आलोक तोमर
भारत के खेल इतिहास में कॉमनवेल्थ खेल 2010 सबसे शर्मनाक साबित होने जा रहे हैं। यह भविष्यवाणी नहीं, तथ्यों के आधार पर निकाला गया निष्कर्ष है और इससे भारत के खेल मंत्री एम एस गिल भी असहमत नहीं है।
जब खेल समारोह के उद्धाटन को नब्बे से भी कम दिन रह गए थे तो भारतीय ओलंपिक संघ के अध्यक्ष सुरेश कलमाड़ी को लगा कि ताज समूह के साथ जो खाना सप्लाई करने का करार हुआ है वह बहुत ज्यादा दाम पर हुआ है। चार साल तक जिस करार की याद उन्हें नहीं आई, वह अचानक याद आ गया क्योंकि पूना की कंपनी को ठेका देना था।
इसके अलावा बड़ी मेहनत और बड़ी धूमधाम से जो नए स्टेडियम बनाए गए थे उनकी छते गिरने लगी है। कब कौन सा हादसा हो जाए यह अभी से नहीं कहा जा सकता लेकिन जिस तरह की घोंसला छाप तैयारियां हैं उससे हादसा होना तय है। मानसून की पहली बड़ी बारिश में नई शूटिंग रेंज का पूरा मैदान बह गया और वहां गङ्ढे हो गए। आज से सिर्फ 74 दिन रह गए हैं लेकिन ज्यादा स्टेडिय में काम पूरा नहीं हुआ है और इस बात की तो कोई उम्मीद नहीं है कि गुड़गांव वाली शूटिंग रेंज में प्रतियोगिता हो भी पाई। इस स्टेडियम का उद्धाटन दो महीने पहले एम एस गिल ने किया था। 8 जुलाई को सीआरपीएफ के डीआईजी और मैनेजर एम सी पवार ने खेल मंत्री गिल को इस स्टेडियम की दुर्दशा के बारे में एक लंबा पत्र लिखा था जिसमें इसकी दुर्गति का वर्णन किया गया था और कहा गया था कि यही हाल रहा तो यहां पर स्वर्ण पदकाें वाले दो खेल नही हो पाएंगे।
इसी पत्र में बताया गया है कि हर मौसम में चलने लायक जिस रोड का डंका पिटा गया था वह एक बारिश में कई जगह धंस गई हैं और कई जगह पर तो स्टेडियम के खिड़कियों से भी पानी आ रहा है। यमुना विहार खेल परिसर में भी बुरी दशा है और दिल्ली के केंद्र में बना शिवाजी स्टेडियम अभी तक रास्ते पर नहीं आया है और अब उसे तिरपालों से ढक कर रखा गया है।
इस बीच कॉमनवेल्थ खेलों के कमिश्नर और भारत के खेल मंत्री एम एस गिल के बीच काफी तीखा झगड़ा शक्ल ले रहा है। इस झगड़े में गिल ने कॉमनवेल्थ फेडरेशन के मुखिया माइक फैनेल को पत्र लिख कर कहा है कि आप अपने साथ कॉमनवेल्थ के अधिकारियों को जरूर लाए लेकिन खेल समारोह में खिलाड़ियों का होना भी जरूर होता है। फैनेल ने कुछ दिन पहले कहा था कि इस बहाने अगले कॉमनवेल्थ खेलों की तैयारी हो जाएगी।
भारत के खेल मंत्री एम एस गिल ने सीधे सीधे सवाल किया है कि अगर कॉमनवेल्थ फेडरेशन के अधिकारी ही आने है और खिलाड़ी नहीं आने है तो मैं और सुरेश कलमाडी आपस में ही दौड़ लगा लेंगे, कॉमनवेल्थ खेल समारोहों पर इतना खर्चा करने की जरूरत क्या है? दरअसल गिल को इस बात पर गुस्सा आया है कि दुनिया के कई स्टार एथलिटों ने कॉमनवेल्थ दिल्ली खेलों में शामिल होने से परहेज जाहिर किया है।
