पाकिस्तान ने कहा, हम सुन कर चले आए
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आलोक तोमर
जैसी कि आशंका थी हमारे विदेश मंत्री एस एम कृष्णा पाकिस्तान में एक बार फिर भारत के हितों का कबाड़ा कर के आ गए। पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी से अकेले में उनकी क्या बाते हुई ये झूठ सच तो वे संसद में आ कर बताएंगे मगर पत्रकारों के सामने साझा प्रेस कांफ्रेंस में कुरैशी सरेआम उन पर और भारत पर इल्जाम लगाते रहे और कृष्णा थके हुए बैठे रहे। एक बार फिर भारत के विदेश मंत्री पूरा होमवर्क कर के नहीं गए थे।

सबसे बड़ा तमाशा और भारत का अपमान कुरैशी ने साझा प्रेस कांफ्रेंस के आखिर में दीपक चौरसिया के सवाल के जवाब में किया। दीपक ने वही सवाल किया था जो हर भारतीय पूछ रहा है कि यह कैसी अभिव्यक्ति की आजादी है कि हाफिज सईद जैसा घोषित गुनहगार सरेआम भारत को तबाह करने के भाषण देता है और पाकिस्तान सरकार उसे पकड़ कर छोड़ती रहती है।

कुरैशी ने कहा कि हाफिज सईद जो बोल रहा है वह एक आजाद नागरिक की हैसियत से बोल रहा है। मगर भारत सरकार के गृह  सचिव जी के पिल्लई ने तो वार्ता के ठीक एक दिन पहले बयान दे डाला कि आईएसआई ने ही मुंबई के 26/11 के धमाके शुरू से अंत तक करवाए थे। पिल्लई ने यह बयान शिकागों में डेविड कोलमन हेडली से पूछताछ के आधार पर दिया था और इस पूछताछ के रिकॉर्ड मौजूद है। मगर कुरैशी ने तो हाफिज सईद और भारत के विदेश सचिव को एक ही पलड़े में ला कर खड़ा कर दिया और कहा कि दोनों एक जैसे हैं। दीपक चौरसियां या कोई अन्य सवाल पूछ पाते इसके पहले ही प्रेस कांफ्रेंस बर्खास्त करने का ऐलान कर दिया गया।

शर्म अल शेख की उस बैठक में कृष्णा भी थे जहां पाकिस्तान के बलूचिस्तान में चल रही हिंसा का इल्जाम भारत की एजेंसी रॉ पर पाकिस्तान ने लगाया था और मनमोहन सिंह उस साझा दस्तावेज पर दस्तखत कर के आए। जिन एम के नारायणन ने इस दस्तावेज की रचना की थी वे अब प्रधानमंत्री के सबसे खास अधिकारी है। एस एम कृष्णा तो विदेश मंत्री बने ही हुए हैं। इस बार कृष्णा ने खुद शर्म अल शेख का हवाला दिया है और कहा कि पाकिस्तान ने आज तक इस संबंध में विश्वसनीय प्रमाण तो छोड़िए, कोई प्रमाण नहीं दिया है।

इसके बाद कृष्णा ने लगातार सीमा पार से बढ़ती घुसपैठों का जिक्र किया और कहा कि पाकिस्तान लगातार युद्व विराम की शर्तों का उल्लंघन कर रहा है। बगल में मुस्कुराते बैठे कुरैशी ने कृष्णा की बोतल से मिनरल वॉटर लिया और कहा कि पाकिस्तान सरकार, सेना और पाकिस्तान की कोई गुप्तचर एजेंसी घुसपैठ में विश्वास नहीं करती। कृष्णा अवाक् और लाचार बैठे नजर आए। उनका पानी कुरैशी पहले ही पी चुके थे। कृष्णा ने मुंबई बम धमाकों के मामले में पाकिस्तान में कोई भी कार्रवाई न होने की बात उठाई तो कुरैशी गरज पड़े और कहा कि जेैसे आपके यहां हैं वैसे ही हमारे यहां भी न्यायपालिका आजाद है और हम उसे कोई समय सीमा नहीं दे सकते।

कुरैशी ने बहुत बेशर्मी से कहा कि पाकिस्तान का न्याय सरकार के नहीं, जनता के हित में चलता हैं और हाफिज सईद जनता का प्रतिनिधि है और उनके बीच काफी लोकप्रिय है। लग रहा था जैसे पाकिस्तानी सीनेट में भारत के खिलाफ प्रस्ताव पास किए जा रहे हों और भारत सिर्फ दर्शक दीर्घा में बैठा हो। इस तरह की बातचीत से तो बातचीत न होना ही भला है। फिर भी कृष्णा कुरैशी को दिल्ली में कवाब खाने के लिए आमंत्रित कर आए। कुरैशी आखिरी बार भारत में उस दिन थे जब मुंबई में उन्हीं के मुल्क के कातिल खून बहा रहे थे और अपनी जान बचाने के लिए कुरैशी ने पाकिस्तानी वायु सेना का जहाज मंगवाया था। कुरैशी हो या मुशर्रफ, भारत से आधी रात को भागते ही रहे हैं।

