आलोक तोमर
डेटलाइन इंडिया
अहमदाबाद। गुजरात के पूर्व गृहराज्य मंत्री अमित शाह को कानूनी लपेटे में लेने के बाद सीबीआई गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से भी सोहराबुद्दीन फर्जी एनकाउंटर मामले में पूछताछ कर सकती है।सोहराबुद्दीन फर्जी एनकाउंटर केस में सीबीआई गुजरात के पूर्व गृह राज्य मंत्री अमित शाह से साबरमती जेल में पूछताछ कर रही है। उसने बुधवार को साढ़े चार घंटे तक शाह से लंबी पूछताछ की। पहले दौर की पूछताछ में उनसे 32 सवाल पूछे गए। जिसमें से 11 सवालों के जवाब में शाह कोई ठोस जबाव नहीं दे पाए। उन्होंने हर सवाल के जवाब में कहा कि मुझे पता नहीं, मुझे कुछ याद नहीं, मैं जानता नहीं। शाह से सीबीआई ने ऑन कैमरा पूछताछ की। अमित शाह से चार्जशीट के आधार पर सुपारी लेकर कौसरबी की हत्या तक के सवाल पूछे गए। सीबीआई ने अमित शाह पर दोहरी हत्या से लेकर फिरौती वसूलने तक संगीन आरोप लगाये हैं।
मालूम हो कि बीते रविवार को सीबीआई ने अमित शाह को गिरफ्तार किया था उसके बाद रिमांड पर लेने की बजाए अमित शाह को सीधा न्यायिक हिरासत में भेज दिया था। सोहराबुद्दीन फर्जी एनकाउंटर मामले में अमित शाह पर इल्ज़ाम संगीन हैं। अमित शाह पर सोहराबुद्दीन फर्जी एनकाउंटर मामले में शामिल होने का आरोप है। अमित शाह पर लगे आरोपों के बारे में आपको विस्तार से बताते हैं...
गुजरात में सोहराबुद्दीन शेख के फर्जी एनकाउंटर का मामला रह-रहकर उठता रहता है और जब-जब इस मामले से जुड़ी कोई चीज़ बाहर आती है, वह नरेंद्र मोदी के लिए मुसीबत लेकर आती है। नया खुलासा भी गुजरात सरकार के लिए एक मुसीबत है। मोदी के एक मंत्री सोहराबुद्दीन मामले में आरोपी पुलिस अधिकारियों से फोन पर उस वक़्त लम्बी-लम्बी बातें की। गुजरात के गृह राज्य मंत्री अमित शाह ने मामले आरोपी डीआईजी, डीसी वंजारा, एटीएस के एसपी राजकुमार पांडियान और बंसकांथा के डिप्टी एसपी विपुल अग्रवाल से टेलीफोन पर दिसंबर 2006 में बात की। यह वह वक़्त था जब सोहराबुद्दीन मामले में एक मात्र गवाह तुलसी प्रजापति का एनकाउंटर हुआ था।
दरअसल 26 नवंबर, 2005 को सोहराबुद्दीन शेख को लश्कर का आतंकी बताते हुए मार गिराया गया था। तब यह कहा गया कि सोहराबुद्दीन शेख गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को मारने निकला था। जिसका एनकाउंटर कर दिया गया, लेकिन बाद में यह एनकाउंटर फर्जी निकला। इसी मामले से जुड़ा एक मात्र गवाह था तुलसी प्रजापति, जिसे दिसंबर 2006 में एनकाउंटर में मार दिया गया। जाहिर है कहीं न कहीं ऐसा लग रहा था कि सोहराबुद्दीन और तुलसी प्रजापति के पास ऐसी जानकारी थी जो सरकार की जड़ें हिला सकती थी और इसीलिए दोनों को मार गिराया गया।
सितंबर 2006 से लेकर जनवरी 2007 तक गुजरात के गृह राज्य मंत्री अमित शाह ने विपुल अग्रवाल, राजकुमार पांडियान और डीसी वंजारा से लगातार फोन से सम्पर्क में थे और कॉल रिकॉर्ड बताते हैं कि उनकी तीनों पुलिस अधिकारियों से 155 मिनट की बातें हुईं।
