सोनिया गांधी ने राजनीति में सिक्का जमाया

मिलन गुप्ता
डेटलाइन इंडिया
नई दिल्ली, 26 अक्तूबर-   कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने अपना सर्वोच्च होना आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की लड़ाई में जाहिर कर दिया था और पार्टी के नेता अब यह स्वीकार करने लगे हैं कि श्रीमती गांधी को राजनीति ठीक से समझ में आने लगी है। आंध्र प्रदेश में जब मुख्यमंत्री वाई एस राजशेखर रेड्डी का एक रहस्यमय हैलीकॉप्टर दुर्घटना में निधन हुआ तो उनके बेटे जगनमोहन रेड्डी मुख्यमंत्री पद के सबसे ताकतवर दावेदार थे। उनके पक्ष में विधायकों का बहुमत भी था और विधान परिषद के सदस्य भी उनके साथ आ गए थे। मगर जगन मोहन रेड्डी के साथ दिक्कत यह थी कि पिछले लोकसभा चुनाव में पहली बार वे संसद में पहुचे थे और उनका राजनैतिक अनुभव डेढ़ सौ दिन का भी नहीं था। उनके सामने जो दूसरे दावेदार थे वे उनकी उम्र के बराबर समय तक राजनीति करते रहे थे। सोनिया गांधी खुद हैदराबाद पहुंची और उनके साथ कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह भी थे जिन्होंने जगनमोहन से अकेले में बात की और समझाया कि वे अपने समर्थकों को काबू में रखें। इसी के बाद जगनमोहन का बयान आया कि वे हाईकमान का आदेश मानेंंगे। श्रीमती सोनिया गांधी ने जब जगनमोहन से मुलाकात की तो उन्होंने पूरी संवेदना और सहानुभूति तो दिखाई लेकिन दिग्विजय ंसिह के जरिए ही सही यह भी कहलवा दिया कि पार्टी आलाकमान को किसी दबाव के तहत काम करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। उन्होंने मिलने आए विधायकों से भी सवाल किया कि क्या वे अनुभव के आधार पर जगनमोहन को इतने बड़े राज्य का सक्षम मुख्यमंत्री बन सकने लायक मानते हैं? विधायक गुस्से में थे और उन्होंने सवाल किया कि राजीव गांधी जब प्रधानमंत्री बने थे तब उन्हें भी कोई प्रशासनिक अनुभव नहीं था और उनकी उम्र भी उतनी ही थी जितनी अब जगनमोहन की है। जवाब दिग्विजय सिंह ने दिया और सोनिया गांधी की मौजूदगी में दिया। दिग्विजय सिंह ने कहा कि राजीव गांधी प्रधानमंत्री बनने के पांच साल पहले से राजनीति में थे और पार्टी के महासचिव होने के अलावा सांसद भी रहे थे। यह तुलना करना बेकार है। सोनिया गांधी ने अपने अपने इलाकों में ताकतवर माने जाने वाले एक एंटनी, अजीत जोगी, अमरिंदर सिंह, विलासराव देशमुख, एस एम कृष्णा और वीरभद्र सिंह के अलावा खुद दिग्विजय सिंह को उनके मुख्यमंत्री काल में कई बार पार्टी के राजनैतिक फैसले मानने पर मजबूर किया था। सोनिया गांधी की ताकत 2004 में लोकसभा चुनाव में जीत से बढ़ी थी और 2009 में पार्टी की जीत और राहुल गांधी के उदय के बाद यह ताकत और पक्की हो गई। असंतुष्टों से कैसे निपटा जाता है यह भी सोनिया गांधी जानती है। के करुणाकरण, जेबीपटनायक और नारायण राणे जैसे महारथियों को उन्हाेंने लगभग अपनी ही शर्तों पर चलने के लिए बाध्य कर दिया। महाराष्ट्र चुनाव में स्थानीय राजनैतिक मजबूरियां चाहे जो हो और शरद पवार चाहे जितना शोर मचाए लेकिन आखिरकार चलनी सोनिया गांधी की है इसीलिए विलासराव देशमुख से ले कर सुशील कुमार शिंदे और शिवराज पाटिल लगातार सोनिया गांधी के आस पास घूम रहे हैं।

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