल पटेल की बात अभी की गई वे शिवराज सिंह चौहान की सरकार में राजस्व मंत्री थे। लोकायुक्त की फाइल में इंदौर के महाबलि कैलाश विजय वर्गीय का नाम भी हैं जो लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी मंत्री हैं। शिक्षा मंत्री नरोत्तम मिश्रा का नाम भी हैं। मछली पालन मंत्री मोती कश्यप का नाम भी हैं। वन मंत्री विजय शाह का नाम भी हैं और आयकर छापे के बाद पद से हटे और फिर वापस आए अजय विश्नोई का नाम भी है।
खुद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पर जून 2007 में एक बड़े व्यापारिक घराने से डंपर खरीदने और अपनी पत्नी के नाम पर लाभ उठाने का आरोप लगाया गया था। यह मामला इतना अटपटा है कि इस पर हंसी ही आती है। लोकायुक्त के रिजस्टर में जो अभियोग दर्ज हैं उसमें कहा गया है कि मुख्यमंत्री की पत्नी साधना सिंह ने जिस कंपनी से डंपर खरीदे और उसी को वापस बेच दिए। पति का नाम पकड़ में नहीं आए इसलिए शिवराज सिंह के जगह एस आर सिंह लिखा गया और पता रीवा की जेपी कॉलोनी का लिखा गया जहां शिवराज सिंह परिवार का कभी कोई मकान नहीं रहा। कैलाश विजय वर्गीय पर भारत सरकार के महालेखागार ने करोड़ों रुपए के घपलो का इल्जाम लगाया है जिसमें सिंहस्थ पर्व उज्जेैन के आयोजन में बड़ी आध्यात्मिक हेरा फेरी की बात कही गई है। इसके पहले जब विजय वर्गीय इंदौर के मेयर थे तब उन पर अज्ञात और अदृश्य लोगों को पेंशन बांटने का इल्जाम लगा था। मध्य प्रदेश सरकार का एक आयोग इसकी जांच कर रहा है। चौधरी चंद्रभान सिंह पर इल्जाम है कि उन्होंने ठेकेदारों से कमाई कर के अपने चुनाव क्षेत्र छिंदवाड़ा में अच्छी खासी कोठियां बनवा ली है और जमीन खरीदी हैं। शिक्षा मंत्री नरोत्तम मिश्रा और मछली पालन राज्य मंत्री मोती कश्यप पर अपने रिश्तेदारों को ठेके देने का आरोप है।
सिचाई मंत्री के तौर पर भी अनूप मिश्रा ने कम गुल नहीं खिलाए। एक बार तो उन पर सरकारी खर्चे पर अपने परिवार को घुमाने के लिए हैलीकॉप्टर किराए पर लेने का भी आरोप लग चुका है। अजय विश्नोई ने स्वास्थ्य मंत्री की हैसियत से दवाईयों और उपकरणों की खरीद में इतने घोटाले किए कि उनके घर आयकर विभाग को छापा मारना पड़ा। एक और मंत्री नागेंद्र सिंह के भतीजे सतना जिले में एक आदिवासी लड़की से बलात्कार के मुजरिम है। पूरी गिनती की जाए तो एक दर्जन से भी ज्यादा शिवराज सिंह के मंत्री भ्रष्टाचार के मामले झेल रहे हैं। इनमें भूतपूर्व मुख्यमंत्री बाबू लाल गौर भी हैं जिन्होने गैस राहत के लिए आया पैसा भोपाल को सुंदर बनाने में खर्च कर दिए। खुद शिवराज सिंह का नाम भी इनमें हैं और यह उम्मीद करना बेकार है कि शिवराज सिंह चौहान अपने आपको हटाएंगे या प्रभात झा यह साहस कर पाएंगे कि पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी या आडवाणी से मुख्यमंत्री बदलने के लिए कहें। मध्य प्रदेश में अगर एक तरह से अभियुक्तों की सरकार चल रही है तो भले ही वह ऐसा अकेला प्रदेश नहीं हो लेकिन प्रदेश की एक नागरिक और मतदाता के नाते हम और आप सवाल तो कर ही सकते हैं कि कहां गया चाल, चरित्र और चिंतन का नारा।