शाह ने प्रजापति के एनकाउंट वाले हफ़्ते में तो इन अधिकारियों से बात की ही, इसके अलावा इस मामले में जब-जब कुछ हुआ तब-तब मंत्री जी ने पुलिसवालों से सम्पर्क साधा। जैसे कि 7 सितंबर, 2006 को जब सुप्रीम कोर्ट में पहली याचिका पड़ी तब शाह ने इन पुलिस अधिकारियों को 20 बार फोन किया। इसी तरह से सितंबर में अमित शाह इन्हें 28 कॉल किए। दिसंबर 2006 में 42 बार और जनवरी 2007 में 73 बार फोन किया। जून 2006 में भी शाह ने ढेरों कॉल्स की। इस वक़्त सीआईडी की आईजीपी गीता जोहरी ने सोहराबुद्दीन मामले की जांच शुरू की थी। वहीं जुलाई और अगस्त में जब सोहराबुद्दीन मामले में कुछ नया नहीं हुआ, तो इन दोनों महीनों में 4 से 9 ही कॉल किए गए।
ये फोन कॉल्स बताते हैं कि कहीं न कहीं प्रजापति को रास्ते से हटाने का पूरा खाका तैयार किया गया था। इतना ही नहीं, सिर्फ प्रजापति मामले से ही शाह का नाता नहीं जुड़ता दिख रहा। 7 अक्टूबर, 2004 से 7 मार्च, 2005 के बीच में भी अमित शाह ने राजकुमार पांडियान से 277 बार बातें की। इस दौरान सोहराबुद्दीन और तुलसी प्रजापति ने कुछ जाने-माने बिल्डरों के यहां वसूली के लिए फायरिंग की थी और इसी दौरान डीसीपी अभय चुडासमा और सोहराबुद्दीन के रिश्ते जगजाहिर हो गए थे। चुडासमा को गिरफ़्तार कर लिया गया था और तभी यह बात भी सामने आई थी कि चुडासमा के ऊपर अमित शाह का हाथ था।
अमित शाह पर अब सीबीआई का शिकंजा कसता जा रहा है। 6 महीने पहले यह जांच सीबीआई को सौंपी गई थी। गृह राज्यमंत्री अमित शाह के फोन कॉल्स रिकॉर्ड गुजरात सीआईडी के एनडी सोलंकी और पुलिस कमिश्नर पीसी पांदे के आदेश पर एक मामले के मद्देनज़र ऑफिशियल सीक्रेट एक्ट 2005 के तहत किए गए। शाह के लैंडलाइन 079-26404230 और मोबाइल फोन 9824010090 और 9825049392 से राजकुमार पांडियान के फोन पर सैकड़ों काल्स की गईं। दोनों के बीच में 331 मिनट बात हुई।
यह कोई इत्तेफाक नहीं है कि जिस पर सोहराबुद्दीन और प्रजापति के मामले में साज़िश रचने का आरोप है और एक मंत्री के बीच में इतनी ज़्यादा बातें हुईं हैं। यह सामान्य बात भी नहीं है, क्योंकि जांच की केस डायरी के मुताबिक गृह राज्य मंत्री अमित भाई शाह और एसपी राजकुमार पांडियान के बीच हुई इतनी सारी बातें असामान्य हैं, क्योंकि एक राज्यमंत्री और एक पुलिस अधिकारी के बीच ऑफिशियल डेकोरेम के खिलाफ हैं।
हालांकि जिस मामले में अमित शाह के फोन रिकॉर्ड किए जा रहे थे वह 2009 में ही बंद हो गया, लेकिन इन रिकॉर्ड्स ने नए राज़ खोल दिए हैं। जिसमें नरेंद्र मोदी सरकार के मंत्री जी बुरी से फंसे हुए दिखते हैं। अमित शाह की ताक़त का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि जब-जब किसी पुलिसवाले ने आवाज़ उठाने की कोशिश की उसकी आवाज़ को दबा दिया गया।
सोहराबुद्दीन का मामला उठने पर अमित शाह के इशारे पर एडिशन डीआईजी रजनीश राय को इसकी ज़िम्मेदारी दी गई थी, लेकिन 2007 में राय ने बड़ा क़दम उठाते हुए पांडियान, वंज़ारा और विपुल अग्रवाल को गिरफ़्तार किया। यह शाह के लिए ख़तरनाक होने लगा था और शायद रजनीश को सोहराबुद्दीन मामले में ज्यादा कुछ पता चल गया था। लिहाज़ा उनसे यह केस छीन लिया गया और सीआईडी की आईजीपी गीता जौहरी को केस सौंप दिया गया।
