कुमार संभव
केंद्रीय मंत्रिमंडल में कुछ युवा नेताओं को जगह दी गई है और इस आधार पर कहा जा रहा है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह(कृपया इसे सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी पढ़ें) ने अनुभव के साथ नई ऊर्जा और उत्साह का समावेश किया है। लेकिन क्या सचमुच में ऐसा है। क्या जिन युवा सांसदों को मौका दिया गया है वे वास्तव में देश के युवा वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं। कौन हैं ये युवा, क्या है इनकी पृष्ठभूमि और इनके सरोकार क्या हैं। क्या इनसे कोई उम्मीद की जा सकती है। ये सारे ऐसे सवाल हैं जो केंद्र सरकार के युवा मंत्रियों को लेकर किए जाने वाले दावों को लेकर पूछे जाने चाहिए।
याद कीजिए डेढ़ दशक पहले राजीव गाँधी देश के प्रधानमंत्री बनेथे। वे युवा थे और उन्होंने भी कई युवाओं को अपनी किचेन कैबिनेट में शामिल किया था। मगर ये सभी युवा दून स्कूल के पढ़े-लिखे अभिजातवर्गीय थे। उन्हें देश के बारे में कोई जानकारी ही नहीं थी। वे राजीव गाँधी के दोस्त थे और ज्यादा से ज्यादा मैनेजमेंट एवं टेक्नालॉजी के जानकार थे।
इस दून मंडली ने राजीव गाँधी की लुटिया तो डुबोई ही देश को भी ऐसी हालत में पहुँचा दिया कि 1990-91 में उसे रुपए का अवमूल्यन करना पड़ा और सोना गिरवी रखकर रुपया उठाना पड़ा ताकि कर्ज अदायगी के मामले में उसकी साख बनी रहे। शाहबानो विवाद और अयोध्या में विवादित स्थल का ताला खुलवाकर उन्होंने फासीवादी ताक़तों के लिए माहौल तैयार कर दिया, जिसके फलस्वरूप देश ने सैकड़ों दंगे और नरसंहार झेले। भ्रष्टाचार के मामले में भी उनकी सरकार नए कीर्तिमान बनाने में जुट गई और अंत में उन्हीं के चलते चली भी गई।
अब मनमोहन के मंत्रिमंडल में जो युवा चेहरे राहुल की टीम के बताए जा रहे हैं, उनकी पृष्ठभूमि भी कोई विशेष अलग नहीं है। चाहे ज्योतिरदित्य हों, जितिन प्रसाद हों, सचिन पायलट हों या फिर अगाथा संगमा, सबके सब अपने पिता की वजह से राजनीति में हैं और यही वंशवाद उनके मंत्री बनने का आधार भी बना है। ये सब एक ख़ास तरह की शिक्षा प्राप्त नेता हैं और मतदाताओं से इनका संबंध केवल चुनाव जीतने का है।
ये संपन्न घरानों के लोग हैं और ग़रीब जनता के दुख-दर्द से इनका दूर का भी वास्ता नहीं है। ग़रीबी हटाने के बारे में इनका दर्शन राहुल के ग्रामीण पर्यटन और कलावती के घर में एक रात बिताने से ज्यादा कुछ नहीं हो सकता। हो सकता है कि चिकने-चुपड़े चेहरों को पसंद करने वाले मध्यवर्ग को इनमें प्रतिभा और ऊर्जा वगैरा दिखे, क्योंकि उसकी मानसिक बनावट ही इसी तरह की होती है, मगर ये लोग किसी भी लिहाज़ से हिंदुस्तान के युवा जगत का प्रतिनिधित्व नहीं करते।
इनमें से कोई भी किसान-मज़दूर वर्ग से नहीं है। ये हवाई राजनीति करना जानते हैं और इनके सरोकार भी दूसरे हैं। ये प्रभु वर्ग के लोग हैं और इनका उद्देश्य शासक वर्ग के हितों की देखभाल करना है बस। इनसे ये उम्मीद करना खुद को धोखा देना होगा कि ये सबसे आख़िरी आदमी को ध्यान में रखकर काम करेंगे।
(शब्दार्थ)