लोकायुक्त के काम और लोकपाल की जरूरत
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आलोक तोमर
हमारे कानून मंत्री वीरप्पा मोइली अचानक साहित्यकार के अवतार में भी प्रकट हुए हैं लेकिन साहित्य से ज्यादा उन्हें अपने अतीत को याद रखने की उनसे उम्मीद की जाती है। श्री मोइली भारत के दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग के अध्यक्ष थे और उन्होंने केंद्र सरकार और केंद्रीय मंत्रियों और बड़े अधिकारियों के कर्मो, कुकर्मों का न्याय करने के लिए केंद्रीय लोकायुक्त या लोकपाल की नियुक्ति की सिफारिश की थी। मोइली की रिपोर्ट का शीर्षक ही प्रशासन में नैतिकता था।

मोइली की रिपोर्ट में कहा गया था कि देश के लोकायुक्त यानी लोकपाल के पद पर सर्वोच्च न्यायालय के एक रिटायर न्यायमूर्ति को होना चाहिए, कानून के एक विख्यात जानकार को होना चाहिए और केंद्रीय सतर्कता आयुक्त को इसका सदस्य सचिव होना चाहिए। लोकपाल की नियुक्ति की मांग और इसके आश्वासनों की कहानियां पिछले बीस साल से चल रही है लेकिन कहीं न कहीं कोई न कोई सार्वजनिक शर्म जरूर हैं जिसके कारण कभी कहा जाता है कि प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को लोकपाल के अधिकार क्षेत्र से बाहर रखा जाए तो कभी न्यायपालिका को भी गो माता का दर्जा देने की सलाह दी जाती है।

सूचना का अधिकार जब सन 2005 में लागू किया गया तब भी ऐसे झगड़े और झमेले होते थे। भारतीय सेना और सर्वोच्च न्यायालय पर यह अधिकार लागू होने में जमाना लग गया। जम्मू कश्मीर ने तो बहुत देर में जा कर इस अधिकार को मंजूरी दी। अभी भी यह अधिकार पूरे तौर पर और अपने सभद्र रूप में लागू किए जाने का इंतजार कश्मीर में कर रहा है।

अगर यूपीए सरकार वाकई पारदर्शिता और जवाबदेही के प्रति जिम्मेदार है तो संसद के मानसून सत्र में ही एक केंद्रीय विधेयक बना ला कर उसे कानून का रूप दे दिया जाना चाहिए और इससे एक लाभ यह भी होगा कि जवाबदेही के पक्ष में और खिलाफ जो लोग हैं उन्हें आमने सामने देखा जा सकेगा और उनकी भी जवाबदेही तय की जा सकेगी।

इस कानून में विभिन्न राज्यों के लोकायुक्त कानूनों की प्रमुख धाराओं का इस्तेमाल किया जा सकता है जो अब तक काम की साबित नहीं है। कर्नाटक सरकार ने इस मामले में एक नजीर पेश की है। वहां लोकायुक्त के पास शिकायत करने की जरूरत नहीं हैं, लोकायुक्त को अधिकार है कि वे आईएएस और आईपीएस के अलावा अन्य अधिकारियों के खिलाफ कहीं से भी सूचना मिलने पर जांच शुरू कर सकती है। इस पर आश्चर्य मत करिए कि इस प्रावधान में मंत्री और मुख्यमंत्री शामिल क्यों नहीं हैं और यह तो पूछिए ही मत कि हाल में ही कर्नाटक के लोकायुक्त संतोष हेगड़े को इस्तीफा क्यों देना पड़ा था? कहानी बहुत लंबी हो जाएगी और इसका अंत अभी हुआ नहीं हैं।
अभी तक अपने आप अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने का हक उप लोकायुक्त के पास था और वह भी पटवारी से ले कर तहसीलदार तक के अधिकारियों तक। विधायकों को तो छोड़िए, वे निर्वाचित जन प्रतिनिधियों को भी हाथ नहीं लगा सकते। नार्वे, फिनलैंड और न्यूजीलैंड भ्रष्टाचार के मामले में वार्षिक सर्वेक्षणों में लगातार आगे बढ़ते जा रहे हैं और अपने आपको साफ साबित करते जा रहे हैं तो वहां लोकपाल प्रणाली का सफलता से लागू होना एक महत्वपूर्ण कारण हैं।