यह भी कहा जाता है कि जब गीता जोहरी ने सोहराबुद्दीन मामले में अपनी अंतरिम रिपोर्ट सौंपी, जो अमित शाह ने एक बैठक में कहा कि तुम लोग मेरे लिए मुश्किलें खड़ी कर रहे हो और ऐसा इसलिए हुआ था, क्योंकि इससे ठीक पहले सीआईडी उस फार्महाउस की छानबीन की थी जहां वंजारा ने सोहराबुद्दीन और उसकी पत्नी कौसर बी को एनकाउंटर से पहले रखा था।
इसके बाद से ही सोहराबुद्दीन के मामले में सीआईडी बिल्कुल ठंडी पड़ गई। ज़ाहिर है यह साज़िश बेहद गहरी थी। कुछ बड़ा है जिसकी जानकारी सोहराबुद्दीन और प्रजापति को थी और इसीलिए उन्हें मौत के घाट उतार दिया गया।
अहमदाबाद की एक मेट्रोपालिटन अदालत ने वर्ष 2004 में इशरत जहां और 3 अन्य लोगों की हत्या को जिस प्रकार फर्जी मुठभेड़ करार दिया है उससे गुजरात की नरेंद्र मोदी सरकार और उसकी पुलिस का भयावह चेहरा एक बार फिर बेनकाब हो गया है। सोहराबुद्दीन मुठभेड़ के फर्जी साबित होने के बाद इशरत जहां मुठभेड़ की जांच ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि गुजरात की सरकार का असली चेहरा क्या है? इशरत और जावेद को गुजरात की क्राइम ब्रांच के अफसरों ने मुंबई पुलिस अधिकारियों की मदद से मुंबई से अगवा किया और 12 जून, 2004 को अहमदाबाद लेकर आए। उन्हे 14 जून की रात को ही गोली मार दी गई और 15 जून की सुबह पुलिस ने एनकाउंटर का रूप दे दिया। गुजरात क्राइम ब्रांच की कमान डीजी बंजारा के सुपुर्द थी, जो सोहराबुद्दीन एनकाउंटर के फर्जी साबित होने के बाद इन दिनों जेल में हैं। गुजरात दंगों के बाद ज्यादातर जांच रिपोर्र्टो और अदालती फैसलों में गुजरात सरकार, पुलिस और मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की कठोर शब्दों में निंदा की गई।
सांसद अहसान जाफरी और सोहराबुद्दीन तथा उनकी पत्नी कौसर बी की जघन्य हत्या के सिलसिले में गुजरात हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के सख्त तेवर की वजह से जांच फिर से आरंभ की गई। इशरत जहां के एनकाउंटर के मामले में मजिस्ट्रेट जांच सामने आने के बावजूद बेशर्मी के साथ भाजपा मोदी के समर्थन में उतर आई है। यही हाल महाराष्ट्र का है, जहां श्रीकृष्णा कमीशन रिपोर्ट की अनदेखी करते हुए अल्पसंख्यक वर्ग के लोगों का उत्पीड़न लगातार जारी है। इसी प्रकार देश के दूसरे राज्यों आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, दिल्ली आदि में देश के कमजोर वर्गो के साथ अत्याचार जारी है। यहां तक कि केंद्रीय सरकार की नाक के नीचे बटला हाउस के पुलिस एनकाउंटर के सिलसिले में कोई जांच करवाने के लिए सरकार तैयार नहीं है। यहां इस बात का उल्लेख करना जरूरी है कि केंद्रीय सरकार ने खुफिया एजेंसियों के हवाले से कहा था कि इशरत जहां का संबंध लश्करे तैयबा से था।
गुजरात पुलिस के बारे में यह साबित हो गया है कि वह फर्जी एनकाउंटर में माहिर है। 1998 से लेकर अब तक के अनेक ऐसे मामले सामने आ चुके हैं। अब्दुल लतीम नाम के व्यक्ति को 1998 में उस वक्त मार डाला गया जब उसे क्राइम ब्रांच में पूछताछ के लिए लाया जा रहा था। पुलिस के अनुसार रात को अब्दुल लतीफ ने एक सिपाही से राइफल छीनने की कोशिश की। इस घटना के कुछ दिनों बाद अहमदाबाद में पुलिस ने पांच लोगों को मौत के घाट उतार दिया। क्राइम ब्रांच ने दावा किया कि ये लोग अपने साथी अब्दुल लतीफ की मौत का बदला लेने आए थे। उन