आलोक तोमर
बिहार में चुनाव की बयार चलते ही घपले, घोटाले और पुराने कानूनी मामले सामने आने लगे हैं। नीतिश कुमार सरकार पर सीएजी की रिपोर्ट के बहाने बिहार विधानसभा में नंगा नाच सब देख चुके है लेकिन अभी तो ये शुरूआत है और इस बिहार चुनाव में क्या होगा इसकी बानगी मिलनी शुरू हो गई।
सबसे पहले तो यह आरोप सामने आया है कि जिस चारा घोटाले में लालू प्रसाद यादव को अपने जीवन के सबसे बड़े राजनैतिक संकट का सामना करना पड़ा था, उसमें वर्तमान मुख्यमंत्री नीतिश कुमार का नाम भी है। सीबीआई के रिकॉर्ड के हवाले से कहा गया है कि 1994 के दिसंबर महीने में चुनाव के खर्चे के लिए चारा घोटाला के सरकारी सरगना डॉक्टर एस बी सिन्हा ने नीतिश कुमार को एक करोड़ रुपए पहुंचाए थे और यह पैसा सतर्कता विभाग के एक अधिकारी उमेश प्रसाद सिंह के जरिए पहुंचाया गया था।
इस सूची में नीतिश कुमार का नाम अकेले नहीं है। एक नेता गुलशन आजमानी भी है जो 57 लाख रुपए लेने के बाद इसी घोटाले में कैद कर लिए गए हैं। विधायक और लालू प्रसाद और नीतिश दोनाें के मित्र रहे भोला राम तूफानी को पचास लाख मिलने की बात कही गई है। राधा नंदन झा जिन्हें मृत्यु के बाद अभियुक्त बनाया गया भी आठ लाख रुपए प्राप्त चुके थे। बहुत सारे ऐसे लोग थे जिनको पांच से दस लाख रुपए हर महीने मिलते थे। बिहार के ताकतवर नेताओं में से एक माने जाने वाले शिवानंद तिवारी के नाम पर भी साठ लाख रुपए लिखे हुए हैं।
भोला राम तूफानी, जगदीश शर्मा, विद्या सागर निसाद और गुलशन आजमानी को तो इसी मामले में पकड़ा गया। राजो सिंह नाम के विधायक को तो अभियुक्त बनाने के लिए एक अतिरिक्त चार्ज शीट दाखिल करनी पड़ी। सीबीआई के गवाहों ने और खास तौर पर डॉक्टर एस बी सिन्हा ने 20, 21, 22 और 28 मई 1996 के बयानों में कहा है कि शिवानंद तिवारी और एक डॉक्टर राणा के बीच हुई बातचीत के बाद नीतिश कुमार के पास पैसे पहुंचाए गए। यही बात अपने बयान में एक और अभियुक्त आर के दास ने भी कही है। इस मामले में सीबीआई के विशेष जज को भी अभियुक्त बनाया गया था।
इस घोटाले का सबसे सनसनीखेज भाग यह है कि इसमें अभियुक्तों और गवाहों की लगातार संदिग्ध हालतों में मौत होती रही है। हरीश खंडेलवाल ने आत्महत्या कर ली। एके टाडू बेयूर जेल में मरे हुए मिले। भोला राम तूफानी ने दीवार पर माथा मार के अपने आपको मार डाला। चंद्रदेव प्रसाद वर्मा अदालत का समन हाथ में पकड़े पकड़े मर गए। पी के जायसवाल न्यायिक हिरासत में दमे की दवा नहीं मिलने के कारण दम तोड़ बैठे। ओपी गुप्ता की मौत भी न्यायिक हिरासत में हुई।
विनोद चिरानिया सजा सुनने के बाद खुद आत्महत्या कर बैठे। विष्णु स्वरूप अग्रवाल की न्यायिक हिरासत में मौत हुई। श्याम बिहारी सिन्हा जो सरगना थे, वे भी रहस्यमय हालात में मारे गए। खंडेलवाल और चिरानिया ने कोलकाता ने अपने अपने घर की छत से छलांग लगा कर जान दे दी और अपने आखिरी पत्र में लिखा कि सीबीआई से मुकाबला करना किसी आम आदमी के बस की बात नहीं है। ये वे लोग थे जिन्होंने जानवरों के लिए दवाई और चारा खरीदने के लिए आए पैसे को नेताओं से ले कर कमीशन के आधार पर काले से सफेद करवाने का धंधा शुरू किया था।
