देश को माओवादी नहीं, सरकार निपटाएगी
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आलोक तोमर
चिदंबरम कहते हैं कि सीआरपीएफ को राज्यों की और खास तौर पर छत्तीसगढ़ की पुलिस मदद नहीं करती। जयराम रमेश कहते हैं कि माओवादी समस्या चाहे जितनी बड़ी हो लेकिन इन जंगलों में सड़के नहीं बनाई जाएंगी क्योंकि इससे पर्यावरण को भयानक खतरा है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कहते हैं कि आतंकवादी भी अपने ही लोग हैं इसलिए उनसे सिध्दांत के स्तर पर बातचीत की जानी चाहिए। प्रणब मुखर्जी उस चीन से माओवादी समस्या का हल चाहते हैं जहां से माओवाद कब का खत्म हो चुका है।

हमारे देश के गृह सचिव जी के पिल्लई कई बार जब अपने मन से बोलते हैं तो सच कह जाते हैं। हाल ही में उन्होंने सरेआम कहा कि माओवादियों का इरादा अगले पचास साल में भारतीय लोकतंत्र को उखाड़ फेकने का है। वैसे जिस तरह हमारा शासन, प्रशासन और नीतियां चल रही है उन्हें देखते हुए पचास साल बाद उखाड़ फेकने को बहुत कुछ बाकी नहीं बच जाएगा। अभी जो पीढ़ी शासन कर रही है उसकी कई बरसियां मन चुकी होगी और वे विरासत में उतना ही दीमक और घुन लगा तंत्र सौंप कर जाएंगे।

माओवादियों ने हाल ही में जब पांच दिन का बंद आयोजित किया तो भारत सरकार में एक तरह से अघोषित आंतरिक आपातकाल का ऐलान कर दिया था। रेले रात को नहीं चली थी, राजमार्गों पर पुलिस तैनात की गई थी और माओवादी आतंक के इलाके में सारे पुलिस वालों की छुट्टियां रद्द कर दी गई थी। आंध्र प्रदेश में मारा गया माओवादी कमांडर आजाद बातचीत के लिए तैयार था तो उसे माओवादियों ने ही निपटा दिया। लेकिन उसकी बातचीत की अपनी शर्ते थी। उसका दावा था कि छत्तीसगढ़ में आदिवासियों का आधे से ज्यादा इलाका उद्योगों और खदान मालिकों को सौंप दिया गया है। जबकि असलियत यह है कि पूरे छत्तीसगढ़ का एक प्रतिशत और पूरे बस्तर इलाके का आधा प्रतिशत से भी कम उद्योगों और खनिजों के लिए दिया गया है।

असली समस्या है गरीबी। जिसके लिए हमारे मोंटेक सिंह अहलूवालिया की सलाह पर चलने वाली भारत सरकार के पास पैसा नहीं है। अगले पचास साल में माओवादी अगर देश की व्यवस्था को नष्ट करना चाहते हैं तो उसकी शुरूआत भारत सरकार ने ही कर दी है। उसके पास अनिवार्य शिक्षा के लिए पैसा नहीं हैं, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के लिए डॉक्टर नहीं है और महामारियों के लिए दवाईंयां नहीं है। यह जरूर है कि ऐसे ऐसे कॉरपोरेट अस्पताल खुल गए हैं जहां गरीब आदमी अगर गलती से घुस जाए तो अपनी खेती बेच कर ही वापस आ पाएगा।

अब खास तौर पर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने दिल्ली में गृह मंत्री के साथ हुई बैठक में जो तेवर दिखाए और चिदंबरम को जमीनी असलियत समझाई उसके बाद कुछ तो असर हुआ है। कम से कम चार राज्यों जिनमें छत्तीसगढ़ भी शामिल हैं, के पुलिस बल के साथ केंद्रीय बल मिल कर अब अपनी साझा शक्ति तैयार कर रहे हैं। इस साझा कमान में पुलिस आईजी रैंक के अफसर देगी और सेना के स्तर के मेजर जनरल अधिकारी आएंगे।

तय यह भी हुआ है कि हैलीकॉप्टर मिलेंगे मगर रक्षा मंत्री एंटनी का अड़ियलपन यह है कि हैलीकॉप्टर सिर्फ निगरानी और राहत के लिए दिए जाएंगे और सेना की ओर से एक भी कमांडो नहीं मिलने वाला। माओवाद प्रभावित इलाके में चार सौ और पुलिस थाने बनाए जाएंगे यानी माओवादियों को चार सौ और निशाने उपलब्ध करवाए जाएंगे। 34 नई बटालियनें बनेगी, ग्राम सभा स्तर पर आतंकवाद से निपटने के लिए कानून बनेगा और कॉमनवेल्थ खेलों पर बीस हजार करोड़ रुपए खर्च कर रही भारत सरकार माओवाद से निपटने के लिए फिलहाल साढ़े नौ सौ करोड़ देने को तैयार हो गई है।

योजना आयोग को जिम्मेदारी सौंपी गई है कि माओवाद प्रभावित इलाकों में सड़के, शिक्षा, स्वास्थ्य, पेय जल और पहले से चल रही योजनाओं को तेज करने और उन्हे समर्थन और शक्ति देने के लिए उपाय किए जाएंगे। छत्तीसढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह तब हत्थे से उखड़े जब उनसे कहा गया कि माओवादियों से बातचीत के रास्ते खुले रखने चाहिए। रमन सिंह ने बहुत खुले शब्दों में कहा कि जब तक माओवादी हमारे लोगों को मारते रहेेंगे और जब तक वे हथियार की भाषा बोलते रहेंगे तब तक उनसे बातचीत करने का न कोई अर्थ है और न वे इस मामले में केंद्र सरकार या किसी की सुनने वाले है।

माओवादी आर पार की लड़ाई लड़ रहे हैं। भारत सरकार फिर भी क्यों बीच का रास्ता निकालना चाहती है? माओवादी खाकी वर्दी का सफाया कर देना चाहते हैं मगर राज्य सरकारों को उन्हीं से बातचीत करने की सलाह दी जा रही है। हर गुंडागर्दी को सैध्दांतिक जामा पहनाने वाली और उसी की कमाई खाने वाली अरुंधती राय और मेधा पाटकर फिर मैदान में हैं और अरुंधती राय की हिम्मत नहीं हो रही है कि वे छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक विश्व रंजन के साथ एक मंच पर खड़े हो कर हिंसा और प्रतिहिंसा पर बहस करें।