अरुंधती राय बस्तर में ही क्यों नहीं रहतीं?
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आलोक तोमर
अरुंधती राय को सफलताएं कुछ इतनी जल्दी मिली कि शुरूआती जीवन की कठिनताओं और दिल्ली में दर बदर भटकने के उनके सारे कष्ट लापता हो गए। आखिर 31 साल की उम्र में अंग्रेजी साहित्य का बुकर सम्मान किसी को ऐसे ही नहीं मिल जाता। बंगाली पिता और मेघालय की ईसाई मां की अरुंधती केरल से ले दिल्ली तक पढ़ी लिखी और दिल्ली में ही प्रेम किया और फिल्म निर्माता प्रदीप कृष्ण से शादी कर ली। इसके पहले वे पांच सितारा होटलो में कसरतें सिखाया करती थी और लिखने पढ़ने से ज्यादा उनका वास्ता मकानों के नक्शे बनाने से था।

अरुंधती राय को खबरों और विवादों दोनों में रहना आता है और उन्हें मालूम है कि विवाद ही उनकी असली करेंसी है। लेबनान से इराक और अफगानिस्तान के युद्वों और भारत में पोखरण परीक्षण तक उन्होंने लगभग सबका मजाक उड़ाया और चूंकि वे काफी प्रसिद्व हो चुकी थी इसलिए उनके मजाक को भी काफी गंभीरता से लिया गया। हाल में अरुंधती राय माओवादियों को महान क्रांतिकारी बताने के अभियान पर जुटी हुई है और बड़ी बेसब्री से इंतजार कर रही है कि उन्हें गिरफ्तार कर के जल्दी से जल्दी शहीद बना दिया जाए। बौध्दिक शहीदों की अपनी दुनिया में कुछ ज्यादा ही कीमत होती है।

अरुंधती राय दंतेवाड़ा गई जहां माओवादियों ने भारत के इतिहास के सबसे कायर हमले में सीआरपीएफ के सैकड़ों जवानों को उड़ा दिया था। उनका पासवर्ड था 'नमस्कार गुरुजी'। इंद्रावती नदी के किनारे दंतेवाड़ा को उन्होंने बाकायदा माओवादियों का देश घोषित कर दिया और ऑपरेशन ग्रीन हंट चला रहे चिदंबरम को युद्व का सीईओ घोषित कर दिया।

अरुंधती राय का मानना है कि ऑपरेशन ग्रीन हंट महान साहसी क्रांतिकारियों पर भारत सरकार का एक कायर हमला है जिसमें आखिरकार माओवादी ही जीतेंगे। हो सकता है कि अरुंधती को उम्मीद हो कि माओवादी सरकार बनी तो उन्हें मंत्री बना दिया जाएगा। उन्हें यह नहीं मालूम या वे इस बात पर गौर नहीं करना चाहती कि माओवादी कुछ रचने में नहीं बल्कि हर चीज ध्वस्त करने और हर जीवित आत्मा को बगावत के बहाने निपटाना चाहते हैं। हालांकि छत्तीसगढ़ सरकार ने माओवादियों को समर्थन देने के मामले पर अरुंधती के खिलाफ एक आपराधिक मुकदमा दर्ज कर लिया है लेकिन अब तक उन्हें जेल की हवा नहीं खिलाई गई।

कुछ लोग अकाल के पर्यटक होते हैं, आपदाओं का भ्रमण करते हैं और उनकी कहानियां लिख कर अपने आपको अमर बना लेते है। अरुंधती अकाल की नहीं, आतंक की पर्यटक साबित हुई और उन्होने घोषित कर दिया कि छत्तीसगढ़, झारखंड, उड़ीसा और बंगाल में राज्य सरकारें कॉरपोरेट दुनिया को खुश करने के लिए स्थानीय आदिवासियों और वनवासियों को बेदखल करने में लगी हुई है और उनके हक छीन रही है। यहां तक तो भारत सरकार भी मानती है कि आदिवासियों के बीच प्रगति और विकास की धारा नहीं पहुंची है और खास तौर पर साधनों, संसाधनों और सुविधाओं का उनके बीच वितरण नहीं होना माओवादियों को अवसर दे रहा है कि इन लोगों को अपनी ओर खींचा जा सके और चलता फिरता विस्फोटक बनाया जा सके।