मुद्द कश्मीर का हमेशा आता है और इस बार भी आया है। भारत को यह गलतफहमी दिमाग से निकाल देना चाहिए कि कश्मीर पर अपना हक जताए बगैर पाकिस्तान कोई बात करेगा। इसीलिए यह भी जाहिर है कि कोई बातचीत सफल होने वाली नहीं है। पाकिस्तान के साथ निपटने का एक ही रास्ता है और वह यह कि उसे जबरन आइना दिखाया जाए और सच मंजूर करने पर बाध्य किया जाए। यह कृष्णा और मनमोहन सिंह जैसे महापुरुषों के वश की बात नहीं है। इसके लिए कलेजा चाहिए और उससे भी ज्यादा निर्णायक फैसले करने की ताकत चाहिए। कुरैशी ने तो एक ही वाक्य में पाकिस्तान के इरादे साफ कर दिए हैं। उन्होंने कहा है कि भारत और पाकिस्तान के रिश्ते आम पड़ोंसी देशो के रिश्तों की तरह नहीं हैं। इनमें बहुत बड़ा इतिहास हैं, बहुत सारे विवाद है और बहुत सारी बाधाएं हैं। फिर हम बात क्यों करते है और कृष्णा और कुरेैशी की बातचीत में भारत की आईएसआई के हाथ बिकी जासूस माधुरी गुप्ता का मामला क्यों नहीं आया यह सवाल शायद संसद में पूछा जाएगा और हमेशा की तरह भारत सरकार के पास कोई जवाब नहीं होगा। वक्त वैसे भी जवाब देने का नहीं है। सवाल पूछने का हैं।

पिछले साठ साल से हम लोग पाकिस्तान से सवाल पूछते रहे हैं। वहां सरकार चाहे सेना की हो या इस्लामी लोकतंत्र की, वहां से जवाब यहीं मिलते रहे हैं कि हमे अपनी शर्तों पर बात करनी है। जब तक सोवियत संघ महाशक्ति था तब तक अमेरिका भारत को अलग अलग बहानों से पटाने की हर संभव कोशिश करता था। यह भी अभी तक चलता रहा है। मगर अफगानिस्तान की लड़ाई में जब भारत ने अमेरिका का साथ नहीं दिया और उसे पाकिस्तान जैसे दलाल देश की तरह अपने यहां सैनिक अड्डे नहीं बनाने दिए गए तो अमेरिका पाकिस्तान पर कृपा बरसाने लगा। डॉलरों और हथियारों की शक्ल में आई इस कृपा की वजह से पाकिस्तान शुरू में तो बहुत जोश दिखाता रहा लेकिन अब जब पाकिस्तान ने उसे भी रास्ता दिखाना शुरू कर दिया है और एक तरह से सीधे धमकी दे दी है कि अगर वह तालिबानों का इलाज नहीं करेगा तो उसका इलाज कर दिया जाएगा। कोई आश्चर्य नहीं कि पाकिस्तान की ओर से बार बार चेतावनियां आ रही है कि तालिबान का अगला निशाना भारत हो सकता है।

दिक्कत यह है कि भारत में वास्तव में अपनी कोई विदेश नीति नहीं है। भारत एक प्रति विदेश नीति पर काम कर रहा है। यानी पाकिस्तान से बात करता है तो मुद्रा दूसरी होती है, अमेरिका से बात करता है तो मुद्रा दूसरी होती हैं, और हर देश के संदर्भ में यह मुद्रा बदलती रहती है और इसीलिए संयुक्त राष्ट्र से ले कर अंतर्राष्ट्रीय मंचों तक हम अपनी मुद्रा तय ही नहीं कर पाते। पाकिस्तान एक प्रतीक है लेकिन अगर हम इसी तरह समर्पण मुद्रा में बैठे रहे तो कितनी भी बड़ी आर्थिक शक्ति बन जाए, अपनी सीमाओं को बचाने की हैसियत हमारी नहीं रहने वाली है। सीमाओ पर हथियार नहीं, सैनिक लड़ते हैं और उनकी लड़ाई कैसी होगी इसका फैसला देश की राजनयिक नीति करती है।
 

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