आलोक तोमर
355 दिन उस जख्म को नहीं भर पाए हैं जो 26 नवंबर 2008 को किराए के पाकिस्तानी कातिल मुंबई के सीने पर 59 घंटों में करके चले गए थे। इस जख्म के कई हिस्सेदार हैं हर हिस्सेदार का अपना दुख हैलेकिन जो जिंदगियां हमेशा के लिए पटरियों से उतर गईं उन्हें उनकी मंजिल शायद ही मिल पाए खौफ की इस काहनी में एक एक करके पर्दे उठ रहे हैं शक के अंधरों पर रोशनी पड़ रही है मगर एक बच्चा है जिसके हिस्से में रोशनी नहीं है और वो तो रोशनी और अंधेरे का फर्क नहीं जानता हर दुख का अपना किस्सा है और इस किस्से की पूरी कहानी उलझी हुई है कहानी के तार शायद कुछ सुलझ भी जाएं लेकिन जो जिंदगियां हमेशा के लिए पटरियों से उतर गईं उन्हें उनकी मंजिल शायद ही मिल पाए खौफ की इस काहनी में एक एक करके पर्दे उठ रहे हैं। शक के अंधरों पर रोशनी पड़ रही है मगर एक बच्चा है जिसके हिस्से में रोशनी नहीं है और वो तो रोशनी और अंधेरे का फर्क नहीं जानता पाकिस्तान के पास भारत के सवालों का कोई जवाब नहीं है उसके पास अब भी मुंबई के कातिलों का कोई हिसाब नहीं है उधर मुंबई में एक बच्चा है जिसके मासूम सवालों का जवाब उसके घर के बड़े अब भी झूठ से दे रहे हैं कि कहीं उसका दिल न टूट जाए ये बच्चा नहीं जानता कि वो एक साल पहले अनाथ हो चुका है उसे अब भी अपने अब्बा का इंतजार है जो शायद चॉकलेट लेकर आएंगे। अफजल उन कातिलों का जिंदा शिकार है जिनके बारे में वो कुछ नहीं जानता 2 साल का अफजल इन तस्वीरों को बार-बार देखता है तस्वीरों में कुछखोजता है बार-बार अपने अब्बा की तस्वीर की तलाश करता है और मां से पूछता है कि अम्मी अब्बा कब आएंगे मेरे लिएचॉकलेट कब लाएंगे लेकिन अपनी मां की गोद में खेलने वाला अफजल शायद अब तक ये नहीं समझ पाया है कि उसक ेअब्बा उमर एक साल पहले हीइस दुनिया में नहीं रहे और उसके लिए फिर कभी चॉकलेट नहीं लाएंगे। ये दर्द भरी कहानी है मुंबई की मूबिना खातून की 26ध्11के आतंकी हमलों ने मूबिना की जिंदगी में भी मायूसी ला दी है एक हंसते-खेलते परिवार को बेबस बना दिया है मूबिना आज भी उन दिनों को याद करती है जब उसका पति उमर देर शाम घर आया करता था और उसके घर में खुशियां छा जाया करती थीं लेकिन 26ध्11 की वो खौफनाक रात मुबिना के परिवार के लिए काली रात साबित हुई पाकिस्तान से आए आतंकवादियों ने मूबिना से उसके पति को छीन लिया घर आने से पहले ही मूबिना का पति उमर विले पार्ले में आतंकवादियों का शिकार बन गया। मुंबई में आतंकवादी हमला हुआ था ये बात मूबिना को पता थी लेकिन मूबिना को26ध्11 की उस पूरी रात तक ये पता नहीं चल पाया कि उसका पति उमर भी इस खौफनाक मंजर का शिकार हुआ है उमर पेशे से टैक्सी ड्राईवर था और हमले की रात उस टैक्सी को चला रहा था जिस पर सवार होकर तीन आतंकवादी विले पार्ले तक पहुंचे थे विले पार्ले पहुंचने के बाद आतंकवादियों ने उमर की टैक्सी छोड़ दी थी और कुछ ही देर बाद टैक्सी में धमाका हो गया था उमर तो अब इस दुनिया में नहीं रहा लेकिन उमर की मौत ने मूबिनाऔर उसकेचार बच्चों को बेसहारा छोड़ दिया है।
मूबिना जैसे-तैसे अपने परिवार की गाड़ी चला रही है अब उसे सरकार से उम्मीद है मूबिना चाहती है कि उसे रहने के लिए एक घर मिले और उसके बच्चों को सहारा। मुंबई पर पाकिस्तान के कातिलों का हमला हुए एक साल हो गए हैं इस बीच निज़ाम भी बदला सरकार में नए चेहरे भी आएए मगर नहीं बदला तो दुखों का दौर नहीं बदला तो आंसूओं का सैलाब और नहीं बदला तो न उम्मीदी का आलम सब बीते हुए से आहत हैं और आने वाले सूरज से भी उन्हें रौशनी की उम्मीद नजर नहीं आती छब्बीस नवंबर दो हजार आठ मुंबई में आतंकी हमला साठ घंटो तक चली गोलियां और गई एक सौ सत्तर से भी ज्यादा लोगों की जाने। ये पाकिस्तानी कातिलों के जश्न मनाने की और भारतीय सुरक्षा एजेंसियों और सीमाओं की रक्षा के लिए जासूसी करने वालों रॉए आईबीए डिफेन्स इंटेलिजेन्स के लिए शर्मिन्दा होने की घड़ी थी। सब के सब सरकारी महकमे तमाशा देखते रहे औरएक दूसरे पर तोहमत लगाते रहे।हैरान तो ये बात करती है किइतनी बड़ी घटना के बावजूद अभी तक तालमेल तो दूर की बात इन एजंसियों के अधिकारों तक को बढ़ाया नहा गया। सुरक्षा मामलों के जानकार और पूर्व एनएसजी चीफ का मानना है कि आतंकवाद केखिलाफ बिलकुल अलग एजेंसी होनी चाहिए। मुंबई में 26 नवंबर को हुए हमलों के एक महीने के भीतर आंतरिक सुरक्षा मज़बूत करने के लिए सरकार ने कईक़दम उठाने का एलान किया था । एक केंद्रीय एजेंसी को सभी ख़ुफ़िया एजेंसियों से मिलने वाली जानकारी के विश्लेषण का काम करना था। आतंकवाद से लड़ने के लिए गैर-क़ानूनी गतिविधि क़ानून में संशोधन और राष्ट्रीय जाँच एजेंसी बनाने के लिए कानून बना औरराष्ट्रीय जाँच एजेंसी भी बना दी गई लेकिन एक साल तक ये एजेंसी दिल्ली के सेन्टूर होटल में चलती रही। इंटेलिजेन्स को मजबूत करने के लिहाज से गुप्तचर ब्यूरो में खाली पड़े पदों पर तुरंत भरने की बात कही थी। लेकिन वो वादा भी एक साल पूरा होने तक पूरा नहीं हुआ। जहाँ तक राष्ट्रीय जाँच एजेंसी की बात है विश्लेषकों ने यह सवाल भी उठाए थे कि इसमें काम करने के लिए लोग कहाँ से लाए जाएँगे जबकि इंटेलिजेंस ब्यूरो और सीबीआई में क़रीब एक चौथाई पद ख़ाली पड़े हुए । उन्हे पहले भरा जाना चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं हुआ और कर दिया गया एक और एजेंसी का गठन। ऐसी एजेंसी जिसके हाथ लाल फीतों से बंधे हुए है।