राष्ट्र विरोधियों का राष्ट्रकुल
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आलोक तोमर
भारतीय राजनीति अमानवीय तो हमेशा से थी मगर उसके पाशर्विक होने के सबूत अब मिलने शुरू हुए हैं। जहां हाथ डालिए, आप पाएंगे कि राजनेताओं और सरकार की प्राथमिकता दूसरी हैं और उस प्राथमिकता में आम नागरिक शामिल नहीं है।

इन दिनों कॉमनवेल्थ का हंगामा काफी जोर शोर से है इसलिए सबसे पहले कॉमनवेल्थ की ही बात की जाए। दिल्ली सरकार के पास कुल 2800 करोड़ रुपए कॉमनवेल्थ के लिए सुविधाएं जुटाने और नए निर्माण करने के लिए उपलब्ध थे। पता नहीं शीला दीक्षित की सरकार किस तरह काम करती है कि इस रकम की कोई भी जानकारी दिल्ली सरकार वित्त मंत्री अशोक वालिया तक को नहीं थी। जब विभिन्न विभागों ने सड़कों से ले कर फ्लाई ओवरों और टेंडरों का भुगतान करने के लिए पैसा मांगा तो इंदौर के रहने वाले और दिल्ली में राजनीति में खासे सफल वालिया के सामने कोई विकल्प नहीं था।

मंत्रिमंडल की बैठक में मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने ही प्रस्ताव किया कि डीजल, रसोई गैस और सीएनजी के दाम बढ़ा दिए जाए तो दिल्ली को चमकाने लायक पैसा आ जाएगा। शीला दीक्षित की पहल पर ही दिल्ली को चमकदार बनाने के लिए लो फ्लोर बसों के एक बड़े बेड़े का आयात किया गया और पाया गया कि इन बसों के इंजन में आग बहुत जल्दी लगती है। मतलब कॉमनवेल्थ जिस समय हो रहे होंगे उस समय दिल्ली की सड़कों पर ये आधुनिक बसें आयातित मानव बम के तौर पर घुमी फिरती दिखाई देंगी। दुर्घटनाओं के तो इतने प्रचंड अवसर हैं कि कॉमनवेल्थ खेलाें की चमक दमक इस आग से और ज्यादा बढ़ जाएगी। लाशे गिरेंगी तो गिरती रहे।

कॉमनवेल्थ फेडरेशन के मुखिया फैनेल को भारत के खेल मंत्री एम एस गिल ने पत्र लिखा है कि वे अपने साथ खिलाड़ियों और खास तौर पर स्टार खिलाड़ियों को ले कर आए। दुनिया के स्टार खिलाड़ियों में से पहले ही बहुत सारे बड़े खिलाड़ियों ने भारत आने से इंकार कर दिया है मगर फैनेल ने श्री गिल को पत्र लिख कर कहा है कि अगर भारत सरकार और भारत की कॉमनवेल्थ फेडरेशन इन स्टाराें के पहले दर्जे के विमान टिकट दे और उन्हें खेल गांव की जगह पांच सितारा होटलों में ठहराने की व्यवस्था करें तो कुछ खिलाड़ी आ सकते हैं।

फैनेल खुद जमैका के रहने वाले है जो विकास दर और समृध्दि के मामले में भारत से कतई आगे नहीं है। लेकिन अब कॉमनवेल्थ नाम का झुनझुना फैनेल के हाथ लग गया है तो वे आकार में अपने देश से लगभग अस्सी गुने बड़े भारत की सरकार से भी सवाल कर सकते है। यह सवाल करने की उनकी हैसियत और हिम्मत इसलिए भी है कि भारत ने अपनी परंपरा निभाई है और पूरे सात साल का समय मिलने के बावजूद समय पर काम पूरा कर के नहीं दिया है।

भारत को कोई अंतरिक्ष में या बादलों के पार स्टेडियम नहीं बनाने थे। भारत को तो कोशिश करनी थी कि खेलों का जो बना बनाया ढांचा हमारे पास है उसे और अधिक आधुनिक और समकालीन बनाया जाए। आखिर 1982 में एक एशियाड का एक सफल आयोजन हम कर चुके हैं। उस समय राजीव गांधी राजनीति में नहीं होने के बावजूद इस अभियान से जुड़े हुए थे और एशियाड 82 के सफल आयोजन और इसी के साथ साथ भारतीय टेलीविजन के रंगीन होने की कहानी भी आज तक याद की जाती है।

जिन स्टेडियमों में एशियाड हो सकता था उनमें कॉमनवेल्थ जैसे लगभग अपाहिज किस्म के समारोह को आयोजित करने लायक बनाने के लिए कोई आसमान से इंद्र धनुष नहीं तोड़ना था। हालत तो यह है कि भारतीय खिलाड़ी जिन्हें कॉमनवेल्थ में हिस्सा भी लेना है, स्टेडियमों में काम चलने के कारण अपनी तैयारी तक नहीं कर पाए। अब जब भारत को कोई पदक हासिल नहीं होगा और अगर हुआ भी तो कांसे के पदक से आगे हम नहीं जा पाएंगे तो दोष किस पर मढ़ा जा पाएगा। आखिर इन खिलाड़ियों को न क्रिकेट वालों की तरह करोड़ों के विज्ञापन मिलते हैं और न हर साल अरबों की संपत्ति जमा होती है। ये वे खिलाड़ी है जिन्हें खेल के कुछ सार्थक और गौरवशाली क्षणों के बाद वापस अपनी उसी दुनिया में लौट जाना पड़ता है जहां वे दुनियादारी से अपना गुजारा कर रहे हैं।

यहां पर वही पुराना यक्ष प्रश्न फिर उभर कर सामने आता है और इस प्रश्न का उत्तर शायद किसी के पास न हो। पहले भी पूछा जा चुका है कि आखिर यह कॉमनवेल्थ बला क्या है? अंग्रेजों के गुलाम देशों का एक क्लब हैं जिसे एक जमाने में अमेरिका और सोवियत संघ की दादागीरी के समानांतर बचा कर रखा गया था ताकि विकासशील देशों की आवाज सुनी जा सके। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं था कि जिन अंग्रेजों को हमने बहुत संघर्ष और बलिदान के बाद खदेड़ा है वे भारत के खेलों तक पर राज करने लगे हैं। ब्रिटिश महारानी का राजदंड खेलों की पूर्व भूमिका के तौर पर पूरे भारत में घूम रहा है और हम भारतीय जो होली से ले कर रोटरी और लायंस क्लब को समारोह का निमित्त एक ही तरह से मानते हैं, इस राजदंड का स्वागत कर रहे हैं। महारानी को भेजना ही था तो हमारा कोहिनूर भेजती जो उनके मुकुट में लगा है और जो असल में भारत की शान है।


खेल भावना बहुत सार्थक और सकारात्मक भावना हैं लेकिन इस खेल भावना के तर्क के आधार पर आप पूरे देश के सम्मान को और विधान को खेल नहीं बना सकते। कॉमनवेल्थ में जो हो रहा है वह सबके सामने हैं और आयोजन के बाद पोल पट्टी खुलने पर जो होने वाला है वह भी जल्दी ही सबके सामने आ जाएगा। क्या हमने दिल्ली के गरीबों को उस 541 करोड़ रुपए का हिसाब दिया है जिसको गरीबों और अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए रखा गया था और खजांचियों की धांधली की वजह से वह भी कॉमनवेल्थ के उत्सव में खर्च कर दिया गया। क्या कॉमनवेल्थ पर बहस के बहाने इसका भी फैसला नहीं हो सकता कि राजनीति के महारथी खेलों को अपना खेल न बनाए।