पांचों का एनकाउंटर भी रात के समय में हुआ। अक्टूबर 2002 में पुलिस ने एक नौजवान समीर खान पठान को मुठभेड़ में मार डाला। उस पर आरोप था कि उसने मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और प्रवीण तोगड़िया की हत्या का षड्यंत्र रचा था। इस सिलसिले में मानवाधिकार आयोग ने क्राइम ब्रांच से रिपोर्ट देने को कहा, क्योंकि जब एनकाउंटर हुआ तो समीर खान पुलिस की हिरासत में था। भावनगर के सादिक जमाल की फर्जी मुठभेड़ का मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है। उसे 13 जनवरी, 2003 को अहमदाबाद के एक सिनेमा हाल के निकट पुलिस ने मुठभेड़ में मार गिराया था। जब सोहराबुद्दीन मुठभेड़ का मामला सामने आया तो जनसंघर्ष कमेटी ने सादिक जमाल के केस की छानबीन की। इसमें कई हैरतअंगेज तथ्य सामने आए। इस फर्जी मुठभेड़ में केवल गुजरात की पुलिस ही नहीं शामिल थी, बल्कि मुंबई के एक एनकाउंटर स्पेशलिस्ट सब-इंस्पेक्टर ने भी सक्रिय भूमिका निभाई थी। 26 नवंबर, 2005 को सोहराबुद्दीन शेख और उसकी पत्नी कौसर बी को फर्जी मुठभेड़ में मौत के घाट उतार दिया गया। पुलिस ने दावा किया कि ये भाजपा के चोटी के नेताओं की हत्या के इरादे से गुजरात आए थे। सीआईडी के इंस्पेक्टर जनरल ने सुप्रीम कोर्ट में रिपोर्ट पेश की थी कि उनका जानबूझकर कत्ल किया गया था। इशरत जहां का एनकाउंटर बहुत नाटकीय तरीके से किया गया। इशरत और उनके पारिवारिक मित्र जावेद व्यापार के सिलसिले में मालेगांव गए थे। वह कब और कैसे अहमदाबाद पहुंच गए, यह रहस्य तो महाराष्ट्र और गुजरात की पुलिस को ही पता होगा। इस फर्जी मुठभेड़ की घटना के बाद इशरत की माता की तरफ से गुजरात हाईकोर्ट में रिट दाखिल की गई। गुजरात हाईकोर्ट ने तीन जजों की एक कमेटी के जरिए इस मामले की जांच कराने का निर्देश दिया और जांच कमेटी ने इशरत के एनकाउंटर को फर्जी ठहराते हुए गुजरात सरकार और पुलिस को कठघरे में ला खड़ा किया। इशरत जहां के मामले में केंद्रीय सरकार की ओर से गत 6 अगस्त को हलफनामा दाखिल किया गया कि उसका संबंध लश्करे तैयबा से था। अब इस मामले में लीपापोती की कोशिश जारी हैं।
इशरत जहां कि मौत की जितनी जिम्मेदार गुजरात सरकार है उतनी ही केंद्र सरकार भी। इस मामले में केंद्र और राज्य सरकार की मिलीजुली भूमिका वैसी ही है जैसी अयोध्या ढांचे को ढहाए जाने में थी। अयोध्या ढांचे को गिराए जाने में जितनी जिम्मेदारी मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की थी उतनी ही तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंह राव और राज्यपाल मोतीलाल वोहरा की भी थी। कल्याण सिंह ने तो माफी मांग ली, पर कांग्रेस के नेता अभी तक चुप क्यों हैं? यह बात किसी से भी छिपी नहीं है कि कांग्रेस ने हमेशा से अल्पसंख्यकों का मसीहा होने का डंका पीटा है, पर वास्तव में उसने हमेशा इन्हें डरा कर उनका राजनीतिक इस्तेमाल किया है। इशरत जहां के मामले में मोदी सरकार और मनमोहन सरकार, दोनों को देश के 18 करोड़ अल्पसंख्यकों से माफी मांगनी पड़ेगी। अगर कांग्रेस अल्पसंख्यकों की इतनी खैरख्वाह है तो सच्चर कमीशन, श्रीकृष्ण कमीशन, रंगनाथ मिश्र कमीशन की रिपोर्ट धूल क्यों फांक रही हैं?