आदिवासियों मे बगावत की पुरानी परंपरा रही है मगर उन्होंने अपनो को कभी नहीं मारा। माओवादियों में कुछ तो भारत की माओवादी पार्टी के कमांडर हैं जो चीन के आंकड़े के हिसाब से भारत की लोकतांत्रिक तस्वीर बदल देना चाहते हैं। वे निर्दोष रेलयात्रियों पर हमला करते हैं, ग्रामिणों की बस उड़ाते हैं, पुलिस छावनियों पर हमले करते हैं और फरमान जारी करते हैं कि उनके इलाके में कोई सरकारी कर्मचारी नहीं आएगा। इन टुच्ची हरकतों को वे एक क्रांति का नाम देते है।

रही बात अपने ऑपरेशन ग्रीन हंट के असफल होने की तो उसके बहुत सारे आयाम है और सबसे बड़ा और सबसे पहला आयाम यह है कि नियति पर सब कुछ छोड़ दिया गया है। न कोई पक्की रणनीति है और न स्थानीय पुलिस और अर्धसैनिक बलों का तालमेल। अपने गांव देहात से देश की लड़ाई लड़ने पहुंचे ये बेचारे सैनिक शिकार होते रहते हैं और अरुंधती राय जैसे लोग तालियां बजाते रहते हैं।

मगर इस बार मामला कुछ गंभीर है। छत्तीसगढ़ पुलिस ने दावा किया है कि 6 जुलाई को माओवादी गिरोह ने कांग्रेस के नेता अवधेश सिंह गौतम के घर और कुकोंदा पुलिस थाने पर हमला किया था और इस हमले का सरगना न सिर्फ दिल्ली में रह कर पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहा है और देश विदेश जा कर प्रशिक्षण भी ले आया है, अरुंधती राय और मेधा पाटकर जैसे तथाकथित समाज बदलने वालों के लगातार संपर्क में हैं। इस नौजवान माओवादी का नाम लिंगम राम कोडोपी है और एक एनजीओ वनवासी चेतना आश्रम से भी वह सीधे जुड़ा है और इस एनजीओं को देश विदेश से बहुत पैसा मिलता है।

अरुंधती राय लिंगम राम कोडोपी से कुछ महीने पहले अपनी दंडकारण्य यात्रा में मिली थी और उनका दावा है कि इतना मासूम लड़का इस तरह की हरकते नहीं कर सकता। मगर छत्तीसगढ़ पुलिस का दावा है कि माओवादी कमांडर राजकुमार उर्फ आजाद के मारे जाने के बाद अब कोडोपी को ही छत्तीसगढ़ की जिम्मेदारी दी गई है। माओवादियों ने कई हमलों की वीडियो रिकॉर्डिंग कर के देश विदेश में पहुंचाया है ताकि उन्हें और अधिक मदद मिलती रह सके। अरुंधती राय को इन सब हत्यारों और कातिलों के बीच और उनकी हरकतों के पीछे जो मानवीय चेहरा दिखाई देता हैं वह उन लोगों को नहीं दिखाई देता जो अकारण गोलियों और लाठियों का शिकार होते है।

सरकार में विनायक सेन जैसे बुध्दिजीवियों को लंबे समय तक माओवाद का समर्थन करने के इल्जाम में जेल में बंद रखा लेकिन अरुंधती राय का समर्थन चूंकि दुनिया का एक बड़ा बुद्विजीवी वर्ग करता हैं और मानवाधिकारों को ले कर भारत अपनी छवि को ले कर इतना ज्यादा चिंतित हैं कि भारत को अरुंधती राय जैसे लोगों के खिलाफ शुध्द आपराधिक मामला होने के बावजूद उन्हें बंद करने का साहस नहीं किया जाता। अरुंधती राय अकेली नहीं हैं और महानगरों में टीवी चैनलों और अखबारों के पन्नों पर बहुत सारे कागजी माओवादी हैं जिन्हें एक सामाजिक व्यवस्था के बहाने ही सही, ठीक किया जाना चाहिए। वातानुकूलित विचार गोष्ठियों से छत्तीसगढ़ और आंध्र प्रदेश के जंगल बहुत दूर है मगर अरुंधती राय से कानून इतना दूर क्यों हैं?