नीतिश कुमार के वर्तमान उप मुख्यमंत्री और भाजपा के नेता सुशील मोदी एक जमाने में प्रतिपक्ष के नेता भी थे और उन्होंने तत्कालीन केंद्रीय मंत्री नीतिश कुमार और उनके चेले समता पार्टी के सांसद राजीव रंजन सिंह उर्फ लल्लन सिंह के साथ मिल कर राज्यपाल तक को ब्लैकमेल किया था, सीबीआई इस मामले में जांच कर रहे अधिकारी यू एन विश्वास की सेवाएं बढ़वाई थी और यह बात सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के अगस्त 2001 के फैसले में कही गई है।
सुशील कुमार मोदी और उनके दोस्त विशेन पटेल ने फरवरी 1996 में एक पीआईएल याचिका दाखिल की थी। सर्वोच्च न्यायालय ने इसे पढ़ने के बाद इसे राजनैतिक याचिका कहा था। कहानी में यह सच भी शामिल है कि लालू प्रसाद के एक जमाने के दोस्त सुशील मोदी और नीतिश कुमार मिल कर उन्हें निपटाने पर तुले हुए थे और निशाने पर जगन्नाथ मिश्रा भी थे। अकेले यादव को घेरने में राजनीति के जातीय समीकरण बिगड़ते।
सर्वोच्च न्यायालय में बहस के दौरान समझ में आया कि इस मामले में तो बिहार के तत्कालीन राज्यपाल ए आर किदवई को भी ब्लैकमेल करने की कोशिश की गई थी। पहले केंद्र सरकार पर दबाव बनाने के लिए सीबीआई ने चार आईएएस अधिकारी और आयकर आयुक्त को पकड़ा ताकि उन पर मुकदमा चलाने की मंजूरी देना केंद्रीय सरकार की मजबूरी बन जाए। सीबीआई ने बहुत अनोखा तरीका अपनाया।
सीबीआई असम के पशु कल्याण विभाग के लैटर ऑफ क्रेडिट घोटाले की भी जांच कर रही थी और वहां के तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रफुल्ल महंत इस मामले में अभियुक्त थे। सीबीआई ने महंत पर मुकदमा चलाने के लिए असम के राज्यपाल से अनुमति मांगी और जब असम से अनुमति मिल गई तो नंबर बिहार का आया। बिहार में सीबीआई ने सरकार को नहीं बल्कि सीधे राज्यपाल को लिखा कि उन्हें बड़े लोगों के खिलाफ कार्रवाई की अनुमति चाहिए।
इस बीच अखबारो में राज्यपाल के खिलाफ ही भ्रष्टाचार की खबरे सुशील मोदी और उनके साथियों की तरफ से खबरे छपनी शुरू हो गई। राजभवन में पचास लाख का घपला बताया गया, फिर कहा गया कि जब से किदवई राज्यपाल बने है तब से खर्चा ढाई सौ गुना बढ़ गया है। फिर कहा गया है कि राजभवन में तीतर और बटेर बिकते हैं और आखिर में महाअभियोग लगाने की भी चेतावनी दे दी गई। इनमें से किसी भी मामले में कोई जांच नहीं हुई लेकिन राज्यपाल ने अनुमति दे दी।
राज्यपाल के सचिवालय की हालत यह थी कि एक शासकीय आवेश में राज्यपाल ने लिखा कि 1988 में जगन्नाथ मिश्रा के मुख्यमंत्री रहते एक अधिकारी की बगैर बारी के पदोन्नति लालू यादव की सिफारिश पर की गई थी मगर राजभवन भूल गया कि उस समय भगवत झा आजाद मुख्यमंत्री हुआ करते थे, जगन्नाथ मिश्रा नहीं। अभी सिर्फ एक घपला बिहार की चुनावी हवा में आया है लेकिन अभी तो ये शुरूआत हैं।