उद्देश्य और उत्सव के बीच का असली फर्क
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आलोक तोमर
तीन दिन पहले ही कसम खाई थी कि अपने गुरु प्रभाष जोशी की परंपरा के स्मरण में बनाए गए न्यास के बारे में और कुछ नहीं बोलूंगा और न सुनूंगा। आखिर प्रभाष जी के स्मरण में जो न्यास बना हैं वह कहीं न कहीं उनकी विरासत को जिंदा जरूर रखेगा। इसलिए तमाम अपवादों के बावजूद उसमें उत्पात क्या मचाना। इसके अलावा जहां बड़े बड़े दिग्गज मौजूद हो और दोनों को भी दिग्गज बनाने पर तुले हो वहां आदमी टांग नहीं अड़ाए, वही बेहतर हैं।

मगर इसका क्या करे कि प्रभाष परंपरा न्यास के सूत्रधारों ने कवच के तौर पर हमारे प्रभाष जी के बड़े बेटे और क्रिकेट के शानदार खिलाड़ी संदीप जोशी को इस्तेमाल किया। पहले शुरूआत संजय तिवारी नाम के एक अखबारी कवच में की थी जो पहली बारिश में ही फट गया लेकिन संदीप गुरु पुत्र हैं और प्रभाष जी पर उनके अलावा थोड़ा बहुत हक मैं अपना भी समझता हूं, इसलिए मुझे लगता है कि संदीप को याद दिलाना चाहिए कि वे गलत टीम की फील्डिंग कर रहे हैं।

संदीप ने लिखा है कि गांधी दर्शन के सत्याग्रह मंडप में नामवर सिंह की अध्यक्षता और राम बहादुर राय के प्रबंधन में हुए इस कार्यक्रम में प्रभाष परंपरा का बड़ा परिवार आया। वह सब हुआ जो परिवारों में होता है और होते रहना चाहिए। प्रभाष जी जन्मदिन ही नहीं, किसी भी पर्व या अवसर पर समारोहपूर्वक मनाते थे और जैसा कि संदीप कहते हैं कि पिछले कुछ वर्षों से उनका जन्मदिन जनसत्ता परिवार मनाता रहा है और जोर दे कर कहा गया है कि राम बहादुर राय हेमंत शर्मा और अशोक गढ़िया नाम के हिसाब में हेरा फेरी करने वाले पेशेवर चार्टर्ड एकाउंटेंट इसका इंतजाम करते थे। इस बार इन्हीं ने यह आयोजन किया।

संदीप जोशी शायद लगा कर लिखते हैं कि प्रभाष जोशी ने शायद कट्टरवाद को नकार कर परंपरावाद को अपनाया था। इसलिए प्रभाष जी को याद करने के लिए न्यास का नाम प्रभाष परंपरा सुझाया गया और बढ़े परिवार ने इसे अपना लिया। बड़ी मेहरबानी थी। वे अगर माता वैष्णो देवी ट्रस्ट नाम रख देते तो भी उन्हें कौन रोक सकता था मगर झगड़ा इस बात का है ही नहीं कि समारोह क्यों हुआ, कैसा हुआ और कौन आया और कौन नहीं आया। असली झगड़ा तो न्यास की रचना को ले कर है जिसमें वे और ऐसे ऐसे लोग विराजमान है जिनकी उपस्थिति शायद हमारे प्रभाष जी को मंजूर नहीं होती।

वैसे तो प्रभाष जी आडवाणी और वाजपेयी के साथ खाना खाते थे लेकिन हिंदुत्व के भाजपाई सरोकारों से उनका कोई लगाव नहीं था। फिर राजनाथ सिंह और मुरली मनोहर जोशी इस न्यास में क्या कर रहे हैं? क्या प्रभाष जी आत्मा ने अयोध्या कांड के लिए उन्हें माफ कर दिया? माना कि राजनाथ गाजियाबाद के लोकसभा सदस्य के तौर पर सदस्य हैं तो जिस जनसत्ता को प्रभाष जी ने रचा था उसके संपादक ओम थानवी को सदस्य क्यों नहीं बनाया गया? सदस्य बनाने की कसौटी ही शायद यह थी कि संपर्क या पैसे की दम पर जो लोग मदद कर सकते हो वे न्यास में शामिल हो। न्यास में शामिल बहुत सारे दो कौड़ी के लोग हैं जिनकी गिनती चोरो, भू माफियाओं और लेखकों के हक हजम करने के अलावा शिक्षा जगत में भ्रष्टाचार फैलाने के लिए होती है। इन लोगों को प्रभाष जी के नाम की एक नाव मिल गई है और इसी नाव पर वे अपने पापों का भवसागर पार करने वाले हैं।