आज भी देश के सिर्फ सत्रह राज्यों में लोकायुक्त हैं। लोकपाल की नियुक्ति की बात 1966 से चल रही है मगर चौवालीस साल बितने के बाद भी देश में कोई लोकायुक्त नहीं है। यह तब है जब लोकसभा में आठ बार लोकपाल नियुक्त करने का विचार पेश किया जा चुका है। लोकायुक्तों की नियुक्ति की परंपरा उड़ीसा से शुरू हुई थी और 1970 में वहां पहले लोकायुक्त की नियुक्ति की गई थी। मगर विडंबना यह है कि उड़ीसा में ही सबसे पहले यानी 1993 में लोकायुक्त पद का प्रावधान खत्म कर दिया गया।

इस लोकायुक्त वाले मामले में एक और गड़बड़ हैं। भारत के मुख्य सूचना आयुक्त वजाहत हबीबुल्ला से ले कर राज्यों के सूचना आयुक्त तक के पद सत्यनारायण कीे कथा की प्रसाद की तरह बांटे जाते हैं। वजाहत हबीबुल्ला देश के मुख्य सूचना आयुक्त होने के पहले जम्मू कश्मीर काडर के आईएएस थे और सोनिया गांधी से उनकी करीबी जगजाहिर है। पर्सोनल मंत्रालय के सत्यानंद मिश्रा और प्रणब मुखर्जी की सहेली और भारतीय राजस्व सेवा में रही औमिता पॉल भी सूचना आयुक्त नियुक्त किए गए थे। हर राज्य में प्रयासपूर्वक वहां के भूतपूर्व मुख्य सचिव या पुलिस महानिदेशक को सूचना आयुक्त बनाए रखा है और जब सूचना के अधिकार में इतनी गड़बड़ है तो लोकायुक्त के मामले में जहां सीधे फैसले करने होते हैं तो किसी पारदर्शिता की उम्मीद कैसे की जा सकती है?

जिन सत्रह राज्यों में लोकायुक्त काम कर रहे हैं वहां सच और सफाई की बाढ़ नहीं आ रही है। हर राज्य में भ्रष्टाचार अपनी रफ्तार से चल रहा है और मुख्यमंत्रियों से ले कर ताकतवर मंत्रियों के नाम लोकायुक्त की अभियुक्त सूची में शामिल है। फिर भी यह अभियुक्त अपने अपने राज्यों में राज कर रहे हैं। कर्नाटक में संतोष हेगड़े और उनके द्वारा पकड़ी गई दो सौ करोड़ की चोरी का मामला तो अभी हाल में सामने आया मगर उत्तर प्रदेश में भी मायावती के मूर्ति और पार्क प्रेम से वहां के लोकायुक्त भी नहीं निपट पाए।

उत्तर प्रदेश में लोकायुक्त इलाहाबाद उच्च न्यायालय के नरेंद्र नेहरोत्रा हैं मगर उन्होंने मायावती के सामने हाथ खड़े कर दिए और सवोच्च न्यायालय को बीच में आना पड़ा। लोकायुक्त को सीधे अधिकार और लोकपाल का संरक्षण दिए बगैर हम लोग हवा में चाहे जितनी बाते कर ले, देश में पारदर्शिता लाने की सोच भी नहीं सकते। सिर्फ कल्पना कीजिए कि देश में लोकपाल होते और प्रधानमंत्री कार्यालय उनके अधिकार क्षेत्र में होता तो शायद हम भी इतनी मेहनत नहीं कर रहे होते जितनी एंडरसन की रिहाई के लिए जिम्मेदार आदमी को खोजने में करनी पड़ रही है। देश को लोकतंत्र भी चाहिए और इस लोकतंत्र को बनाए रखने के लिए लोकपाल जैसी ईमानदार संस्था भी चाहिए।

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