गिल ने सीधे फैनेल को पत्र लिख कर कहा है कि आप कॉमनवेल्थ फेडरेशन के अध्यक्ष है और यह आपकी जिम्मेदारी है कि आप विश्व विख्यात एथलीटों को ले कर आए। जमैका के रहने वाले फैनेल से कहा गया है कि अगर उसैन बोल्ट और क्रिस ह्ाय जैसे महान एथलीट भारत नहीं आएंगे तो इस गेम का महत्व ही क्या रह जाएगा? बोल्ट तीन बार ओलंपिक का गोल्ड मैडल जीत चुके हैं और क्रिस ह्ाय चार बार स्वर्ण पदक पा चुके है। इसके अलावा विश्व की हेप्थानोल चैपिंयन जेसिका एनिस ने निजी कारणों से आने से इंकार कर दिया है। ओलंपिक और विश्व सौ मीटर की दौड़ की चैंपियन शैली एम फ्रीजर जमैका की ही रहने वाली है और दिल्ली आने के लिए तैयार नहीं हैं। ओलंपिक की एक और चैंपियन डरोनिका कैंपवेल ब्राउन भी ओलंपिक चैंपियन है और वे भी नहीं आ रही। स्कॉटलैंड की विश्व गोल्ड मैडलिस्ट जिमनास्ट डेनियल केपिंग ने भी इनकार कर दिया है, आस्ट्रेलिया की ओलंपिक तैराकी चैंपियन केप कैंपवेल और इंग्लैंड के तेज दौड़ में रिकॉर्ड बनाने वाले ड्वेन चैंम्बर्स भी नहीं आ रहे हैें।
यह अभी तक की सूची है। जो खबरे भारत से स्टेडियमों की हालत और माओवाद वगैरह के बारे में उड़ कर जा रही है उनसे साफ लगता है कि बहुत सारे स्टार खिलाड़ी कॉमनवेल्थ में दर्शन नहीं देंगे। जाहिर है कि टूटे फूटे स्टेडियमों, रातों रात दब गए ठेकेदार के खानों और प्रायोजकों की प्रचंड कमी के बावजूद भारत के कॉमनवेल्थ खेल 2010 सिर्फ शोकगीत लिखने लायक बच जाएंगे। उद्धाटन समारोह के लिए ए आर रहमान को करोड़ों रुपए का संगीत तैयार करने के लिए कहा गया है और देश दुनिया से बहुत सारे लोक कलाकार बुलाए गए हैं लेकिन सच यही है कि कॉमनवेल्थ खेलों पर अशुभ की छाया पड़ चुकी है अगला एक साल हमे इस अशुभ के स्पष्टीकरण सुनने में बिताना पड़ेगा।
आखिर कॉमनवेल्थ खेलो की जरूरत अब क्यों हैं? अगर इंग्लैंड अपने भूतपूर्व गुलाम देशों के बीच खेल तमाशा करवाना चाहता है तो लंदन में एक स्थायी पंडाल बना ले और वहां काफी धूम धाम से हर साल यह उत्सव करे। आखिर थेम्स नदी की सफाई के बाद पुरानी लंदन में काफी जमीन ऐसी निकल आई है जिसके उपयोग के बारे में लंदन महानगरपालिका अब तक फैसला नहीं कर पाई है। जिस देश के राज में कभी सूरज नहीं डूबता था वहां अब नकली सूर्योदय कर के ही उत्सव करने की भूमिका क्यों नहीं निभाई जा सकती? क्यों भारत जैसे विकासशील देश में जहां शिक्षा स्वास्थ्य और भूख सबसे बड़ी समस्याएं हैं, वहां कॉमनवेल्थ इतनी बड़ी प्राथमिकता क्यों होनी चाहिए? रातों रात जो मेट्रो और फ्लाई ओवर बनाए गए हैं उनका चटकना, दरकना शुरू हो गया है और ये ढांचे मेरी दिल्ली, मेरी शान में कोई इजाफा नहीं करने वाले हैं।
जिस दिल्ली में एक बारिश में सड़कों पर नौकाए चलने की हालत आ जाती है, जहां मुख्यमंत्री कभी नगर निगम तो कभी पीडब्ल्यूडी को दोष देती है, जहां पांच सितारा उत्सवों के बहाने खेल को खिलवाड़ बना दिया जाता है वहां कॉमनवेल्थ के बहाने भारतीय सत्ता और समाज की असली तस्वीर सामने आ जाती है और अभी आप देखते जाइए कि कॉमनवेल्थ के नाम पर कितने करोड़ का कॉमन घोटाला हुआ है।