संदीप जोशी जिन्हें उनके बचपन से मैं पप्पू के नाम से जानता हूं, अचानक बड़े हो गए हैं और आदर्शवादी समाज, लोक परंपरा और सृष्टि के आरंभ आदि की बड़ी बड़ी बाते करने लगे हैं। उन्होंने शुरूआत में ही खाप पंचायतों का जिक्र कर दिया है और प्रभाष परंपरा न्यास भी मेरी और मेरे जैसे बहुत सारे मित्रों की विनम्र राय में एक खाप पंचायत बनाने की कोशिश की जा रही है जहां पत्रकारिता को ले कर सिर्फ फतवे जारी किए जाएंगे। गनीमत है कि प्रभाष जी इतना रच गए हैं कि उन्हें याद रखने के लिए किसी न्यास की आवश्यकता नहीं हैं मगर वैसा ही और लोग भी रच सके, इसके लिए जरूर कोई न्यास होना चाहिए जहां से प्रभाष जी की विरासत की गंगोत्री कस्बों, गांवो और देहातों तक पहुंच सके।

प्रभाष जी को समकालीनता के फलक से धकेलने की लगातार कोशिश की जा रही है। उन्हें आत्मीय से पूज्य बनाने की साजिश की जा रही है। उन्हें मूर्ति की तरह स्थापित करने का स्वांग रचा जा रहा है ताकि जो पंडे न्यास में विराज गए हैं उनकी रोजी रोटी चलती रहे। इनमें से कई पंडो की रोजी रोटी पिछले काफी वर्षों से प्रभाष जी के नाम पर ही चल रही थी। अब भी वे न्यास के बहाने समय समय पर उत्सव करने की परंपरा कायम रखना चाहते है।

राजेंद्र माथुर प्रभाष जी के बाल सखा थे। दूसरे बाल सखा शरद जोशी थे। मुझे पता नहीं कि इन लोगों के नाम पर कोई न्यास बने या नहीं मगर इतना पता है कि हिंदी पत्रकारिता का कोई भी गंभीर विद्यार्थी या पत्रकारिता में रुचि रखने वाला इन नामों को भुला नहीं पाएगा। गांधीवाद की जो लगातार धारावाहिक हत्या खास तौर पर गाधीवादियों ने की हैं, वही काम प्रभाष जी के साथ न हो और दुकानदारी पनपाने के नाम पर प्रभाषवाद नाम का कोई नया प्रोडक्ट विकसित नहीं हो जाए, अब तो इसका डर लगता है।

प्रभाष जोशी ने सिर्फ हिंदी पत्रकारिता को ही नहीं, पूरी भारतीय पत्रकारिता को एक अजब और गजब मुहावरा दिया हैं। इस मुहावरे को आगे बढ़ाने के लिए न्यास वगैरह की जरूरत शायद उतनी नहीं हैं जितनी प्रभाष जी के सरोकारों में आस्था रखने की है। संदीप छोटे हैं और परंपरा न्यास में शामिल हैं लेकिन उन्हें प्रभाष जी रचे जनसत्ता में जो लिखने के लिए बाध्य किया गया है वह चकित भी करता है और स्तब्ध भी। संदीप को पारिवारिक विरासत मिली हैं मगर सैकड़ों लोग हैं जिनके पास प्रभाष जी की बौद्विक विरासत है। संदीप सौभाग्यशाली हैं जो प्रभाष जी के बेटे के तौर पर पैदा हुए हैं मगर प्रभाष जी के मानस पुत्रों की कमी नहीं है जिन्हें लिखना भी आता है और जो सृष्टि के आरंभ और परिवार के सरोकारों पर निबंध भर नहीं लिखते। और फिर इससे बड़ा झूठ तो कोई हो ही नहीं सकता जो शीर्षक में लिखा है कि प्रभाष जी को उद्देश्य से ज्यादा उत्सव प्रिय थे। हैरत की बात है कि यह बात उनका बेटा लिख रहा है जिसने बनारस से लखनऊ होते हुए दिल्ली लौटते हुए अपने पिता को देखा है और जिसे पता है कि अगले दिन अपने सामाजिक सरोकारों और उद्देश्यों के लिए प्रभाष जी मणिपुर जाने वाले थे। कब तक दूसरों की भाषा बोलोगे संदीप?